भारत

संपादकीय: देश में चल रहे प्रदर्शन नागरिकता क़ानून के विरोध के साथ संविधान बचाने के लिए भी हैं

एनआरसी और एनपीआर को ख़ारिज किया जाना चाहिए और नागरिकता क़ानून को फिर से तैयार किया जाए, जिसमें इसके प्रावधान किन्हीं धर्म विशेष के लिए नहीं, बल्कि सभी प्रताड़ितों के लिए हों.

New Delhi: People from various organisations stage a protest against Citizenship Amendment Bill (CAB) at Jantar Mantar, in New Delhi, Tuesday, Dec. 10, 2019. The Bill seeks to grant Indian citizenship to non-Muslim refugees, who escaped religious persecution in Pakistan, Bangladesh and Afghanistan. The legislation was passed in the Lower House of the Parliament. (PTI Photo/Ravi Choudhary)(PTI12_10_2019_000213B)

फोटो: पीटीआई

भारत के लोगों ने अपनी बात कह दी है- वे संविधान को नष्ट करने की इजाजत नहीं देंगे.

पिछले कई हफ्तों से भारतीय अभूतपूर्व तादाद में सड़कों पर उतरे हैं. इनमें से एक भी प्रदर्शनकारी बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी शरणार्थियों को नागरिकता देने के खिलाफ नहीं है. इसकी जगह उन्होंने एक स्वर में यह घोषणा की है कि मजहब नागरिकता प्रदान करने का एक आधार नहीं हो सकता है.

सरकार चाहे जो भी कहे, नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) वास्तव में यही करता है. प्रधानमंत्री ने यह दावा किया है कि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) – जो भारतीयों को ‘नागरिकों’ और ‘संदिग्ध नागरिकों’ में बांट देगा- पर अभी तक आधिकारिक स्तर पर कोई चर्चा भी नहीं हुई है.

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उनका अश्वासन संसद के भीतर और बाहर गृहमंत्री द्वारा दिए गए इस बयान के ठीक उलट है कि एनआरसी की कवायद को पूरे भारत में 2024 तक शुरू कर दिया जाएगा. इसी बीच राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को फिर से आगे बढ़ाया जा रहा है, जिसका मकसद और कुछ नहीं एनआरसी के लिए सूचनाएं इकट्ठा करना है.

मुद्दा यह नहीं है कि सरकार के दो शीर्षस्थ लोग एक-दूसरे से उलट बातें कर रहे हैं. न ही इस मसले पर मोदी के शब्दों को अंतिम माना जाना चाहिए. इतने महत्व की किसी नीति पर एक स्पष्ट, सुसंगत और परामर्श पर आधारित कानूनी रूपरेखा देश के सामने रखना सरकार की जिम्मेदारी है.

लेकिन इसकी जगह यह लगातार अपने ही दावों को बदल रही है, उसको लेकर विरोधाभासी बातें कर रही है और उससे इनकार कर रही है. इस तरह से इसने सिर्फ अपनी बदनीयती को लेकर व्याप्त डर को पुख्ता करने का ही काम किया है.

इसका नतीजा यह है कि एक विचार के तौर पर एक देशव्यापी एनआरसी के प्रस्ताव को औपचारिक तौर पर वापस लेकर ही देश को यह आश्वस्त किया जा सकता है कि भविष्य में इस भयानक कवायद को हाथ नहीं लगाया जाएगा.

सिविल सोसाइटी और आम जनता को यह बात समझ में आ गयी है. यही वजह है कि प्रदर्शनों की रफ्तार कम नहीं हुई है और देश के विभिन्न हिस्सों- खासतौर पर भाजपा शासित राज्यों– में पुलिस द्वारा की गई हिंसा भी नागरिकों को सड़क पर उतरने से नहीं रोक पाई है.

उनकी सर्वप्रमुख मांग है कि सीएए को संशोधित करके भारत के पड़ोस में अत्याचार का सामना कर रहे किसी भी प्रामाणिक शरणार्थी को नागरिकता देने का प्रावधान इसमें शामिल किया जाना चाहिए. यह सामान्य-सा संशोधन अनावश्यक तौर पर नाम लिए (और अन्य को उससे बाहर किए) बगैर भी उन छह समुदायों को लाभ पहुंचाएगा, जिनको लेकर सरकार फिक्रमंद है.

