मानहानि का यह मुक़दमा मार्च में द कारवां में प्रकाशित एक रिपोर्ट पर आधारित है, जिसमें निखिल गडकरी की कंपनी और बीफ निर्यात करने वाली एक कंपनी के बीच कथित वित्तीय संबंधों का आरोप लगाया गया है.
पत्रकारों के संगठन एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने हाल ही में विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने के फैसले का बचाव करने के प्रयास की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को इस तरह की 'सतही दलीलों' से बचना चाहिए. इससे मीडिया की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.
17 जुलाई 2022 को गिरफ्तार किए गए पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की कैद के चार वर्ष पूरे हो गए हैं, इस दौरान उन्होंने जेल के भीतर कथित भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के खिलाफ आवाज उठाई, उच्च शिक्षा जारी रखी और सहबंदियों के बीच सकारात्मक बदलाव की पहल की. परिवार को अब भी उनकी रिहाई का इंतजार है.
मेटा ने द वायर की लॉरेंस बिश्नोई पर वीडियो रिपोर्ट और फिल्म 'चौहान' पर प्रकाशित एक टेक्स्ट रिपोर्ट को बिना पूर्व सूचना इंस्टाग्राम और फेसबुक से हटा दिया है. दोनों मामलों में हटाने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया गया. यह पहली बार नहीं है जब द वायर की ख़बरों, वीडियो और व्यंग्य तक पहुंच को सीमित किया गया हो.
न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ रद्द मामलों को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने एक बयान जारी कर सरकार से भविष्य में पत्रकारों और स्वतंत्र प्रेस के ख़िलाफ़ इस प्रकार के लक्षित उत्पीड़न से परहेज़ करने का आग्रह किया है. साथ ही संगठन ने पत्रकारों को हुए नुक़सान का उचित मुआवज़ा मांगते हुए भारतीय प्रेस परिषद से उन लोगों के ख़िलाफ़ कार्यवाही शुरू करने की अपील भी की है, जिनके इशारे पर न्यूज़क्लिक के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाया गया.
'गोल्डन पेन ऑफ फ्रीडम' डब्ल्यूएएन-आईएफआरए वार्षिक प्रेस स्वंतत्रता सम्मान है, जो उन लोगों या संस्थाओं को दिया जाता है जिन्होंने प्रेस की आज़ादी की रक्षा करने और उसे बढ़ावा देने में बेहतरीन योगदान दिया है. इस साल यह अवॉर्ड उन फ़िलिस्तीनी फोटोग्राफरों और वीडियोग्राफरों को दिया जा रहा है जो तीन अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ एजेंसियों- एएफपी, एपी और रॉयटर्स से जुड़े हैं.
अच्छे राजनेता और अच्छे पत्रकार के बीच संबंध प्रतिद्वंद्विता का नहीं, तनावपूर्ण सम्मान का होता है. पत्रकार पूछता है; क्योंकि वह नागरिक की ओर से खड़ा है. राजनेता जवाब देता है; क्योंकि वह राज्य की ओर से ज़िम्मेदार है. दोनों के बीच यह निरंतर रस्साकशी ही लोकतंत्र के ताक़त देती है. जिस लोकतंत्र में पत्रकार केवल जयकार करे और नेता केवल भाषण दे, वहां जनता धीरे-धीरे दर्शक बन जाती है और संसद राजशाही की दर्शक दीर्घा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुनिया भर में भारत का डंका बजाते-बजाते अब अचानक यह रोना भी रोने लगना पड़ेगा कि प्रेस व धार्मिक स्वतंत्रता के सूचकांक व रपटें तैयार करने वाली कई संस्थाओं व आयोगों का रवैया भारत-विरोधी और दुराग्रही है. फिर तो यह बताने की ज़रूरत भी पड़ेगी कि आपके लगातार डंका बजने के बावजूद ऐसा क्यों है?
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति रहे पत्रकार जगदीश उपासने ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सवाल करने वाली नॉर्वे की पत्रकार हेले ल्यूंग की आलोचना में उनकी निजी तस्वीरें पोस्ट की हैं. अगर सवाल पूछना अपमान है तो फिर पत्रकारिता विश्वविद्यालयों में क्या पढ़ाया जाए? प्रेस नोट का संपादन? नेता की मुस्कान का वर्णन? विद्यार्थी अगर देखें कि एक विदेशी पत्रकार ने प्रश्न पूछा और वरिष्ठों ने उसके व्यक्तित्व पर हमला शुरू किया तो वह क्या सीखेगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मीडिया की आज़ादी पर सवाल पूछने के बाद नॉर्वे की पत्रकार हेले ल्यूंग सोशल मीडिया पर हमलों का सामना कर रही हैं. उन्हें ‘भारत विरोधी’ और ‘एजेंट’ बताया जा रहा है. आलोचना अब पेशेवर असहमति से आगे बढ़कर निजी जीवन और चरित्र पर हमलों तक पहुंच गई है. यहां तक कि पत्रकारिता के पेशे से जुड़े कुछ एंकर उनके प्रधानमंत्री से सवाल किए जाने को लेकर आहत हैं.
अब कूटनीति का दायरा केवल देशों तक सीमित नहीं रहा, अब उसमें 'छवि-सुरक्षा' का नया आयाम जुड़ गया था. विदेश नीति को अनौपचारिक रूप से दो भागों में बांट दिया गया था, पहला, दुनिया के देशों से संबंध बेहतर बनाए रखना. दूसरा, दुनिया को यह विश्वास दिलाते रहना कि कोई असुविधाजनक प्रश्न वास्तव में असुविधाजनक था ही नहीं.
नॉर्वे दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वहां की एक पत्रकार ने मीडिया के सवाल लेने को लेकर सवाल किया, लेकिन वे बिना जवाब दिए आगे बढ़ गए. बाद में भारतीय दूतावास की प्रेस ब्रीफिंग में भी मानवाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़े सवाल पूछे गए.
दिल्ली हाईकोर्ट ने 4PM न्यूज़ नेटवर्क और इसके संपादक संजय शर्मा द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके यूट्यूब चैनल को बहाल करने का आदेश दिया है. यह चैनल बीते 12 मार्च से देश में अनुपलब्ध था. केंद्र सरकार ने इसे प्रतिबंधित करने के पीछे राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं का हवाला दिया था.
आरएसएफ के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक 2026 में भारत 157वें स्थान पर खिसक गया है. रिपोर्ट में मोदी सरकार के दौर में बढ़ती हिंसा, मीडिया का केंद्रीकरण और सत्तारूढ़ विचारधारा के प्रभाव को प्रेस स्वतंत्रता के गंभीर संकट की वजह बताया गया है.
एक्स हैंडल ‘तेलुगुस्क्राइब’ ने तेलंगाना पुलिस द्वारा यूएपीए की कार्रवाई को सत्ता का खुला दुरुपयोग बताते हुए आरोप लगाया है कि राज्य की कांग्रेस सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचल रही है, 'जहां राहुल गांधी संविधान की बात करते हैं, वहीं तेलंगाना में रेवंत रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार बुनियादी अधिकारों का हनन कर रही है. यह आपातकाल जैसी स्थिति की वापसी है.'