क्या मुज़फ़्फ़रनगर पर जो सैको की किताब का नाम सरकार की बेचैनी की वजह है?

जो सैको की किताब 'द वंस एंड फ्यूचर रायट' पहले फ्रेंच में प्रकाशित हुई. भारत में भी यह उम्मीद की जा रही थी कि इसका भारतीय संस्करण - अंग्रेज़ी में - जल्द ही पाठकों के हाथों में होगा. हालांकि, अब लगभग तय है कि इसका भारतीय संस्करण पाठकों तक नहीं पहुंचेगा.

बशीर बद्र: बादल का साया है दुनिया, हर शै आनी-जानी है

द वायर उर्दू के संपादक फ़ैयाज़ अहमद वजीह मक़बूल शायर बशीर बद्र को याद करते हुए लिखते हैं कि 'सादा लफ़्ज़ों की मीनाकारी उनके यहां इस क़दर है कि उन्हें उर्दू शायरी का ‘गोल्डस्मिथ’ और ‘ज़रगर’ कहते हुए मेरे सामने उस कुम्हार की सूरत आ जाती है जो कच्ची मिट्टी के साथ रक्स करते हुए अपनी आंखों के सुनहरे जादू जगाता है. बशीर बद्र इसी जादू के शायर हैं.'

महाभारत और जाति का सवाल: क्या इसे राष्ट्रीय महाकाव्य कहा जाना चाहिए?

पुस्तक अंश : एक ग्रन्थ के रूप में इसकी क्रमागत उन्नति के इतिहास के बावजूद जो सम्भावित प्रश्न इक्कीसवीं सदी के ‘महाभारत’ के श्रोता अथवा पाठक पूछ सकते हैं वह यह है कि, ‘क्या यह विभाजनकारी सामाजिक प्रथाओं को न्यायोचित ठहराता है?’ और यदि ऐसा है तो क्या हमें इसे एक राष्ट्रीय महाकाव्य का दर्जा देना चाहिए?

दिल्ली सरकार ने हिंदी साहित्यिक सम्मानों का नाम बदलकर सावरकर, भाजपा नेताओं के नाम पर रखा

दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने शीर्ष साहित्यिक सम्मानों का नाम बदलकर आरएसएस और भाजपा से जुड़े व्यक्तियों के नाम पर रखा है. वीडी सावरकर और अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर पुरस्कार के नामकरण के साथ ही अकादमी ने सर्वोच्च सम्मान ‘हिंदी अकादमी शलाका सम्मान’ के नाम में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम जोड़ा है.

दास्तान-ए-गुरुदत्त: किसको फ़ुरसत है जो थामे दीवानों का हाथ

पुस्तक समीक्षा: महमूद फ़ारूक़ी की ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ में गुरुदत्त के द्वंद्व को समझने की कोशिश है. दास्तानगो मानो अपने रोल मॉडल के जीवन के कतरनें बटोरकर उससे बनी एक तस्वीर लोगों के सामने पेश करने की कवायद कर रहा है. और इसलिए अगर इस तस्वीर में उज्ज्वल पक्ष निखरकर सामने आया है तो कुछ स्याह पहलू भी. मगर आख़िर में गुरुदत्त को फ़क़ीर के आसन पर बिठा ही दिया गया है.

ज्ञान का विउपनिवेशीकरण: ज्ञान अपर्याप्त और शाश्वत होने को अभिशप्त है

कभी कभार | अशोक वाजपेयी: हमारे यहां हुए विउपनिवेशीकरण के अध्ययन में उपनिवेशवाद के भाषाई साम्राज्य का विश्लेषण बहुत कम है. सारी उत्तर-आधुनिकता के बावजूद पश्चिम अपने विचारों को सारे संसार में मनवाने में सफल हुआ है. विडंबना यह है कि हिंदुत्व के नाम पर जो राजनीतिक विचारधारा आज परंपरा के पुनर्वास और भारतीय आत्मबोध के नवजागरण का दावा कर रही है वह अपनी समझ में पूरी तरह औपनिवेशिक है.

बंगनामा: सरकारी विभाग का ‘रास्ता बताओ तो आगे चलो’ का दायित्व

'तमलुक आने के कुछ दिनों बाद मैंने पाया कि मेरा हर सोमवार और शुक्रवार कलकत्ता उच्च न्यायालय में बीत रहा है. ऐसा लगने लगा था कि हरेक मामले में ही ज़िला भूमि व भूमि संस्कार अधिकारी, तमलुक ने न्यायालय की अवमानना की है.' बंगनामा की इस क़िस्त में एक पुराना विभागीय क़िस्सा.

