स्वतंत्रता की 79वीं वर्षगांठ के अवसर पर द वायर हिंदी ‘आज़ादी के मायने’ नाम से एक श्रृंखला शुरू कर रहा है, जहां हम समकालीन लेखकों-विचारकों के लिए आज़ादी क्या है, इस बारे में उनके विचारों से रूबरू होंगे. एक तरह से यह श्रृंखला स्वतंत्रता को आज के संदर्भो में, उसके रोज़ाना के अर्थों में समझने का, उसके मायनों से वाक़िफ़ होने का अवसर है. प्रस्तुत है चौथी क़िस्त.
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बहुमत की राजनीति में भारतीय जनसंख्या का छोटा हिस्सा-समूह जब हक़ के लिए आवाज़ उठाता है, तो अमूमन ध्यान कम जाता है. भारतीय आज़ादी अपने 80वें साल पहुंच रही है. इन 80 साल तक आते हुए भारतीय समाज के विविधरंगी समूह के लोगों तक आज़ादी कितनी फलीभूत हो रही, यह देखने पर निराशा हाथ लगती है.
झारखंड राज्य के गुमला जिले के सतपारा, घट्ठा, जोराड़ांड़, लट्ठा, पनारी, सारू इत्यादि गांव से ‘भारतमाला सड़क परियोजना’ के तहत सड़कें जा रहीं हैं. इस सड़क परियोजना के तहत ग्रामीण आदिवासी इलाक़े के कुछ आदिवासी समूह अपने घर और खेत को बचाने के पक्ष में खड़े हैं. फलतः सन् 1914 के जतरा टाना आंदोलन के अनुयायी और उससे जुड़ी समितियां गांव वालों के पक्ष में खड़ी हैं. वे आंदोलनरत हैं, खेत को बचाने के लिए, अपने घर को बचाने के लिए और अपने जंगल को बचाने के लिए.
लेकिन बहुत बड़ी संख्या में आदिवासी आवाम इस लड़ाई को नहीं लड़ रही है. इसलिए उन पर नज़र नहीं जा रही. इस परियोजना के तहत उनके खेत, खलिहान, ज़मीन, सरना-मसना, चालाटोंका-जंगल (पवित्र स्थल) इत्यादि का विस्थापन दर्ज है.
कहा जा रहा है कि वर्तमान झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा इन तीन राज्यों के मध्य सड़क संपर्क को बढ़ावा देने के लिए निर्माण कार्य हो रहा है. अत: कहीं-कहीं ग्रामीणों में मुआवज़े के सौदे पर सड़क निर्माण गति पकड़े हुए है. वहीं कहीं-कहीं गांवों में छिटपुट खेत-खलिहान को खोने की पीड़ा में आदिवासी भारतमाला सड़क परियोजना के विरोध में बोल रहे हैं. उनका कहना है कि खेत कोड़ना वे जानते हैं, खेत अन्न देता है. खेत के बिना जीवन की कठिनाई का सामना करने के लिए वे तैयार नहीं हैं. इसी धरती में उनकी कई पीढ़ियों ने निवास किया, आगे की पीढ़ी के लिए यही जगह रहने के लिए है. अपनी ज़मीन पर स्वतंत्रता से निवास करने के अधिकार को लेकर वे संघर्षरत हैं.
तो इन आदिवासी समूहों की स्वतंत्रता का क्या अर्थ बनता है? जबकि भारत की इसी ज़मीन- छोटानागपुर, बंगाल प्रेसीडेंसी, छत्तीसगढ़- के इलाक़ों से शोषक वर्ग या ब्रिटिश दीवानी व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक आवाज़ उठी थी. वह आवाज़ अपनी ज़मीन पर स्वाधीनता के लिए उठी थी.
भारतीय इतिहास आज़ादी के प्रथम आंदोलन को बड़े देर से स्वीकार करता है. भारत की आज़ादी में आदिवासियों का अहम योगदान रहा है. कंपनी राज उपनिवेशवादी नीतियों को लेकर जैसे ही आदिवासी इलाक़ों में घुसपैठ करती है, आदिवासी भूमि में आंदोलनों की शुरुआत होती है. ब्रिटिश राज के विरोध में छोटानागपुर, जंगल महाल, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल क्षेत्र में किसान-आदिवासी समूह में स्वाधीनता का स्वर सन् 1857 ईस्वी से बहुत पहले ही गूंज उठा था; सन् 1700 से इन इलाक़ों में आंदोलनों का सिलसिला शुरू हो चुका था.
