एकाएक आई बाढ़ के अगले दिन अलीपुरद्वार से कालजानी का पानी उतरने लगा, और पीछे छोड़ गया कीचड़ से भरे घर, मवेशियों के शव और मटमैले पानी से भरी सड़कें और क्रुद्ध शहरवासी. इन सबसे निपटने का क्या रास्ता था? क्या सरकार को इसकी ख़बर थी? पढ़िए बंगनामा की चौंतीसवीं क़िस्त.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: जब किसी समाज के इतने सारे लोग यह महसूस करने लगें कि वे कुछ नहीं कर सकते; दूसरों को अच्छा-बुरा कहते-करते देख भर सकते हैं; कि उनकी एकमात्र चिंता अपने को सुरक्षित बनाए रखने की है; कि उनमें साहस और विकल्पबुद्धि बिल्कुल ही नहीं बचे हैं तो ऐसा समाज बीमार समाज है
पुस्तक अंश: पूंजीवादी राष्ट्रवाद को आदिवासी एक रुकावट की तरह प्रतीत हो रहे हैं. इसलिए इसको इस बात का कोई दर्द नहीं कि आदिवासी समुदायों और उनकी भाषाओं का अस्तित्व ख़त्म हो रहा है. वे हिरण की कुछ दुर्लभ प्रजातियों, शेरों और बाघों की कुछ प्रजातियों को बचाने की चिंता करेंगे लेकिन इस देश के मूल निवासियों को बचाने की चिंता उन्हें नहीं है.
पुस्तक समीक्षा: ऑर्नित शानी और रोहित डे की किताब स्थापित करती है कि संविधान कोई क़ानूनी दस्तावेज़ भर नहीं, बल्कि जनता की कल्पना और संघर्ष का जीवित इतिहास है. यह इतिहास याद दिलाता है कि संविधान सभा के बाहर भी एक और असेंबली है, जो कभी विरोध के नारे के रूप में, कभी किसी विश्वविद्यालय की दीवार पर लिखी इबारत में, तो कभी संविधान की प्रस्तावना दोहराती भीड़ में, जारी है.
छत्तीसगढ़ का रायगढ़ देश का पहला और शायद अकेला ज़िला रहा है जहां एक पुलिस अधिकारी ने कलेक्टर के रूप में काम किया. यह आज़ादी के तत्काल बाद की बात है. लेकिन रायगढ़ के कलेक्टर कक्ष में कलेक्टरों के नामों की टंगी सूची में इतिहास बनाने वाले तीन सप्ताह के कलेक्टर रुस्तमजी का नाम नहीं है.
मंटो की 'टोबा टेक सिंह' और राही मासूम 'रज़ा' का 'टोपी शुक्ला' आज भी प्रासंगिक हैं क्योंकि विभाजन 1947 में खत्म हो चुका कोई अध्याय नहीं है. दक्षिण एशिया की राजनीति में यह हमेशा मौजूद रहा है. जब भी नागरिकों से 'वो यहीं के हैं' ये साबित करने के लिए कहा जाता है, जब ध्रुवीकरण का नतीजा किसी चुनावी जीत के तौर पर निकलता है, बंटवारे को दोहराया जाता है.
पुस्तक समीक्षा: हिंदी और उर्दू की धार्मिक अस्मिता से जुड़ाव क्या केवल अंग्रेज़ों की देन थी या इसमें भारतीय विद्वानों की भी कोई भूमिका थी? इन सवालों की बहुत गहन और सारगर्भित पड़ताल शुभनीत कौशिक की हालिया किताब ‘भाषा की राजनीति, ज्ञान की परम्परा' करती है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कानजी पटेल के संपादन में हिंदी और अंग्रेज़ी अनुवाद में भारतीय समकालीन आदिवासी कविता संचयन ‘अनुत्तरित लोग’ में 141 भाषाओं के 382 कवियों की 700 कविताएं अपने मूल में हिंदी अनुवाद के साथ शामिल हैं. इस तरह यह भारत की आदिवासी कविता का सबसे वृहद संकलन है.
20 जुलाई 1993 को अलीपुरद्वार सबडिवीज़न में भीषण वर्षा हुई— नदी किनारे बसे इस शहर की रक्षा के लिए बना बांध कई स्थानों से टूटने लगा और पानी तेज़ी से नगर में घुसा. लेकिन बांध कैसे टूटा और पूरे शहर में पानी इतनी जल्दी क्यों भर गया? बंगनामा की तैंतीसवीं क़िस्त.
भाषाएं कभी इतिहास से अलग नहीं होतीं. वे समाज की जटिलता, राजनीति की चाल और सत्ता के असंतुलन से गढ़ी जाती हैं. उर्दू को अक्सर मुस्लिमों की, विदेशी और अभिजात्य भाषा के रूप में देखा गया. हिंदी को राष्ट्रवाद और 'प्रामाणिक भारतीय’ पहचान से जोड़ा गया.
पुस्तक समीक्षा: अरुंधति रॉय की 'मदर मैरी कम्स टू मी' में उनकी मां उनके जीवन रूपी उपन्यास में ऐसे पात्र के रूप में उपस्थित हैं, जो उनकी कथा का केंद्र तो हैं पर उनके इर्द-गिर्द जीवन बिताना उन्हें मंज़ूर नहीं. वह उनके जीवन की सबसे बड़ी आंधी हैं और उस अंधड़ से बचने का आश्रय भी.
पुस्तक समीक्षा: हिंदी पत्रकारिता, समाजवाद और बदलते भारत के बीच एक पत्रकार की यह आत्मकथात्मक यात्रा उस दौर की साक्षी है जब अख़बार बिक रहे थे और ईमान भी. ‘हवाओं की दस्तक’ स्मृति, संघर्ष और स्वप्नभंग के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने की ज़िद की कहानी है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी में एक ध्रुवीकरण प्रगतिशीलता-जनवाद बरक़्स कलावाद के रूप में बन गया है. इस पर ध्यान नहीं गया कि इस ध्रुवीकरण ने उस बड़ी जगह को हिसाब में ही नहीं लिया जिसमें समाजवादी दृष्टि से प्रेरित अनेक लेखक सक्रिय थे और हैं. नंद किशोर आचार्य इसी धारा के लेखक हैं.
पुस्तक समीक्षा: कवि व गद्यकार श्रीप्रकाश शुक्ल की नई किताब ‘भक्ति का लोकवृत्त और रविदास की कविताई’ रविदास के लोकवृत्त पर बहस करती है. श्रीप्रकाश की स्थापना है कि कबीर जाति व्यवस्था के बाहर से लड़ रहे थे और रविदास भीतर से लड़ रहे थे क्योंकि जाति व्यवस्था ने जितना रविदास को दबाया था, उतना कबीर के साथ नहीं था.
एक आदिवासी गोंड राजा के द्वारा बसाए गए सारंगढ़ को पान-पानी-पायलागी का नगर कहा जाता है. इसे यह नाम यूं ही नहीं मिला.