स्वामीनाथन की जीवनी: ‘मैं मनुष्य के लिए चित्र नहीं बनाता, मैं मनुष्य की तरह चित्र बनाता हूं’

पुस्तक समीक्षा: स्वामीनाथन की जीवनी का अद्भुत आकर्षण यह भी है कि इससे गुज़रते हुए आप स्वयं को स्वामीनाथन के पास बैठा, उन्हें काम करता देखना शुरु कर देते हैं. जिन्हें स्वामीनाथन की समकालीनता मिली उसे तो सराहा ही जा सकता है. मगर जिनका समय स्वामीनाथन के समय के साथ नहीं था, वे इस जीवनी में स्वामीनाथन की सघन उपस्थिति को अपनी उपस्थिति में घोल सकते हैं.

केसव सुनहु प्रबीन: वह जो रीतिकाल था

रीति साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ. बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रजभाषा के बजाय नई संस्कृतनिष्ठ हिंदी को राष्ट्र-निर्माण की कार्रवाई के तौर पर देखा गया. ब्रज के ग्रंथ संदिग्ध बन गए. ब्रजभाषा को कठघरे में खड़ाकर इस हिंदी ने अपनी जगह बना ली.

पेड़ों के उजड़ने से हो जाते हैं बदनसीब प्यार करने वाले 

राही डूमरचीर की कविता इस भेद को मिटा देती है कि स्त्री से प्रेम करने और प्रकृति से प्रेम करने में कोई अंतर है. क्या स्त्री के प्रेम में जान देने और एक पेड़ की रक्षा के लिये अपना हासिल दांव पर लगा देने में कोई फ़र्क है?