सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर ने असम सीएम हिमंता बिस्वा शर्मा के ‘मिया मुस्लिमों’ – यानी बांग्ला भाषी मुसलमानों – पर की गई विवादास्पद टिप्पणियों के लिए दिल्ली के हौज़ खास थाने में शिकायत दर्ज कराई थी. इसके जवाब में शर्मा ने मंदर के ख़िलाफ़ सौ केस दर्ज कराने की बात कही है. इस पर मंदर ने कहा कि इन धमकियों का उनके काम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. वह बुलंदी से काम करेंगे.
माओवाद ख़त्म किए जाने के सरकारी दावों के बीच छत्तीसगढ़ का आदिवासी बहुल बस्तर क्षेत्र अब निवेश का नया केंद्र बनकर उभर रहा है. हालांकि स्थानीय आदिवासी उनके जंगल और ज़मीन छिन जाने को लेकर आशंकित हैं.
2025 में विभिन्न दुर्घटनाएं हुईं और रेलवे भी इससे अछूता नहीं रहा. भारत जैसे देश में रेलवे सिर्फ एक परिवहन व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक जीवन की धुरी है. उसकी बदहाली महज़ एक व्यवस्था की नाकामी नहीं, बल्कि आम जनता के विश्वास और अधिकारों पर चोट है.
देश में माओवाद के ख़त्म होने की चर्चाएं तेज़ हैं, और दावा किया जा रहा है कि यह विकास की शुरुआत है. लेकिन माओवाद प्रभावित क्षेत्रों का आदिवासी समाज अपने जल-जंगल-ज़मीन को लेकर चिंतित है. खनन, सैन्य कैंपों के विस्तार और संसाधनों पर बढ़ते कॉरपोरेट दावों के बीच उनके अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े हैं.
दुनिया भर में सरकारें और निजी कंपनियां मूलवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं. और उन्हीं आदिवासियों को पर्यटकों के मनोरंजन की वस्तु बना दिया जा रहा है.
माड़वी हिड़मा पुलिस के दस्तावेज़ों में मोस्ट वांटेड नक्सली था, लेकिन आम लोगों के लिए हीरो था, जिसने अपने जल-जंगल-जमीन के लिए हथियार उठाया था. ग्रामीण आरोप लगा रहे हैं कि हिड़मा को मुठभेड़ में नहीं, बल्कि हिरासत में लेकर मारा गया है.
हिड़मा माओवादियों की सेंट्रल कमेटी के युवा सदस्य थे और दंडकारण्य स्पशेल जोनल कमेटी के सचिव बनने वाले पहले आदिवासी नेता थे. उनकी मृत्यु माओवादी पार्टी के उस धड़े के लिए बहुत बड़ा झटका है, जो सशस्त्र संघर्ष जारी रखना चाहता है.
मओवादियों के बीच गहरे मतभेद पनप चुके हैं. अगर एक गुट हथियार डालना चाहता है, दूसरा कह रहा है कि अपने हथियार पुलिस को देने के बजाय हमें सौंप दो, नहीं तो हमारे लड़ाके आपसे छीन लेंगे.
माओवादियों की तेलंगाना राज्य कमेटी ने पार्टी प्रवक्ता अभय उर्फ सोनू के हालिया बयान से उपजे उन कयासों पर विराम लगा दिया है कि पार्टी हथियारबंद संघर्ष को त्यागकर और हथियार डालने जा रही है. कहा कि यह किसी एक नेता की व्यक्तिगत राय हो सकती है, पार्टी का मत नहीं है.
अगर माओवादी हथियार डाल देते हैं, तो उनके आगामी क्रियाकलाप क्या होंगे? क्या वे किसी राजनीतिक दल के साथ जुड़ जाएंगे, जिन्हें वे अब तक प्रतिक्रियावादी और बुर्जुआ कहते आ रहे हैं, या अपनी नई पार्टी बना लेंगे?
हमने अपनी पिछली ख़बर में माओवादियों के बाद उभरते दंडकारण्य के बदलते चेहरे को गढ़चिरौली के माध्यम से दिखाया था. जैसे-जैसे माओवादी आंदोलन सिमटता जा रहा है, आदिवासी इलाकों में माइनिंग कंपनियां आ रही हैं. यह क़िस्त इस प्रक्रिया के पर्यावरण और सामाजिक जीवन पर पड़ते प्रभाव की पड़ताल करती है.
पिछले कुछ समय से महाराष्ट्र के गढ़चिरौली ज़िले में माओवादी सिमटते गए हैं, उनकी जगह माइनिंग कंपनियां आती गई हैं. यह पूरा कारोबार मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की निगरानी में हो रहा है, जिन्होंने ख़ुद को इस ज़िले का संरक्षक मंत्री नियुक्त कर दिया है. आदिवासियों के इस जंगल पर माइनिंग का क्या प्रभाव पड़ेगा? गढ़चिरौली पर हमारी सीरीज़ की पहली क़िस्त.
बीते 1 फरवरी को छत्तीसगढ़ के बीजापुर ज़िले के गंगालूर इलाके में पुलिस ने तोड़का-कोरचेली गांवों के पास जंगल में मुठभेड़ में आठ इनामी माओवादियों को मारने का दावा किया था. अब ग्रामीण और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे फ़र्ज़ी बताते हुए कहा है कि मारे गए लोग ग्रामीण थे.
इंडिया गठबंधन के नेताओं द्वारा उठाए इन प्रश्नों को इस तथ्य से बल मिलता है कि भले ही कांग्रेस अपना खाता तक नहीं खोल पाई, पार्टी ने कहा कि चुनाव के नतीजे प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों की पुष्टि नहीं, बल्कि अरविंद केजरीवाल और आप पर जनमत संग्रह हैं.
गढ़चिरौली ज़िले के मोहगांव में ग्रामसभा 2019 से गोंडी मीडियम स्कूल संचालित कर रही है. वर्ष 2022 में सरकार ने उसे अवैध घोषित कर दिया था. इसे बचाने के लिए अब बम्बई की उच्च अदालत में क़ानूनी लड़ाई चल रही है.