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यासमीन रशीदी

‘सारा को वही लोग समझ सकते हैं जिनके पास सारा जैसा दिल हो’

पुस्तक समीक्षा: उर्दू की प्रसिद्ध आलोचक अर्जुमंद आरा द्वारा किए गए सारा शगुफ़्ता की नज़्मों के संग्रह- ‘आंखें’ और ‘नींद का रंग’ के हिंदी लिप्यंतरण हाल में प्रकाशित हुए हैं. ये किताबें शायरी के संसार में उपेक्षा का शिकार रहीं सारा और अपनी नज़र से समाज को देखती-बरतती औरतों से दुनिया को रूबरू करवाने की कोशिश हैं.

औरत मुंह खोलती है तो मर्दों की आंखें बाहर आ जाती हैं

वीडियो: उर्दू और पंजाबी की मशहूर लेखिका और कवियत्री सारा शगुफ़्ता सिर्फ 29 साल की उम्र में आत्महत्या कर ली थी. आज भी उनकी शायरी को एक औरत के दुखों के संदर्भ में पढ़ा जाता है. उनको याद करते हुए उनके जीवन संघर्ष को बता रही हैं यासमीन रशीदी.

क्या मुस्लिम लड़कियों को तालीम के नाम पर ग़ुलाम बनाने की कोशिश की गई है?

वीडियो: मुस्लिम लड़कियों को लड़कों से अलग शिक्षा दिए जाने के सवाल उठने पर चंद मुस्लिम महिलाओं की सफलता की मिसाल दी जाती है, लेकिन क्या एक आम घर की मुस्लिम लड़की को शिक्षा का वही अधिकार और माहौल मिलता है, जिसके दावे किए जाते हैं?

क्यों मुस्लिम लड़कियों को लड़कों से अलग शिक्षा दी जाती है?

वीडियो: आज भी मुस्लिम लड़कियों को किताबों में ‘अच्छी’ औरत बनने के तरीके, खाने-पकाने और शौहर को ख़ुश रखने के हुनर सिखाए जा रहे हैं.

क्यों राजनीति ने उर्दू को मुसलमान बना दिया है?

आम जनमानस में उर्दू मुसलमानों की भाषा बना दी गई है, शायद यही वजह है कि रमज़ान की मुबारकबाद देने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने उर्दू को चुना. सच यह है कि जम्मू कश्मीर, पश्चिम बंगाल, केरल जैसे कई मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उर्दू नहीं बोली जाती.

क्या आधुनिक शिक्षा के पैरोकार सर सैयद अहमद ख़ान औरतों की तालीम के ख़िलाफ़ थे?

सर सैयद का मानना था कि जब मर्द लायक़ हो जाते हैं, तब औरतें भी लायक़ हो जाती हैं. जब तक मर्द लायक़ न हों, औरतें भी लायक़ नहीं हो सकतीं. यही सबब है कि हम कुछ औरतों की तालीम का ख़्याल नहीं करते हैं.