पुस्तक समीक्षा: मुश्ताक ख़ान ने 'भारत की आदिवासी-लोक चित्रकला' में लिखते हैं ये लोक-कलाचित्र मात्र प्रदर्शन की वस्तु नहीं आदिवासी लोक जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं. परंपरा का सबसे प्रमुख कार्य यही है. वह लोककला को केवल प्रदर्शनीय वस्तु न रहने देकर उसे जीवन का अंग बना देती है. इस प्रकार कलाकृति उस समाज की मान्यताओं का दर्पण बन जाती है.
साहित्य अकादमी ने हिंदी में ममता कालिया, अंग्रेज़ी में नवतेज सरना, उर्दू में प्रितपाल सिंह बेताब, और पंजाबी में जिंदर समेत कुल 24 भारतीय भाषाओं के लेखकों को साहित्य अकादमी पुरस्कार देने का ऐलान किया है. इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए इस बार आठ कविता-संग्रहों, चार उपन्यासों, दो कहानी संग्रहों, एक साहित्यिक आलोचना, एक आत्मकथा और दो संस्मरण पुस्तकों का चयन के लिए किया गया है.
राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा ने लेखक राही मासूम रज़ा की पुण्यतिथि पर उन्हें याद करते हुए यह भावपूर्ण पत्र लिखा है. इसमें रज़ा की साहित्यिक विरासत, उनकी मानवीय दृष्टि और आज के समय में उनके शब्दों की प्रासंगिकता पर आत्मीयता से विचार किया गया है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: बीसवीं सदी में यूरोप में नाज़ियों के युद्ध और नरसंहार के समय जैसी चुप्पी यूरोप में छा गई थी, वर्तमान चुप्पी, उसका एक नया दुखद और शर्मनाक संस्करण है. स्वयं भारत ने इस बीच अपना जो नैतिक अवमूल्यन किया है वह समझना मुश्किल है.
पूर्वी भारत में आने वाली बिजली, बारिश और ओलों से लैस विनाशकारी आंधी को, जिसे अंग्रेज़ी में नॉर्वेस्टर कहते हैं, बंगाल में काल बैसाखी के नाम से जाना जाता है. ‘काल’ का तात्पर्य यहां मृत्यु से है और ‘बैसाखी’ क्योंकि बैसाख में इनकी व्यापकता रहती है. काल बैसाखी अक्सर ही तबाही का संदेश ले कर आती है.
दिल्ली के कमानी सभागार में लेखिका अरुंधति रॉय ने अपनी किताब 'मदर मैरी कम्स टू मी' पर चर्चा के बाद ईरान पर अमेरिका-इज़रायल हमले को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें सामने रखीं. साथ ही मौजूदा समय में जारी पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान भारत सरकार की चुप्पी पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि जो हो रहा है वह गाज़ा में अमेरिकी-इज़रायली नरसंहार की निरंतरता में ही है लेकिन ईरान गाज़ा नहीं है.
पुस्तक अंश: एक अर्थ में हुसेन की ज़बान समकालीन भारतीय चित्रकार की ज़बान है. इस ज़बान का, अपने पूर्ववर्ती और मौजूदा बोलियों से रिश्ता स्पष्ट देखा जा सकता है. हुसेन ने आज़ाद हिन्दुस्तान की कला को एक नया स्वतन्त्र स्वरूप प्रदान किया है. पढ़िए अखिलेश द्वारा लिखित मक़बूल फ़िदा हुसैन: जीवनी और विचार' का अंश.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: ईरान में दशकों से एक आततायी धार्मिक तानाशाही थी जिससे निजात पाने की ज़िम्मेदारी ईरानी जनता की है. अमेरिका-इज़रायल उसके सर्वोच्च शासक की हत्या कर दें यह किसी भी तरह से उचित नहीं समझा जा सकता. कल को कोई और देश हमारे यहां सत्ता-परिवर्तन करने के लिए हमला कर दे तो क्या इसे हम स्वीकार कर लेंगे?
पुस्तक समीक्षा: आलोचक और अनुवादक बलवंत कौर की विभाजन पर आई शोधपरक किताब ‘स्मृति और दंश’ इतिहास लेखन नहीं है. किताब विभाजन की निरंतरता को स्वातंत्र्योत्तर परिप्रेक्ष्य में उन सभी महत्त्वपूर्ण पड़ावों पर देखती है, जो हमारे वर्तमान की दुश्चिंताओं के उत्तरदायी हैं. आज के ध्रुवीकृत माहौल में ऐसी किताबें हमें अपने विवेक और दृष्टि के संकुचित करने के ख़तरों के प्रति आगाह करती हैं.
पुस्तक अंश: ईरान और अमेरिका के कटु रिश्तों का इतिहास पुराना है. ईरान के तेल पर अपना और पश्चिम का अधिकार जमाए रखने के लिए अमेरिका ने जो हिंसक, आपराधिक और घृणास्पद काम किए हैं उनकी सूची लम्बी है. सी.आई.ए. की दस्तावेज़ से ही अब पक्के प्रमाण उपलब्ध हैं कि ईरान के राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री की सत्ता पलटने के लिए अमेरिका और ब्रिटेन ने जनरल फ़ज़लुल्लाह जाहिदी और सेना को पांच मिलियन डॉलर दिए थे. उस समय ईरान में कम्युनिस्ट पार्टी
पुस्तक समीक्षा: रोहिंग्या जनसंहार की भयावह पृष्ठभूमि में मय्यू अली की किताब ‘इरैडिकेशन’ केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि मिटा दिए जाने के ख़िलाफ़ कविता का प्रतिरोध है. यह पुस्तक बताती है कि नफ़रत कैसे जन्म लेती है और स्मृति, भाषा व साहस किस तरह अस्तित्व को बचाने का आख़िरी सहारा बनते हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: 'कविता क्या है?’ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल कहते हैं कि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे त्यों-त्यों एक ओर तो कविता की आवश्यकता बढ़ती जाएगी, दूसरी ओर कविकर्म कठिन होता जाएगा.’
स्मृति शेष: 'चौरंगी' का रखवाला अपनी कथा से बाहर चला गया है. लेकिन उसके खोले हुए दरवाज़े अब भी खुले हैं. मणि 'शंकर' मुखर्जी केवल अपनी पुस्तकों को नहीं, एक दृष्टि को छोड़ गए हैं. उन्होंने सिखाया कि साधारण जीवन के भीतर भी महाकाव्य छिपे होते हैं. होटल की लॉबी और दफ्तर की मेज़ के भीतर भी मनुष्य की पूरी कथा दर्ज हो सकती है.
बनारस के घाटों पर समय बिताकर कलकत्ता के घाटों का ध्यान आना स्वाभाविक था. वाराणसी के घाटों का अध्यात्म और परलोक से संबंध अधिक है और कलकत्ता के घाटों का ज़्यादा सरोकार है इस लोक में जीवनयापन से. बंगनामा की चालीसवीं क़िस्त.
विश्व सभ्यता में आज शक्तिशाली-बाहुबली अत्याचारियों और शासकों, तानाशाहों, नृशंस अमीरों, प्रबल टैक्नोक्रेट का वर्चस्व है. पर इसी समय में कविता आज भी बहुत सारे जलावतन हुए लोगों और कवियों की मातृभूमि है- बेघरबार हुओं का आख़िरी घर है. रज़ा फाउंडेशन द्वारा आयोजित किया जा रहा अंतरराष्ट्रीय कविता समारोह ‘संसार’ इन्हीं कविताओं को बचाए रखने का प्रयास है.