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स्टाफ की कमी से जूझ रहे हैं मानवाधिकार आयोग, 10 राज्यों में अध्यक्ष पद ख़ाली: आरटीआई

सूचना का अधिकार क़ानून के तहत प्राप्त दस्तावेज़ों के मुताबिक आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र, मणिपुर और मेघालय के मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष का पद ख़ाली है. वहीं हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना का मानवाधिकार आयोग बिल्कुल बंद पड़ा हुआ है.

(फोटो: रॉयटर्स)

(फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली: देशभर के मानवाधिकार आयोग नियुक्ति न होने की वजह से इस समय स्टाफ की भारी कमी से जूझ रहे हैं. आलम ये है कि 10 राज्यों के मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष का ही पद खाली पड़ा हुआ है. तीन राज्यों में मानवाधिकार आयोग ही नहीं है और दो राज्यों में आयोग बिल्कुल बंद पड़ा हुआ है.

केवल 13 राज्यों में अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति की गई है. भ्रष्टाचार एवं पारदर्शिता के मुद्दे पर काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया (टीआईआई) की हालिया रिपोर्ट से ये जानकारी सामने आई है. रिपोर्ट में राज्यों के मानवाधिकार आयोग की स्थिति और उनकी कार्यप्रणाली का विस्तृत लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया है.

टीआईआई की रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, झारखंड, महाराष्ट्र, मणिपुर और मेघालय के मानवाधिकार आयोग में अध्यक्ष का पद खाली है. वहीं हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना का मानवाधिकार आयोग बिल्कुल बंद पड़ा हुआ है.

इसके अलावा कुल 23 राज्यों के मानवाधिकार आयोगों में सदस्यों (न्यायिक एवं गैर-न्यायिक) के लिए स्वीकृत 48 पदों में से 16 खाली हैं. मौजूदा समय में इसके लिए सिर्फ 37 पदों पर ही नियुक्त व्यक्ति काम कर रहे हैं.

वहीं इन आयोगों में प्रशासनिक कार्यों के लिए स्वीकृत पदों में से 286 पद पर फिलहाल किसी व्यक्ति की नियुक्ति नहीं हुई है. इस संदर्भ ने कई राज्यों ने जानकारी देने से भी मना कर दिया.

आंध्र प्रदेश और गोवा के मानवाधिकार आयोग में न्यायिक एवं गैर-न्यायिक सदस्यों के लिए कुल दो पद हैं और यहां पर दोनों पद खाली पड़े हैं. अध्यक्ष का भी पद खाली होने की वजह से ये आयोग पूरी तरह से निष्क्रिय होता प्रतीत होता है.

इसी तरह का हाल छत्तीसगढ़ का भी है, जहां अध्यक्ष का पद खाली होने के साथ-साथ सदस्य का भी एक पद खाली है और एक पद पर नियुक्ति हुई है. गुजरात के मानवाधिकार आयोग में भी सदस्य का एक पद खाली है.

उत्तर प्रदेश के आयोग में सदस्य के दो पद, उत्तराखंड में एक पद, पश्चिम बंगाल में दो पद, सिक्किम में एक, राजस्थान में एक, महाराष्ट्र में एक, मणिपुर में एक और मेघालय में एक पद खाली है.

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देश के मानवाधिकार आयोगों में खाली पदों की संख्या. (स्रोत: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया)

वहीं अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नगालैंड में मानवाधिकार आयोग ही नहीं है. देश भर के आयोगों में अध्यक्ष एवं सदस्यों के अलावा भारी संख्या में प्रशासनिक पद भी खाली पड़े हुए हैं.

बिहार में 41, उत्तर प्रदेश में 40, पंजाब में 33, ओडिशा में 26, आंध्र प्रदेश में 24, तमिलनाडु में 23, पश्चिम बंगाल में 22, गुजरात में 18, महाराष्ट्र में 16, गोवा में 11, हरियाणा में 10, झारखंड में नौ, राजस्थान में आठ, असम में दो, मणिपुर में दो और केरल में एक प्रशासनिक पद खाली पड़े हैं.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया ने देश भर के आयोगों से सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून के तहत जानकारी प्राप्त की है. छत्तीसगढ़, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, त्रिपुरा और उत्तराखंड ने प्रशासनिक पदों के संबंध में कोई जानकारी नहीं दी है.

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राष्ट्रीय एवं राज्य मानवाधिकार आयोगों का गठन किया गया है. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में भी सदस्य का एक पद खाली है. वहीं आयोग ने प्रशासनिक पदों के संबंध में जानकारी का खुलासा नहीं किया.

ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यकारी निदेशक रामनाथ झा ने कहा, ‘मानवाधिकार अधिनियम को व्यक्ति की गरिमा और आत्मसम्मान की रक्षा करने के उद्देश्य से लागू किया गया था ताकि देश प्रगतिशील परिवर्तनों की ओर बढ़ सके. यह कानून देश के लिए मील का पत्थर था. लेकिन जब देश भर के आयोगों में पद खाली रहेंगे तो फिर कैसे इस उद्देश्य की पूर्ति की जा सकेगी, कैसे लोगों के मानवाधिकार का रक्षा किया जा सकेगा.’