आज़ादी की 79वें वर्षगांठ के अवसर पर सबसे अहम प्रश्न यह है कि आदिवासी-किसान तबक़ों की स्वाधीनता के क्या मायने हैं? क्या बाहरी उपनिवेशवादी ताक़तों का मात्र स्थानांतरण हुआ है और अब आंतरिक उपनिवेशवादी ताक़तें उन तबक़ों का शोषण कर रही हैं?
इस देश में उनके स्वतंत्रता-समानता के अधिकारों पर एक बड़ा सवाल है. मुनाफ़े की नीति के ख़िलाफ़ एक सशक्त आंदोलन देश के विभिन्न आदिवासी इलाक़ों में कंपनी राज में शुरू हुआ. क्या यह समय उन संघर्षो का विस्तार सामने रख रहा है. वास्तव में देखा जाए तो उन शोषणकारी ताक़तों का स्थानांतरण मात्र हुआ है और लोगों का संघर्ष जारी है. धरती पर स्वतंत्रता के साथ निवास करने के हक़ की लड़ाई जारी है. जो विकास के ढांचे में परिवर्तन के मांग के साथ उभरती है- यह स्वतंत्रता के जश्न पर एक सवाल खड़ी करती है.
उड़ीसा राज्य के रायगाड़ा-कालाहांडी क्षेत्र के आदिवासी समूह सिजीमाली पर्वत की प्रतिरक्षा में खड़े होते हैं. वे सत्ता की शोषणकारी ताक़तों से जूझते हैं, अपने पारिस्थितिकी क्षेत्र में उनके जीवन जीने के तरीक़े पूंजीवादी ताक़तों के सामने बाधा हैं. आदिवासी समूह अपने पहाड़-जंगलों में स्वतंत्र रूप से जीवन बसर करने के अधिकार को लेकर संघर्षरत हैं. उनके जीवन बसर के तरीक़े क्यों आभिजात्य-प्रभुत्वशाली वर्ग के विकास के ढांचे, सामंती ढांचे को चुनौती देते हैं?
सिजीमाली पहाड़ियों से खनिज संपदा निकालने के लिए आदिवासी समाज की न्यायिक व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन हो रहा है. आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किसके बूते किया जा रहा है? इन परिस्थितियों में देश की व्यवस्था में ताक़तें किस वर्ग के साथ खड़ी होती हैं? किनके मौलिक अधिकारों का हनन होता है?
यह सब कुछ ज़रूरी सवाल हैं जिनसे वस्तुतः यह पता चलता है कि देश के समक्ष आदिवासियों की स्वतंत्रता के क्या मायने हैं. जिनके पुरखों ने आज़ादी के आंदोलन में इतनी अहम भूमिका निभाई, उन्हीं के वंशजों की बतौर इस देश के नागरिक, स्वतंत्रता संरक्षित नहीं है.
छत्तीसगढ़ के हसदेव जंगल की रक्षा में संघर्षरत आदिवासी समूह के साथ जब दमनकारी रवैया अपनाया जाता है तब यह सवाल देश के प्रत्येक नागरिक में उठना चाहिए. क्या हमारे जंगलों की सुरक्षा का प्रश्न सिर्फ़ आदिवासी समूहों के लिए मायने रखना चाहिए?
सवाल यह भी है कि क्यों देश की राजनीतिक व्यवस्था, आदिवासी समूह की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक व्यवस्था के साथ तालमेल नहीं बैठा पाती है? भारतमाला सड़क परियोजना के तहत ओडिशा, छत्तीसगढ़, झारखंड के आदिवासी इलाक़ों के मध्य संपर्क के बहाने उनके जीवन के मूलभूत अधिकारों के हनन पर देश चुप क्यों बैठा है?
स्वतंत्रता के 80 वर्षों में साफ़ झलक दिखाई दे रही कि उन आदिवासी इलाक़ों में शिक्षा और स्वास्थ्य की व्यवस्था चरमरायी हुई है. उनको दुरुस्त करने के बजाय जीवन के एक मात्र स्रोत ‘जंगल’ को तहस-नहस कर मुनाफ़े की राजनीति क्या कंपनी राज की राजनीति से अलग है?
