'आज़ादी के मायने' श्रृंखला की बारहवीं क़िस्त: सबको एक नए सूर्योदय की उम्मीद है. लेकिन रात के अंधेरे का कोई सामना नहीं करना चाहता. हम सब एक स्वप्न में हैं कि जैसे ही हम नींद से उठेंगे, नया सूर्योदय हमारे दरवाजे पर स्वागत के लिए खड़ा होगा. लेकिन सूरज की दिशा कौन मोड़ेगा? हम, आप, वे या हम सब मिलकर?
किसी के पास भी इतना समय नहीं है कि वह पत्तों को पूरी तरह से झरते देख सके. जो झरते हुए को नहीं देख सकता, वह उगते हुए को भी नहीं देख सकता. 'रचनाकार का समय' स्तंभ की चौथी क़िस्त.