बशीर बद्र: तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूं मैं…

स्मृति शेष: बशीर साहब मानते थे कि कविता का जीवन उसके लिखे जाने के साथ समाप्त नहीं हो जाता, बल्कि वह तो शुरू ही तब होता है जब वह पाठकों तक पहुंचती है. एक बार रचना, अस्तित्व में आ जाए तो उसके अर्थ, उसकी ग्राह्यता केवल लेखक के अधिकार में नहीं रहते. हर पाठक उसे अपने अनुभवों, स्मृतियों, संवेदनाओं और जीवन-दृष्टि के आलोक में पढ़ता है.

छाया: करुणा की कोमल लय और प्रेम की अंतर्धारा

पुस्तक समीक्षा: मैथिली के वरिष्ठ कवि एवं सुप्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक उदय नारायण सिंह नचिकेता के काव्य संग्रह 'छाया' में कविताओं की कई परतें हैं. इनमें पौराणिक आख्यानों, लोकसंस्कृति की लय, समकालीन जीवन की धड़कन और वैश्विक परिघटनाओं की अनुगूंज समाहित है, जो इस कविता संग्रह को भारतीय काव्य-साहित्य की परंपरा में एक अनुपम कृति का दर्जा दिलाती है.

कविता और सत्ता का सहकार

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आज की भारतीय सत्ता को कविता की कोई ख़बर ही नहीं है. शायद उसे पता है कि आज की अधिकांश कविता इस सत्ता द्वारा फैलाए जा रहे झूठों-घृणा-हिंसा आदि से सहमत नहीं और ज़्यादातर उसके विरोध में है. कवि अल्पसंख्यक भी हैं. इसलिए उनकी उपेक्षा इस सत्ता के अल्पसंख्यक विरोधी रुख़ का भी नतीजा है.

बशीर बद्र का गांव: ‘…जो छोड़ दिया फिर उसे मुड़कर नहीं देखा!’

बशीर बद्र के गुज़रने के बाद उनके जन्मस्थान के तौर पर कहीं अयोध्या तो कहीं कानपुर का नाम दर्ज हो रहा है, मगर उनके पैतृक गांव बुकिया (ज़िला अंबेडकर नगर) से दुनिया अनजान ही है. बात यह भी है कि देश-दुनिया में बशीर बद्र और उनकी शायरी को कितनी भी शोहरत हासिल क्यों न हुई हो, अपने गांव के लिए वे कई मायनों में जीवन भर अजनबी से ही बने रहे.

मुसाफ़िर हैं हम भी, मुसाफ़िर हो तुम भी… नहीं रहे मशहूर शायर बशीर बद्र

मशहूर उर्दू शायर बशीर बद्र का गुरुवार (28 मई) दोपहर करीब साढ़े बारह बजे भोपाल में निधन हो गया. प्रेम, विस्थापन और इंसानी रिश्तों को सरल लेकिन असरदार भाषा में कहने वाले बद्र के शेर संसद से लेकर आंदोलनों तक गूंजते रहे.

इतिहास की थाली और भूख का स्वाद

पुस्तक अंश: 'दुनिया में जितना अनाज सड़ता है या जितना भोजन रोज़ फेंक दिया जाता है, उसको सही से व्यवस्थित कर दिया जाए, तो समस्या काफ़ी हद तक हल हो जाएगी, मगर ऐसा होता नहीं है. सत्ता ख़ुद को पक्ष विपक्ष में बांट लेती है और सत्ता की भूख पेट भरने से नहीं सामने वाले पक्ष को भूखा रखने से मिटती है.' पढ़िए अनिमेष मुखर्जी की 'इतिहास की थाली' का यह हिस्सा.

लस्ट फॉर लाइफ: रंगों में घुलते एक कलाकार की त्रासदी और विन्सेंट वॉन गॉग का अंतहीन अकेलापन

पुस्तक समीक्षा: अशोक पांडे द्वारा अनूदित इरविंग स्टोन की ‘लस्ट फॉर लाइफ’ महज विन्सेंट वॉन गॉग की जीवनी नहीं, बल्कि एक कलाकार के भीतर टूटते, जलते और सृजन में ख़ुद को खपा देने वाले मनुष्य की कथा है. यह किताब बताती है कि महान कला के पीछे कई बार गहरा अकेलापन, अस्वीकार का दर्द और आत्मक्षय की लंबी यातना छिपी होती है.

नवल के मुक्तिबोध

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विचारधारा से प्रेरित आलोचक अक्सर कृति या लेखक पर धारा का ऐसा आच्छादन तान देते हैं कि हमें धारा का पता तो चलता है, कृति या लेखक की विशिष्टता या अद्वितीयता का बहुत कम. नंदकिशोर नवल इसका अपवाद हैं. हमारा समय धर्माक्रांत समय हो गया है. उसमें मुक्तिबोध की नवल-व्याख्या में यह जानना-समझना सम्यकता की ओर बढ़ने जैसा है.