रफ़ कॉपी: बहुत से अनुभवों की काटपीट के बीच ज़िंदगी का समीकरण समझने की कोशिश

पुस्तक समीक्षा: दामिनी यादव के कविता संग्रह 'रफ़ कॉपी' में क्रोध जगह-जगह बिखरा है. क्रोध के कई रूप हैं; कई बार वह करुणा में ढलता है. कई बार व्यंग्य की भाषा ग्रहण करता है. तो कई बार आत्मनिरीक्षण तक जाता है. पर इस क्रोध के केंद्र में क्या है? संग्रह की ज़्यादातर कविताएं इस एहसास की अभिव्यक्ति हैं कि इस दुनिया में- और हमारे समाज में- स्त्रियां लगातार दमन और उत्पीड़न की शिकार हैं. 

‘विज्ञापन वाली लड़की’: स्मृति और संवेदना के रसायन से बनी कहानियां

पुस्तक समीक्षा: अपने कहानी संग्रह 'विज्ञापन वाली लड़की’ में दिनेश श्रीनेत ने जानबूझकर अपने चरित्रों को एक धुंधली छाया में रखा है. ये कहानियां और उनके किरदार मानसिक ग्रंथियों की परिक्रमा के बीच रचे गये हैं- उन्हें बाहर देखा तो जा सकता है, समझने के लिए उनके भीतर उतरना पड़ता है.

दिल्ली चुनाव परिणाम: धूल में मिले आम आदमी पार्टी के धूमकेतु क्या फिर आकाश में चमकेंगे?

जो लोग कांग्रेस को मिले वोट और कई सीटों पर हार-जीत का अंतर दिखा कर बता रहे हैं कि कांग्रेस की वजह से आप हारी, वे आधा सच देख और बता रहे हैं. पूरा सच यह है कि आप अपनी वजह से हारी, वरना बीते दो चुनावों में उसे न कांग्रेस की दया की ज़रूरत पड़ी थी और न ही डबल इंजन सरकार के प्रचार से फ़र्क पड़ा था.

यह वक़्त मुकेश चंद्राकर और मनीष आज़ाद के साथ खड़े होने का है

यह वाकई मुश्किल समय है. कहीं एक पत्रकार मारा जा रहा है, कहीं एक सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक को जेल में डाला जा रहा है, कहीं एक पत्रकार बरसों से जेल में सड़ रहा है.

सूरज के सातवें रथ पर सवार होकर चले गए श्याम बेनेगल, भारतीय गणतंत्र का सपना हुआ लुप्त

श्याम बेनेगल उस पीढ़ी के सिनेकर्मी थे जिसने आज़ाद भारत के उभरते सपनों के बीच सांस ली. एक समतावादी, लोकतांत्रिक जीवन-पद्धति का सपना, एक धर्मनिरपेक्ष-जातिविहीन मूल्य-संहिता का सपना, नेहरू की कविता और गांधी की करुणा का सपना. उनके निधन के साथ उस युग के एक सपने का भी अंत हो गया.

गगन गिल को साहित्य अकादेमी सम्मान: शोर भरे समय में चुप्पी का प्रतिरोध रचती कविता

गगन गिल की कविताओं की संवेदना इतनी अंतर्मुखी है कि मितकथन में ही व्यक्त हो सकती है, इतनी तरल कि विस्मृति में ही सुरक्षित बस सकती है और इतनी सघन कि आत्मा को छूने की विकलता के बीच प्रेम कर सकती है और फिर भी विहंसते हुए कह सकती है कि ऐसे प्रेम से खुदा ही बचाए.

रचनाकार का समय: मैं ख़ुद को बचाने के लिए लिखता हूं

यह लेखक के लिए हताश करने वाला समय है, मुश्किल समय है. सच लिखना शायद इतना जोखिम भरा कभी नहीं था जितना अब है. सच को पहचानना भी लगातार मुश्किल होता गया है.

मर्यादा की मारी चिंता और अफ़सोस का कर्मकांड

मृणाल पांडे में बाकी जो भी दुर्गुण हों, वे असभ्य और अशालीन होने के लिए नहीं जानी जातीं. वे किसी रूप में वामपंथी भी नहीं हैं. उन पर बीजेपी विरोधी होने का भी वैसा इल्ज़ाम नहीं रहा है, जैसा दूसरों पर है.