सरकारी अनुमोदन के भरोसे साहित्य अकादेमी की ‘स्वायत्तता’!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस वर्ष साहित्य अकादेमी पुरस्कार एक प्रेस वार्ता में घोषित किए जाने के पहले संस्कृति मंत्रालय के निर्देश पर रोक लिए गए कि मंत्रालय से उनका अनुमोदन होना है. यह अकादेमियों की स्वायत्तता को सीधे अवमूल्यित करना और अकादेमी के लेखक-सदस्यों, जूरी के लेखक-सदस्यों और पुरस्कार के लिए अनुशंसित लेखकों सभी का एक साथ अपमान है.

‘मतलब हिन्दू’ अपने कथ्य में नहीं व्यंजना में खुलता है

पुस्तक समीक्षा: लब्ध चित्रकार-गद्यकार अखिलेश लिखते हैं, 'अम्बर पाण्डेय का 'मतलब हिन्दू' उपन्यास अपने कथ्य-कहानी और उसके प्रवाह के साथ ही अपनी भाषा के कारण मुझे अद्वितीय लगा. कहानी एक युवक की है जो ब्राह्मण है और उसके जीवन में आए उन लम्हों की है, जब उसने निस्संकोच अपना ब्राह्मणत्व त्यागा. जो मुझे भाया वह उपन्यास की हिंदी भाषा है, जो अपने में लोक समेटे है.'

‘जब याद आए तो तारों के पड़ोस में, किसी भी तारे को ढूंढकर मुझे देख लेना…’

स्मृति शेष: विनोद कुमार शुक्ल के यहां विचार से मनुष्यता नहीं बनती, मनुष्यता से विचार उपजता है. भाषा व्याकरण का पालन नहीं करती- उनकी रचना उनकी कल्पना का व्याकरण है.

ईश्वर का उन्मूलन: धर्म, सत्ता और दासता पर पेरियार की तीखी वैचारिक चुनौती

पुस्तक अंश: धर्म और धर्म-शास्त्र के निर्माण का एकमात्र उद्देश्य बौद्धिकता और आजादी को नष्ट करना और लोगों को मूर्ख और दास बनाना है. यह उस समय चलन में आया, जब मनुष्य आदिम अवस्था में रहा करता था; कमोबेश जानवरों की तरह. जिस प्रकार लोग भूत-प्रेत और आत्माओं से भयभीत रहते थे, ठीक वही डर धर्म और धार्मिक शास्त्र भी पैदा करते थे.

विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे: जाते जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब, तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा…

हिंदी साहित्य के वरिष्ठ कवि-कथाकार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल का 88 वर्ष की उम्र में निधन हो गया. वे कई दिनों से एम्स रायपुर में भर्ती थे. उनकी सादगीपूर्ण भाषा और मानवीय संवेदनाओं से भरी रचनाओं ने हिंदी साहित्य को विशिष्ट पहचान दी.

किसी पुरस्कार या सम्मान का मान ऊंचा रखना हमेशा देने वाले के हाथ में होता है, पाने वाले के नहीं: कथाकार शिवमूर्ति

लब्धप्रतिष्ठ कथाकार शिवमूर्ति को पिछले दिनों अवध का प्रतिष्ठित 'माटी रतन' सम्मान दिया गया. उन्हें आम तौर पर दलितों-वंचितों, स्त्रियों और गांवों के ऐसे कथाकार के रूप में जाना जाता है, जो अपनी रचनाओं में क़िस्सागोई की शैली में मानव जीवन की साधारणता के असाधारण आख्यान रचता है. पेश है उनसे लंबी बातचीत के मुख्य अंश.

संगीत ने स्त्रियों को और स्त्रियों ने संगीत को सशक्त किया…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: संगीत में स्त्रियों की उपस्थिति का साक्ष्य विरल है मगर आधुनिक शास्त्रीय संगीत में जल्दी ही स्त्रियों की शिरकत होने लगी. मिनिएचर कला में जो रागमाला का चित्रण है वह मुख्यतः स्त्री-केंद्रित है. ख़याल गायकी में स्त्री की उपस्थिति प्रबल और व्यापक है.

बंगनामा 35- अलीपुरद्वार में आई बाढ़ – भाग चार

1993 में अलीपुरद्वार में एकाएक आई बाढ़ ने सब कुछ बदलकर रख दिया था. देर से पहुंची राहत, अन्न की लूटपाट व दंगे स्थिति को और भयावह बना रहे थे. ऐसे में सबडिवीज़न के प्रशासन को सेना का ही सहारा था, पर क्या सेना के लिए यह मदद करना संभव था? पढ़िए बंगनामा की पैंतीसवीं क़िस्त.

