पुस्तक अंश: हमारा स्कूल सुबह दस या ग्यारह बजे से शुरू होता और शाम पांच बजे छुट्टी होती थी. मैं सुबह खाना खाकर निकलता. शाम को घर आने तक बाहर पानी या खाने को छूता भी नहीं था. महाड के बाज़ार में जलावन की लकड़ी बेचने आने वाले हमारी जाति के लोगों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य होता था कि मैं ब्राह्मणों के लड़कों के साथ स्कूल जाता हूं.