क़िस्सा कुलगुरु के हाथों लेखक के अपमान का

कोई व्यक्ति जब एक लोकतांत्रिक परिवेश में बोलता है, वह यह शर्त कैसे लगा सकता कि उसे सुना ही जाए. आप बोलिए, मगर सुनने का अधिकार श्रोताओं के पास सुरक्षित रहता है: यह अधिकार संवैधानिक है. न सुनना भी इक तरह की अभिव्यक्ति ही है. मनोज रूपड़ा भी कुलपति के विषय से भटके हुए भाषण को न सुनकर अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का ही उपयोग कर रहे थे.

रचनाकार का समय: काल के महाकाव्यात्मक बोध पर राष्ट्रवाद का मंडराता ख़तरा

हमारी सभ्यता की समावेशिता, हमारे महाकाव्यों के खुलेपन पर आधुनिकता के सबसे खतरनाक हथियार राष्ट्रवाद का हमला हो रहा है. हम भारतीय अंतश्चेतना को इस हमले से किस हद तक बचा सकेंगे, यही हमारी सृजनशीलता की केंद्रीय चुनौती है. रचनाकार का समय में पढ़िए उदयन वाजपेयी को.