द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली: औरतों की जानिब से ग़ैर-आधिकारिक हिंदू राष्ट्र युक्त भारत को एक जवाब

अनुषा रिज़वी की 'द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली' फिल्म के किरदारों के नाम भले मुस्लिम हैं मगर उनके अभिनय में हिंदू राष्ट्र के किरदारों की परछाई तैर रही है. नारों की ध्वनि सुनाई दे रही है. फिल्म के पर्दे पर इनमें से कोई साक्षात दिखाई नहीं देता लेकिन उनकी मौजूदगी का अहसास बना हुआ है. यही इस फिल्म का कमाल है.

हमारा समय देर-सबेर बीत जाएगा, साहित्य नहीं बीतेगा

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: साहित्य का आज यह आपद्कार्य है कि वह खुली आंखों से साहस को पहचाने और उसकी भी निगरानी करे कि वह कहां-कब ग़ायब हो जाता है. साहित्य का, इस समय, यह भी कर्तव्य है कि वह स्वयं निर्भय हो, भयोत्पादक व्यवस्थाओं में शामिल या उनके बारे में चुप्पी साधने से इनकार करे और हमें निर्भयता की ओर ले जाए.

सलमान रुश्दी ने मोदी सरकार में बढ़ते हिंदू राष्ट्रवाद और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमलों पर चिंता जताई

प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी ने ब्लूमबर्ग को दिए इंटरव्यू में भारत में बढ़ते हिंदू राष्ट्रवाद, मुसलमानों की छवि को निशाना बनाए जाने और पत्रकारों-लेखकों पर दबाव को लेकर चिंता जताई. उन्होंने कहा कि उन्होंने इन ख़तरों के संकेत दशकों पहले ही देख लिए थे, जिनकी पुष्टि अब हो रही है.

इंदिरा गांधी एंड द इयर दैट ट्रांसफ़ार्म्ड इंडिया: परिवर्तनकारी राजनीति की प्रतीक इंदिरा या सिर्फ़ विरोधाभास?

पुस्तक समीक्षा: श्रीनाथ राघवन की 'इंदिरा गांधी एंड द इयर दैट ट्रांसफ़ार्म्ड इंडिया' स्वयं को एक 'समग्र' राजनीतिक इतिहास के रूप में प्रस्तुत करती है. लेखक का दावा है कि किताब इंदिरा गांधी के शासन को 'परिवर्तन के युग' के रूप में समझती है. हालांकि, इंदिरा गांधी पर लिखी ढेरों किताबों की तुलना में यह कोई नया परिप्रेक्ष्य देने से चूक जाती है.

समकालीन कला उतनी स्मृतिहीन नहीं है जितनी समकालीन आलोचना

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी आलोचना की तरह, कलालोचना में, ‘नितान्त समसामयिकता’ का लगभग वर्चस्व-सा है. आलोचना का एक बड़ा हिस्सा गैलरियों के आग्रह और उनके द्वारा दिए गए मोटे पारिश्रमिक पर लिखा जाता है. इसलिए उसमें विश्लेषण और प्रशंसा तो होती है, किसी तरह की कमी का उल्लेख नहीं होता.

भक्ति अगाध अनंत: भारतीयता के आत्मस्वर का संधान

पुस्तक समीक्षा: माधव हाड़ा द्वारा संपादित ‘भक्ति अगाध अनंत’ ऐसा संचयन है, जिसकी आवश्यकता लंबे समय से केवल अकादमिक संस्थानों या सुधि साहित्यिकों को नहीं थी वरन् जिसकी सर्वाधिक ज़रूरत रसहीन होते जा रहे सहृदय समाज को थी. यह संचयन देशज भक्ति परंपरा का अनुभव द्वार है, जिसमें बहुत ही स्पष्ट ढंग से भारतीय एवं पश्चिमी भक्ति अवधारणा और उससे संबंधित संशयों के निराकरण का उचित प्रयास है.

न कोई तटस्थ साहित्य होता है, न तटस्थ इतिहास…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इतिहास ज़्यादातर बहिर्मुख होता है, साहित्य अंतर्मुख भी. सचाई पर दोनों में से किसी का एकाधिकार नहीं होता, न हो पाता है. इतिहास और साहित्य दोनों की सचाई के गल्प रचते हैं. साहित्य अपनी गल्पता खुले ढंग से स्वीकार करता है पर इतिहास को अपनी गल्पता स्वीकार करने में हिचक है, होती है.