यह तथ्य कि मोदी और शाह इस प्राथमिक तर्क को सुनने को तैयार नहीं हैं, इस बात का सबूत है कि उनका मकसद इस देश का ध्रुवीकरण धार्मिक आधार पर करना और भारत को एक ‘हिंदू राष्ट्र’ की ओर घसीटकर ले जाना है.

Protesters demonstrating against the Citizenship Amendment Act. (Photo: PTI)

फोटो: पीटीआई

जिस तरह गैरकानूनी ढंग से लोगों से शांतिपूर्ण ढंग से सरकार के कदम का विरोध करने का अधिकार छीना गया है- अनुच्छेद 144 का दुरुपयोग, लोगों को हिरासत में लेना, पिटाई, इंटरनेट सेवा बंद करना- उसने विरोध-प्रदर्शनों के दायरे को बढ़ा दिया है.

अब यह सिर्फ सीएए और एनआरसी से जुड़ा हुआ नहीं रह गया है. वास्तव में लाठी और गोलियों का सामना कर रहे, नारे लगाते, गीत गाते और पूरी ताकत के साथ सरकार के खिलाफ आवाज उठाते सैकड़ों-हजारों लोग अब संविधान के लिए, भारत के बुनियादी उसूलों और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं.

असम से लेकर केरल तक, मुंबई से लेकर कोलकाता तक, दिल्ली से लेकर लखनऊ, मैंगलोर, कासरगोड, विजयवाड़ा और औरंगाबाद तक, बूढ़े और जवान, विभिन्न धर्मों और जातियों के भारतीय सरकार को यह बताने के लिए सड़कों पर उतरे हैं कि वे भारत के लोकतंत्र को रौंदने की निर्लज्ज कोशिशों के मूकदर्शक नहीं बने रहेंगे.

पिछले करीब छह वर्षों में यह देश लिंचिंग, बढ़ती असहिष्णुता और आलोचनाओं का गला घोंटने की सुनियोजित कोशिशों का गवाह रहा है. उच्च शिक्षा के संस्थानों पर पहरा बिछा दिया गया है. अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमले हो रहे हैं.

जिस सनक भरे तरीके से कश्मीर के साथ लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था का खात्मा कर दिया गया और वहां की पूरी आबादी का दमन किया गया, उसने विश्व की चेतना को झकझोर कर रख दिया है. लेकिन विरोध की कुछ आवाजों को छोड़कर, भारत के बहुत से लोगों ने आवाज नहीं उठाई. इसका सबसे बड़ा कारण उनके अंदर का बैठा हुआ डर था.

सीएए-एनपीआर-एनआरसी के खतरे ने इस स्थिति को बदल कर रख दिया है. हालांकि, भाजपा निजी तौर पर अपने समर्थकों से यह कहती है कि इन तीनों के निशाने पर सिर्फ मुस्लिम हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अगर पार्टी लोगों से उनकी नागरिकता प्रमाणित करने पर जोर देती है तो लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिकों की जिंदगी संकट में पड़ जाएगी.

आज की तारीख तक सरकार ने इसकी रूपरेखा/पैमानों को लेकर फैसला नहीं किया है, लेकिन नौकरशाही की अक्षमता, भ्रष्टाचार और हठधर्मिता को देखते हुए बड़े पैमाने पर ‘गलतियों’ का होना तय है.

लोगों के नाम लिखने की इस कवायद से आखिरकार सामने आने वाली ‘संदिग्ध नागरिकों’ की सूची में अधिकांश नाम गरीबों के होंगे. इस पूरी कवायद के पीछे की मंशा को देखते हुए सबसे ज्यादा प्रभावित अल्पसंख्यक होंगे, लेकिन हाशिये के दूसरे तबकों पर भी खतरा कम नहीं है.

मोदी सरकार को जनता के मिजाज को पढ़ना चाहिए और अपने कदम पीछे खींच लेने चाहिए. लोगों को अब अस्पष्ट आश्वासन नहीं चाहिए.

एनपीआर और एनआरसी को पूरी तरह से रद्दी की टोकरी में डालने और सीएए में संशोधन करके इसे भारत के संवैधानिक सिद्धांतों और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुरूप बनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है.

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