पुस्तक समीक्षा: आत्मकथाओं के भीतर निजी पीड़ा और सामूहिक इतिहास एकसाथ मौजूद रहते हैं. मदर मैरी कम्स टू मी उसी अनुक्रम का हिस्सा है. यहां मां-बेटी का रिश्ता केवल व्यक्तिगत स्मृति नहीं रह जाता; यह समाज का दर्पण बन जाता है, एक स्त्री के अकेलेपन और विद्रोह की मौन गवाही.
करीब साल भर पहले प्रोफ़ेसर अपूर्वानंद ने 'द वायर हिंदी' में 'कविता में जनतंत्र' नामक एक श्रृंखला प्रकाशित की थी. युवा लेखक विभांशु कल्ला प्रस्तावित करते हैं कि अपूर्वानंद ने भारत पर मंडराते जनतांत्रिक संकट और उसके लक्षणों की पहचान तो की, लेकिन उनके आग्रह इस संकट की उत्पत्ति और विकास को समझने में बाधा बन गये.
जब कोई व्यक्ति हिंदी साहित्य के संसार के भीतर पहला कदम रखता है, तब वह अनेक नए अनुभवों से गुज़रता है. कुछ ऐसे तजुर्बे होते हैं जिनके बारे में मालूम तक नहीं होता कि उनका अस्तित्व भी है. ऐसे ही एक अनुभव ने सिखाया कि जेंडर के दबाव से मुक्त होकर पुरुषों से संवाद करना आज भी स्त्रियों के लिए संभव नहीं. हमारा समाज आज भी इसके लिए प्रस्तुत नहीं.
औपनिवेशक नज़रिए को हमारा भाषायी परिदृश्य विचित्र प्रतीत होता है. वे नहीं समझ पाते कि हमारे यहां एक बोली के ही कई क्षेत्रीय रूप हैं. यहां बोलियां और भाषाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई भी हैं और कभी अलग भी हो जाती हैं. जैसे, असमिया बांग्ला की एक बोली भी है और भिन्न भाषा भी है.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस समय क्रूरता के इतने स्तर और इतनी बारीकियां सक्रिय हैं कि उदार मूल्यों और दृष्टि की बात करना दयनीय और हास्यास्पद दिखता है. क्रूरता मनुष्यता का स्वभाव प्रतीत होती है, उदारता नहीं.
जयंती विशेष: उन्नाव ज़िले के सफीपुर क़स्बे में 1903 में 30 अगस्त को जन्मे भगवतीचरण वर्मा अपने प्रभूत साहित्य की मार्फत यह सीख दे चुके हैं कि मनुष्य को स्वयं से भागने के बजाय अपने जीवन के अनुभवों, नियति को सहजता से स्वीकार करना और उनका आनंद लेना चाहिए. क्योंकि भूत और भविष्य केवल कल्पनाएं हैं और वर्तमान ही वास्तविक है.
बैंगलोर परतों में लिपटा शहर है. क्यूबिकल और मंदिर, सड़क पर प्रदर्शन और कविता, यादें और सेल्स पिच-सब एक ही सांस में साथ चलते हैं. यहां भीड़ और एकांत एकदूसरे को जगह देते हैं.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक तरह की अराजकता फैल रही है और सारा राजनय बेहद दबाव में है. अनैतिक आचरण अब खुलेआम हो रहा है और लोग लाचार देख रहे हैं. यह अनैतिकता और जुर्रत पूंजी-बाज़ार-मीडिया-राजनीति के महागठबंधन का परिणाम है.
सेलिन सोंग की 'मटीरियलिस्टस' निश्चित तौर पर प्रेम का रोमांटिक भाव-बोध से भरा प्रस्तुतीकरण है, पर वह जीवन की वास्तविकताओं और पात्रों के निर्णयों को रूमानियत में पिरोकर नहीं दिखाती. फिल्म आधुनिक जीवन की यंत्रचालित अंधी भौतिकता के बर-अक्स उन दुर्लभ होती संवेदनाओं का प्रतिपक्ष रचती है जिस पर ठहरकर विचार करने की ज़रूरत है.
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, जिन्होंने पुरानी गुरु-शिष्य परंपरा को पोंगापंथियों से निकाल नए अर्थ दिए
जयंती विशेष: 19 अगस्त 1907 को जन्मे हजारीप्रसाद द्विवेदी ने छायावाद के बाद युग में हिंदी को स्वतंत्र देश की ज़रूरतों के अनुरूप बनाने के विभिन्न उपक्रमों में अनथक योगदान दिया. इस क्रम में उन्होंने अनेक शिष्यों की प्रतिभा को नए संस्कार व आयाम दिए, जिसे उनकी ऐसी पहचान बनी कि आचार्य द्विवेदी को अपने सृजन के साथ उनके सृजन का श्रेय भी दिया जाने लगा.
कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: चुनाव आयोग देश और जनता के सामने कठघरे में खड़ा किया जा चुका है. वह सवालों के घेरे में है और उसे अपने को बचाने के लिए सत्ता से बेशर्म समर्थन लेना पड़ रहा है.
आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में मज़ाक़ में कहा जाता था कि कांग्रेस की टिकट पर पेड़ और खंभे भी चुनाव जीत जाते हैं. ऐसे में कांग्रेस का प्रदेशाध्यक्ष चुनाव हार जाए तो ज़ाहिर है बहुत बड़ी घटना बनती थी. नया मध्य प्रदेश राज्य बनते ही ऐसा हुआ था. वह भी सारंगढ़ की सीमा पर.
स्वतंत्रता दिवस सिर्फ़ 1947 को स्मरण करने का अवसर नहीं है. आज आप स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आकार ले रही अपनी भाषा और उसकी कालजयी रचनाओं के इतिहास को भी याद कर सकते हैं. व्योमेश शुक्ल के इस शोधपरक निबंध को आप आचार्य रामचंद्र शुक्ल की महान कृति ‘कविता क्या है?’ की जीवनी की तरह भी पढ़ सकते हैं.
राही डूमरचीर की कविता इस भेद को मिटा देती है कि स्त्री से प्रेम करने और प्रकृति से प्रेम करने में कोई अंतर है. क्या स्त्री के प्रेम में जान देने और एक पेड़ की रक्षा के लिये अपना हासिल दांव पर लगा देने में कोई फ़र्क है?
मिहिर पंड्या का सिनेमा के साथ अनूठा रिश्ता है. वे इस विधा के रसिक-आलोचक हैं. सिनेमा के अध्येता हैं, आत्मीय दर्शक भी. तकनीक का ज्ञान है, साहित्य की रहनवारी भी. पढ़िए अचल मिश्रा की विनोद कुमार शुक्ल पर बनी फ़िल्म की परतों को करीने से उजागर करता हुआ मिहिर का यह निबंध.