राजनीतिक इच्छाशक्ति से स्वास्थ्य सेवाओं में भ्रष्टाचार का निवारण संभव

डॉक्टर और दवाई की कंपनियों के गठजोड़ के कारण मरीज़ों को चिकित्सा सेवा के लिए बहुत अधिक ख़र्च वहन करना पड़ता है. मरीज़ दवा के लिए भुगतान करता है, लेकिन दवा के चुनाव पर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता है.

बुनियादी स्वास्थ्य सेवा व्यवस्था के अभाव में निजी क्षेत्र की लूट और शोषण का शिकार नागरिक

जब मरीज़ों की भलाई से अधिक लाभ को प्राथमिकता दी जाती है, तब स्वास्थ्य सेवा का क्षेत्र किसी भी तरह से धन पाने का व्यवसाय बन जाता है. इसी कारण सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र का अपेक्षाकृत नेक व सेवा-उन्मुख पेशा पहले बाज़ार-आधारित वस्तु में बदला, और फिर कॉरपोरेट आधारित मुनाफ़ाख़ोरी उद्योग में बदल गया . 

राजनीति में भारतीय मुसलमान और उनके हितों की वकालत

भले ही मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के बराबर अनुपात में संसद और राज्य विधानसभाओं में जगह मिल जाए, लेकिन यह अपने आप में उनके हितों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व की गारंटी नहीं देता है.

भारतीय मुसलमानों का राजनीतिक सफ़ाया, द्वितीय श्रेणी का नागरिक जीवन

भारत के मुसलमानों को राजनीतिक रूप से हाशिए पर धकेल दिया जाना कोई आकस्मिक घटना नहीं है, हालांकि 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के बाद इसकी गति बहुत तेज़ हो गई है. आरएसएस और भाजपा की हिंदू बहुसंख्यक राजनीति ने भारत के मुसलमानों को देश की शासन व्यवस्था में भागीदारी से बाहर करने के उनके लक्ष्य के सबसे अधिक क़रीब पहुंचा दिया है.

अलीगढ़ लिंचिंग: दिल दहला देने वाली हिंसा, नफ़रत फ़ैलाने की राजनीतिक परियोजना

लिंचिंग के दौरान युवक डरे हुए निहत्थे लोगों पर हिंसक हमला करते हैं. यह देश का नेतृत्व करने वालों द्वारा फैलाई गई नफ़रत से प्रेरित उनकी क्रूरता की कहानी है. सनकी लोगों द्वारा जबरन वसूली की कहानी है. पुलिस के मिलीभगत की कहानी है. चुपचाप खड़े तमाशबीन की कहानी है.

जब शांति की चाह अपराध बन जाए: अली ख़ान महमूदाबाद की गिरफ़्तारी

अशोका विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अली ख़ान महमूदाबाद सशर्त जमानत पर बाहर हैं. सत्ता द्वारा उनको निशाना बनाया जाना और शांति की मांग करने वाली उनकी फेसबुक पोस्ट में तथाकथित 'डॉग-व्हिसलिंग' की जांच करना परेशान करने वाले कई सवाल खड़े करता है.

रोहिंग्या शरणार्थियों को समुद्र में फेंकना क्रूर सरकारी नीति की निशानी

स्वामी विवेकानंद आज अपने देश के बारे में क्या सोचते, जो अन्य धर्मों तथा देशों के प्रताड़ित शरणार्थियों को दमनकारी कारागृहों में डाल देता है, उन्हें गोलियों के बीच धकेल देता है, और कभी उन्हें नरसंहार का शिकार बनने के लिए समुद्र में फेंक देता है. 

मुसलमान पिसते रहे, राष्ट्र ने मुंह मोड़ लिया पहलगाम हमले के बाद

पहलगाम आतंकी हमले के बाद कश्मीरी लोगों की मानवता और उनके पश्चाताप के बावजूद, कई राज्य की सरकारों और दक्षिणपंथी ताकतों ने देश भर में कश्मीरियों और मुसलमानों को सामूहिक रूप से प्रताड़ित किया. इस हमले के बाद देश ने जो त्रासद मंजर देखा, उसे उकेरता हर्ष मंदर का यह मार्मिक लेख.

ग़ाज़ा में तबाही और भारत की शर्मनाक चुप्पी

हिंदुत्व की विचारधारा से प्रभावित होकर कई भारतीयों ने न केवल ग़ाज़ा में इज़रायल के युद्ध का समर्थन किया है, बल्कि तबाह हो चुके फ़िलिस्तीनी लोगों के ख़िलाफ़ नफरत फैलायी है और फर्ज़ी प्रचार भी किया है. 

2020 के दिल्ली सांप्रदायिक नरसंहार के पीड़ितों के साथ विश्वासघात

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के पांच साल बाद सामाजिक विभाजन कम नहीं हुआ है, न ही हिंसा के शिकार हुए पीड़ितों को उचित मुआवज़ा मिला. न्याय तो आज भी दूर की कौड़ी है.

गांधीजी के शहादत दिवस पर हम क्यों हुए अजमेर दरगाह पर एकत्रित

30 जनवरी 2025 को शहीद दिवस के दिन मानवाधिकारों, इंसानियत और एकता के लिए खड़े होने वाले ढेरों लोग अजमेर में सद्भावना यात्रा के लिए जुटे थे. अलग-अलग सदी की तीन कहानियों से जुड़े ये लोग शांति और करुणा के लिए दरगाह शरीफ़ तक पहुंचे.

जस्टिस बीआर गवई को हर्ष मंदर का खत-‘बेघर लोग परजीवी नहीं, सबसे वंचित नागरिक हैं’

जस्टिस बीआर गवई ने हाल ही एक सुनवाई के दौरान दिल्ली में बेघर लोगों के लिए 'परजीवी' शब्द का इस्तेमाल किया था. हर्ष मंदर ने उन्हें लिखा है कि सच्चा न्याय हमेशा करुणा के साथ संबद्ध होता है और बेघर लोगों को गरिमामयी जीवन का अधिकार है.

भारतीय मुसलमान की त्रासदी: थोपा हुआ अकेलापन

भारतीय संविधान ने हर धर्म, जाति और पहचान के लोगों के लिए समान अधिकार वाला देश बनाने का संकल्प लिया था. लेकिन जिस तरह बहुसंख्यक हिंदू और ऊंची जातियां दलितों और मुसलमानों को हमारे पड़ोस, स्कूलों और हमारे जीवन से बाहर निकाल रही हैं, ये समुदाय डाल से टूटकर दूर जा गिरे हैं. 

साल 2024 में सिनेमा में मानवतावाद की वापसी हुई

2024 भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष था. विवेक पर आधारित फ़िल्मों से इतर इस साल ऐसी कई फ़िल्में देखने को मिलीं, जो करुणा से ओत-प्रोत थीं. ग़रीबी, पराजय और अकेलेपन पर कई उल्लेखनीय फ़िल्में बनीं, जिनमें से ज़्यादातर का अंत आशा और प्रेम के संदेश को साथ हुआ.

नमाज़ पर आखिर क्यों करे आपत्ति सत्ता और जनता

आज, ऐसा क्यों है कि मुसलमान प्रार्थना यानी नमाज़ का एक साधारण क्रियाकलाप कई लोगों को शिकायत और हिंसा के लिए उकसाता है और पुलिस को उनकी आपराधिक जवाबदेही तय करने के लिए प्रेरित करता है?