वर्ष 2025 में झारखंड के गुमला जिले के बिशनपुर प्रखंड के आसपास गांवों के आदिवासी समुदाय एक जुलूस में निकलते हैं. आसपास के आदिवासी लोगों में इस जागरूकता को साझा करने के लिए कि पांचवी अनुसूची क्षेत्र में भारतीय संविधान के तहत उन्हें जो अधिकार दिए गए हैं, उसका उल्लंघन हो रहा है. यह उद्घोषणा आदिवासी समाज की न्यायिक व्यवस्था ‘पड़हा’ के तहत हो रहा था. आदिवासी समुदाय के लिए पड़हा व्यवस्था को न्याय की चौखट माना जाता है कारण कि इसमें अगुवा का चुनाव सर्वसहमति से होता है. भारतीय न्याय व्यवस्था के समक्ष आदिवासी न्यायिक व्यवस्था का यह संघर्ष विचारणीय है.
1947 की आज़ादी के बाद देश में गठित न्यायिक व्यवस्था में आदिवासी न्याय के मुद्दे पर बहस नहीं होती है. आदिवासी अपनी न्यायिक व्यवस्था को मज़बूत करते हुए यह नारा लगाते आ रहे हैं -‘न लोकसभा, न विधानसभा, सबसे ऊपर ग्रामसभा.’पर आज भी ग्रामसभा को क़ानूनी-राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं. स्वराज का नारा आदिवासियों ने बहुत पहले छेड़ा- ‘अबुआ दिसुम, अबुआ राज’ (हमारा देश, हमारा राज्य).
स्वतंत्रता की उद्घोषणाओं के साथ देश की संसदीय राजनीति में आदिवासी अगुवाओं की बहस होती है. मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा 19 दिसंबर 1946 को अपनी संसदीय बहस में यह अहम बात कहते हैं:
‘यहां जो संकल्प पेश किया गया है वह आदिवासियों को ‘लोकतंत्र’ नहीं सिखाने जा रहा. आप सब आदिवासियों को लोकतंत्र सिखा ही नहीं सकते. बल्कि आपको ही उनसे लोकतंत्र सीखना है. आदिवासी पृथ्वी पर सबसे अधिक लोकतांत्रिक लोग हैं.’
इस बात को नकारा नहीं जा सकता है. उस समूह के गणतांत्रिक मूल्य का अनुसरण करते हुए समकालीन भारतीय समाज वस्तुतः आज़ादी के अर्थ को को चरितार्थ कर सकता है.
ज़्यादा पीछे न लौटते हुए यदि इस वर्ष की ही घटनाओं का ज़िक्र किया जाए. आम मनुष्य समूह के हक़-हकूक की बात हो या मनुष्य समूह के प्रकृति के संग सहियापन की स्वातंत्रयोत्तर सामाजिक व्यवस्था की बात, स्वाधीनता का प्रश्न हमेशा खड़ा होता है.
वर्ष 2026 को देखें तो सिजीमाली, हसदेव, बैलाडीला के आदिवासी, नगरहोल के आदिवासी, अंडमान के आदिवासी, काज़ीरंगा-असम के आदिवासी, मणिपुर के जनसमूह, मध्य प्रदेश के जनसमूह, गुजरात-राजस्थान के आम नागरिक, आंध्र प्रदेश के जनसमूह, झारखंड के जनसमूह किन समस्याओं से जूझ रहे हैं. काज़ीरंगा के आदिवासी पूंजीपति ताक़तों के ख़िलाफ़ लड़ते हैं. बाघ के साथ सहजीवन वाली अपनी स्वतंत्रता के सवाल के साथ नागरहोल के आदिवासी सत्ता के सामने खड़े होते हैं.
देश में मौजूद पूंजीवादी ताक़तों के सामने आदिवासी समूह की लोकतांत्रिकता सवाल खड़े करती है कि असल लोकतंत्र क्या है? वास्तविक लोकतांत्रिकता में प्रकृति वस्तु रूप में नहीं है बल्कि प्रकृति में शामिल सभी का एक अस्तित्व है और उनके अस्तित्व के साथ आदिवासी समूह अपने जीवन का तालमेल बिठाता है. इसी तालमेल को ध्वस्त करने की कोशिश लगातार हो रही है, जिसके लिए उनकी ज़मीन में सामंतवादी व्यवस्थाएं घुसपैठ करती हैं और जिसके सामने आदिवासियों की गणतांत्रिक व्यवस्था खड़ी है- उनके मुखौटों का पर्दाफाश करती हुई.