राज्य मानवाधिकार आयोगों में प्राप्त शिकायतों की स्थिति

टीआईआई की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के 23 राज्यों के मानवाधिकार आयोग में अब तक कुल मिलाकर 18,89,457 शिकायतों/उल्लंघनों को दर्ज किया है. इसमें से सबसे ज्यादा उत्तर प्रदेश मानवाधिकार आयोग ने साल 2002-03 से लेकर 2018-19 के बीच 3,60,597 मामले दर्ज किए.

दूसरे नंबर पर पंजाब है, जहां 1997-98 से 2018-19 के बीच कुल 2,69,057 मामले दर्ज किए गए. मध्य प्रदेश में अब तक मानवाधिकार उल्लंघन के 2,41,073 मामले, तमिलनाडु में 1,92,578 मामले, आंध्र प्रदेश में 1,45,135 मामले, पश्चिम बंगाल में 1,42,082 मामले, केरल में 1,19,440 मामले, महाराष्ट्र में 89,901 मामले, कर्नाटक में 77,801 मामले दर्ज किए गए हैं.

वहीं बिहार में अब तक में मानवाधिकार उल्लंघन के 56,187 मामले, राजस्थान में 44,352 मामले, ओडिशा में 40,287 मामले, गुजरात में 36,524 मामले, छत्तीसगढ़ में 33,828 मामले, हरियाणा में 12,874 मामले, असम में 9,841 मामले, उत्तराखंड में 8,539 मामले और झारखंड में कुल 7,371 मामले दर्ज किए गए हैं.

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में 1993-94 से लेकर 2016-17 तक में कुल 16,62,519 मामले दर्ज किए गए और तीन दिसंबर 2019 तक में यहां पर कुल 22,043 मामले लंबित हैं.

केंद्रीय एवं राज्य मानवाधिकार आयोग हिरासत में मौत के मामले भी दर्ज करते हैं. आरटीआई के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चलता है कि केंद्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने अब तक इस तरह के कुल 31,845 मामले दर्ज किए हैं.

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(स्रोत: ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया)

वहीं पंजाब ने 1860, पश्चिम बंगाल ने 1718, बिहार ने 1266, असम ने 1118, तमिलनाडु ने 843, राजस्थान 629, गुजरात ने 629, आंध्र प्रदेश ने 391, मध्य प्रदेश ने 326, केरल ने 129, उत्तराखंड ने 110, हरियाणा ने 89, गोवा ने 15, त्रिपुरा ने दो और मणिपुर ने एक हिरासत में मौत के मामले दर्ज किए.

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, मेघालय, ओडिशा और सिक्किम ने इस जानकारी का खुलासा ही नहीं किया.

मानवाधिकार आयोगों ने बेहद कम मामलों में ही स्वत: संज्ञान लिया

प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि मानवाधिकार आयोग बहुत कम मामलों में ही स्वत: संज्ञान ले रहे हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार ने अब तक सिर्फ 1067 मामलों में ही स्वत: संज्ञान लिया. राजस्थान मानवाधिकार आयोग ने अब तक सबसे ज्यादा 2120 मामलों का स्वत: संज्ञान लिया है.

वहीं असम ने 1718, गुजरात ने 1711, पंजाब ने 1201, तमिलनाडु ने 506, उत्तराखंड ने 472, पश्चिम बंगाल ने 293, केरल ने 259, आंध्र प्रदेश ने 192, हरियाणा ने 160, झारखंड ने 84, गोवा ने 79, त्रिपुरा ने 78, मणिपुर ने दो, सिक्किम ने एक और मेघालय ने एक मानवाधिकार उल्लंघन मामलों पर स्वत: संज्ञान लिया है.

वहीं कई बड़े राज्य उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, महाराष्ट्र और ओडिशा के मानवाधिकार आयोग ने इस संबंध में आंकड़ों का खुलासा नहीं किया.

आंध्र प्रदेश, झारखंड, मणिपुर और त्रिपुरा के मानवाधिकार आयोग की कोई वेबसाइट नहीं है और जिन राज्यों की वेबसाइट है तो उस पर कई महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी गई है. बिहार मानवाधिकार आयोग को छोड़कर किसी भी अन्य राज्य एवं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वेबसाइट पर उसके अध्यक्ष की संपत्तियां और देनदारियां के बारे में जानकारी नहीं है.

प्राप्त दस्तावेजों से ये जानकारी भी सामने आई है कि मानवाधिकार आयोग समय पर वार्षिक रिपोर्ट नहीं प्रकाशित कर रहे हैं. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वेबसाइट पर पिछले दो सालों की वार्षिक रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है.