आज़ादी के 80 साल बाद भी अपनी स्वतंत्रता, अधिकारों को लेकर संघर्षरत हैं आदिवासी समुदाय

देश के नक़्शे से धीरे-धीरे आदिवासी गांव ही पूरे के पूरे विस्थापित हो रहे हैं. आज़ादी की 79वें वर्षगांठ के अवसर पर एक अहम प्रश्न यह है कि आदिवासी-किसान तबक़ों की स्वाधीनता के क्या मायने हैं? क्या बाहरी उपनिवेशवादी ताक़तों का मात्र स्थानांतरण हुआ है और अब आंतरिक उपनिवेशवादी ताक़तें इन तबक़ों का शोषण कर रही हैं?

आज़ादी के मायने: आज सर्वाधिक ख़तरे में स्वतंत्रता का अधिकार ही है

हमारे छह मौलिक अधिकारों में से स्वतंत्रता का अधिकार आज सबसे ज़्यादा मायने रखने लगा है, क्योंकि आज उसकी हर धारा का उल्लंघन हो रहा है. सत्ता के ख़िलाफ़ मत या विचार को अभिव्यक्ति देने पर आजकल प्रोफेसर, छात्र, पत्रकार, रंगकर्मी तक गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं. राज्य की आलोचना करने को देशद्रोह क़रार दिया जाता है.

‘स्वतंत्रता’ सिर्फ़ झंडे और राष्ट्रगान में सिमटकर नहीं रह सकती

क्या पंद्रह अगस्त 1947 के बाद ‘हम’ का यह दायरा निरंतर फैलता गया है या वह फैलते-फैलते सिकुड़ना शुरू हो गया है? या कभी फैला ही नहीं है? यह सब कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब देश के हर सदस्य को खुद ढूंढने होंगे.

आज़ादी के मायने: उमर की क़ैद इस आज़ाद मुल्क के नागरिकों का इम्तिहान है

'उमर, तुम्हारा एक और स्वतंत्रता दिवस जेल में बीतना इस आज़ाद मुल्क की हालत पर बेहद तल्ख़ टिप्पणी है. लेकिन शायद उससे भी तल्ख़ बात यह है कि हममें से बहुतों ने यह टिप्पणी पढ़ना ही छोड़ दिया. लंबी क़ैद पहले ख़बर बनती है, फिर पुरानी ख़बर, और आख़िर में हमारे ज़ेहन का कोई धुंधला कोना. पहले बेचैनी होती है, फिर आदत पड़ती है और फिर ख़ामोशी.'