क्या पंद्रह अगस्त 1947 के बाद ‘हम’ का यह दायरा निरंतर फैलता गया है या वह फैलते-फैलते सिकुड़ना शुरू हो गया है? या कभी फैला ही नहीं है? यह सब कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब देश के हर सदस्य को खुद ढूंढने होंगे.
कोई व्यक्ति जब एक लोकतांत्रिक परिवेश में बोलता है, वह यह शर्त कैसे लगा सकता कि उसे सुना ही जाए. आप बोलिए, मगर सुनने का अधिकार श्रोताओं के पास सुरक्षित रहता है: यह अधिकार संवैधानिक है. न सुनना भी इक तरह की अभिव्यक्ति ही है. मनोज रूपड़ा भी कुलपति के विषय से भटके हुए भाषण को न सुनकर अपनी अभिव्यक्ति के अधिकार का ही उपयोग कर रहे थे.
हमारी सभ्यता की समावेशिता, हमारे महाकाव्यों के खुलेपन पर आधुनिकता के सबसे खतरनाक हथियार राष्ट्रवाद का हमला हो रहा है. हम भारतीय अंतश्चेतना को इस हमले से किस हद तक बचा सकेंगे, यही हमारी सृजनशीलता की केंद्रीय चुनौती है. रचनाकार का समय में पढ़िए उदयन वाजपेयी को.