आशा भोसले: इस पल के आगे की हर शय फ़साना है…

स्मृति शेष: आशा भोसले एक ऐसे दौर की उपज रहीं, जहां शास्त्रीयता के लिए आवाजाही थी, प्रयोगों के लिए खुला आसमान था, मैलोडी युक्त प्रणय गीतों के लिए उतनी ही सुंदर और शोख़ फिल्में बनाई जा रही थीं. उनके जाने से एक बड़ी रिक्तता तो आई है, मगर उनकी आवाज़ का वज़न हमेशा मौजूद रहेगा.

वो बच्चा जो दीना में छूट गया, वो शायर जो दिल्ली में जवान हुआ…

पुस्तक अंश: गुलज़ार के गीतों और फिल्मों ने कई पीढ़ियों को संस्कार दिया है, हिंदी सिनेमा के भीतर शास्त्रीयता की संभावना को जीवित रखा है. यतीन्द्र मिश्र ने अपनी किताब में इस बेजोड़ कलाकार की आत्मा को बड़ी बारीकी से अंकित किया है.