Nehru Gandhi Family

राजीव गांधी फाउंडेशन सहित नेहरू-गांधी परिवार से संबंधित तीन न्यासों को मिले चंदे की होगी जांच

राजीव गांधी फाउंडेशन सहित नेहरू-गांधी परिवार से जुड़े तीन न्यासों द्वारा धनशोधन और विदेशी चंदा सहित विभिन्न क़ानूनों के कथित उल्लंघन के मामलों की जांच में समन्वय के लिए गृह मंत्रालय की ओर से एक अंतर-मंत्रालयी टीम गठित की गई है.

एनआरसी, सीएए, एनपीआर की बात होगी, लेकिन मोदी बेरोज़गारी पर एक शब्द नहीं बोलते: राहुल गांधी

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देते हुए कहा कि वे किसी भी यूनिवर्सिटी में जाकर युवाओं के सवालों के जवाब दे दें. ये सवाल बेरोज़गारी, देश को बांटने, देश की छवि ख़राब करने से जुड़े हुए हैं. प्रधानमंत्री जवाब नहीं दे पाएंगे.

मोदी-संघ के ख़िलाफ़ लोकतंत्र की लड़ाई की अगुवाई राहुल गांधी नहीं कर सकते हैं

पिछले दो दशकों में कांग्रेस का इतनी गहराई तक ग़ैर-सांस्थानीकरण हो चुका है कि गांधी परिवार से बाहर जाकर विचार करने की इसकी सामूहिक क्षमता समाप्त हो गई है.

कब तक भूख और गोली से मारे जाएंगे आदिवासी?

सोनभद्र में किसी ने उन आदिवासियों की भुखमरी के हालात की तह में जाने की कोशिश तक नहीं की, यह सवाल नहीं पूछा कि मौत का ख़तरा होते हुए भी वे इस अनउपजाऊ क्षेत्र में ज़मीन से क्यों चिपके हुए थे?

न सॉफ्ट हिंदुत्व और न ही सॉफ्ट सेकुलरिज़्म कांग्रेस को उबार सकते हैं

आज कांग्रेस के सामने चुनौती पार्टी का कायाकल्प ऐसे दल के तौर पर करने की है, जो अपने पुराने वैभव और साम्राज्य के बिखर जाने की टीस से बाहर निकलकर यह कबूल करे कि अब उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और बचाव की मुद्रा से बाहर निकलकर आक्रामक अंदाज़ में खेलना शुरू करे.

हमें आज़ादी और फासीवाद के बीच चुनाव करने की जरूरत है: नयनतारा सहगल

लेखिका नयनतारा सहगल ने कहा कि आज हम एक ऐसी स्थिति में हैं जो कि संवैधानिक तौर पर एक लोकतंत्र है लेकिन उसमें तानाशाही के सभी गुण मौजूद हैं.

प्रियंका गांधी का करिश्मा भी यूपी में कांग्रेस को हार से नहीं बचा सकता

भारतीय राजनीति में करिश्माई नेतृत्व ने कई करिश्मे दिखाए हैं, लेकिन किसी भी दौर में करिश्मे के मुकाबले ज़मीनी समीकरण और समुदायों की गोलबंदियां ज्यादा प्रभावी रही हैं. फिलहाल कांग्रेस कम से कम यूपी में तो इन दोनों मोर्चों पर पिछड़ती नज़र आ रही है.

प्रियंका गांधी के लिए यह आर या पार की लड़ाई है

अगर प्रियंका का प्रदर्शन अच्छा रहा, तो वे लंबी पारी खेलने के लिए राजनीति में रह सकती हैं. अगर नतीजे इसके उलट रहें, तो उनकी नियति ‘बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले’ वाली हो सकती है.

क्या जनता परिवारवाद, यारवाद और पैसावाद को लेकर चिंतित है?

एक नागरिक और कार्यकर्ता के रूप में सतर्क रहना चाहिए कि राजनीति चंद परिवारों के हाथ में न रह जाए. लेकिन इस सवाल पर बहस करने योग्य न तो अमित शाह हैं, न नरेंद्र मोदी और न राहुल गांधी. सिर्फ जनता इसकी योग्यता रखती है. जब तक ये नेता कोई साफ़ लाइन नहीं लेते हैं, परिवारवाद के नाम पर इनकी बकवास न सुनें.

मराठी साहित्य सभा: आयोजकों ने साहित्यकार नयनतारा सहगल को कार्यक्रम में आने से मना किया

यवतमाल में 11 जनवरी से शुरू होने वाले इस कार्यक्रम का उद्घाटन अंग्रेज़ी की प्रख्यात लेखिका नयनतारा सहगल को करना था. रविवार को आयोजकों ने ‘अपरिहार्य कारणों’ का हवाला देते हुए उनका आमंत्रण वापस ले लिया.