भारत का लोक इतना विविध है कि उसकी पारिस्थितिकी संरचना में निवास करने वाला हर मनुष्य समूह जो उससे जुड़ाव महसूस करता है, उसकी पूरी जानकारी रखता है. उसके लोक में उसका अपना तरीक़ा है उस ज्ञान-व्यवस्था को अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित करने के लिए. क्या इस शैक्षणिक व्यवस्था का औपनिवेशिकरण हुआ है?
आदिवासी शिक्षा के सवालों में यह अहम विमर्श बिंदु है. भारतीय व्यवस्थागत लड़ाइयों में समानता-स्वतंत्रता के उनके अपने संघर्ष है और साथ ही उनकी न्यायिक-शैक्षणिक व्यवस्था को ध्वस्त करने वाली औपनिवेशिक ताक़तें भी डटी हुई हैं जो उनके महुआ-डोरी के ज्ञान से डरती है. महुआ फूल की संस्कृति बनाम महुआ का बाज़ार दोनों की समझ रखने पर इस बात को समझ सकेंगे कि यहां संस्कृतियों की टकराहट है.
आदिवासियों की जीवन शैली को लगातार ब्रिटिश काल से ध्वस्त करने की कोशिश रही, जिससे उन्होंने आज़ादी भले पा ली, लेकिन उस औपनिवेशिक मानसिकता से यह समाज आज भी जूझ रहा है.
आदिवासी समाज अपने आसपास की पारिस्थितिकी को जितने बेहतर ढंग से जानते हैं. उसके साथ अपने जीवन को ढालते हुए पीढ़ियों से जिस प्रकार जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उस सामाजिक संरचना के साथ आदिवासी इस देश में जीने के लिए स्वतंत्र नहीं छोड़े गए. यह 80 वर्ष बाद की आज़ादी की सच्चाई है और यह बहुत बड़ी विडंबना है.
पूंजीवादी विकास बनाम आदिवासी गणतंत्र, पूंजीवादी दुनिया बनाम आदिवासी दुनिया, पूंजीवादी शिक्षण व्यवस्था बनाम आदिवासी शिक्षण व्यवस्था- इन नज़रियों से सार्थक बहसों की मांग करता है यह आज़ादी वर्ष. आदिवासी इलाक़ों में पूंजीवादी व्यवस्था की घुसपैठ है, संसाधनों की तस्करी है, पारिस्थितिकी का नुक़सान है और सहज जीवन का विस्थापन है.
देश के नक़्शे से धीरे-धीरे आदिवासी गांव ही पूरे के पूरे विस्थापित हो रहे हैं. शब्दकोश से आदिवासी समूह की पारिभाषिक शब्दावलियों का दोहन हो रहा है. आदिवासी आर्थिकी और उनके नेचर बैंकिंग को लगातार ध्वस्त किया जा रहा है. आदिवासी कला-विज्ञान-परंपरा-संस्कृति सभी का शोषण जारी है. ग्रेट अंडमान प्रोजेक्ट के तहत आने वाले आदिवासी समूह अपने जंगल-समुद्र के लिए चिंता व्यक्त कर रहे.
आज़ादी के 80 वर्षों बाद आदिवासी आंतरिक उपनिवेशवाद से आज भी लड़ रहे हैं. आदिवासी सामाजिकी ,आर्थिकी, कला, शिक्षा और न्याय व्यवस्था के साथ इस देश का लोकतंत्र कितना न्यायिक है? उनके प्रति अपनी समझ विकसित करने में तथाकथित मुख्यधारा को और कितना वक़्त लगेगा? कभी तो शायद ऐसा होगा, और तभी आदिवासी समाज के लिए स्वतंत्रता के मायने सही अर्थों में साकार होंगे.
(पार्वती तिर्की साहित्य अकादमी से पुरस्कृत कवयित्री हैं और रांची विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.)
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