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गंगा के लिए अनशन पर बैठीं 23 वर्षीय साध्वी की हालत गंभीर, संतों ने कहा- प्रताड़ित कर रही सरकार

मातृ सदन के संतों की मांग है कि गंगा में अवैध खनन बंद होना चाहिए, सभी प्रस्तावित और निर्माणाधीन बाधों पर तुरंत रोक लगाई जाए और गंदी नालियों का पानी बिना साफ किए या साफ करने के बाद भी नदी में न डाला जाए.

Aatmabodhanand and padmavati

गंगा सफाई को लेकर अनशन पर बैठीं साध्वी पद्मावती और आत्माबोधानंद. (फोटो साभार: मातृ सदन)

नई दिल्ली: उत्तराखंड के हरिद्वार स्थित साधु-संतों के आश्रम ‘मातृ सदन’ ने आरोप लगाया है कि केंद्र की मोदी सरकार गंगा सफाई की मांग करने वाले संतों को प्रताड़ित कर रही है और उनकी बातों को सुनने के बजाय उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है.

मातृ सदन पिछले दो दशकों से गंगा से जुड़े अवैध खनन, बड़े बांधों इत्यादि के खिलाफ अनशन करता रहा है. संस्था का कहना है कि उन्होंने इन मुद्दों को लेकर अब तक 62 अनशन आयोजित किए हैं.

प्रख्यात पर्यावरणविद और गंगा मामले के विशेषज्ञ वैज्ञानिक जीडी अग्रवाल भी मातृ सदन से जुड़े थे और साल 2011 में साधु बन गए, जिसके बाद उन्हें स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद के नाम से जाना जाने लगा.

गंगा को अविरल बनाने की मांग को लेकर लगातार 112 दिनों तक लगातार अनशन के बाद उनकी विवादास्पद स्थिति में साल 2018 में मौत हो गई थी.

अग्रवाल के अलावा मातृ सदन के स्वामी निगमानंद सरस्वती और स्वामी गोकुलानंद की भी गंगा सफाई को लेकर अनशन के दौरान संदेहास्पद स्थिति में मौत हो चुकी है. इस समय दो युवा संत 23 वर्षीय साध्वी पद्मावती और आत्माबोधानंद अनशन पर हैं और दोनों की हालात बेहद खराब है.

पिछले साल 15 दिसंबर से ही गंगा की अविरला और निर्मला सुनिश्चित करने की मांग लेकर अनशन पर बैठीं पद्मावती की तबीयत खराब होने के चलते उन्हें दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया है. आत्माबोधानंद भी एम्स में भर्ती हैं, जो कि बीते 22 फरवरी से अनशन पर हैं.

इससे पहले आत्माबोधानंद 194 दिनों तक अनशन पर बैठे थे जिसे लोकसभा चुनाव से दो हफ्ते पहले राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक राजीव रंजन मिश्रा ने उचित कदम उठाने का आश्वासन देकर खत्म कराया था.

मातृ सदन का आरोप है कि ये अनशन इसलिए खत्म कराया गया था ताकि नरेंद्र मोदी के चुनाव से पहले साल भर में दूसरे साधु की मौत से बवाल न खड़ा हो जाए. सदन का कहना है कि आत्माबोधानंद का अनशन खत्म कराने से पहले किए गए वायदे पूरा न होने पर पद्मावती अनशन पर हैं. ये आश्रम के इतिहास में पहला ऐसा मौका है जब किसी महिला ने ये कदम उठाया है.

हालांकि प्रशासन पर साध्वी पद्मावती को लगातार प्रताड़ित करने और मानसिक रूप से टॉर्चर करने का आरोप लग रहे हैं. बीते 30 जनवरी 2020 को उत्तराखंड की पुलिस ने पद्मावती को आश्रम में भर्ती करा दिया था और उन्हें जबरदस्ती दून अस्पताल में भर्ती करा दिया. उन पर आरोप लगाया गया कि वो दो माह से गर्भवती हैं. हालांकि जब इसकी जांच हुई तो ये बात झूठी निकली.

मातृ सदन के प्रमुख स्वामी शिवानंद सरस्वती कहा, ‘किसी महिला के लिए इससे बुरा मानसिक प्रताड़ना क्या हो सकती है कि उसे झूठे गर्भवती बता दिया जाए. शासन-प्रशासन की ओर से यह आश्रम को बदनाम करने की कोशिश है ताकि किसी तरह मातृ सदन को खत्म किया जा सके. हमारे संत जब तक आश्रम में अनशन पर रहते हैं वो बिल्कुल ठीक रहते हैं और जैसे ही उन्हें पुलिस जबरदस्ती उठाकर किसी अस्पताल में ले जाती है तो उनकी हालत बिगड़ने लगती है और अंतत: संदिग्ध अवस्था में मौत हो जाती है.’

Swami Shivanand Saraswati the wire

स्वामी शिवानंद सरस्वती. (फोटो: द वायर)

पिछले महीने 19 फरवरी से स्वामी शिवानंद को 20 सालों से सरकार से मिली सुरश्रा हटा ली गई. यह सुरक्षा उन्हें खनन माफिया से खतरे को देखते हुए मिली थी.

सरस्वती कहते हैं जिस तरीके से उनके यहां के संतों की मौत हो रही है इसकी वजह अनशन करना नहीं हो सकता है. उन्होंने कहा, ‘अनशन के दौरान हम अपने संतों को विशेष चीजें खिलाते हैं जिससे वे ठीक रहते हैं और अनशन भी जारी रहता है. सरकार गंगा को अविरल और इसे साफ करने के बजाय हम संतों का घोर अपमान कर रही है.’

स्वामी शिवानंद कहते हैं कि वो पीछे नहीं हटेंगे और उनके संत गंगा के लिए बलिदान देने के लिए तैयार हैं. सरकार द्वारा सही कदम नहीं उठाने के चलते साध्वी पद्मावती ने पिछले महीने 16 फरवरी से जल त्याग दिया था.

मातृ सदन की मांग है कि गंगा में अवैध खनन बंद होना चाहिए, सभी प्रस्तावित और निर्माणाधीन बाधों पर तुरंत रोक लगाई जाए और गंदी नालियों का पानी बिना साफ किए या साफ करने के बाद भी नदी में न डाला जाए.

मालूम हो कि राष्ट्रीय गंगा विधेयक पिछले कई सालों से लंबित है और इसे संसद में पेश नहीं किया जा रहा है. इस विधेयक के ड्राफ्ट के मुताबिक गंगा के प्रवाह रोकने और प्रदूषण फैलाने पर पांच साल की जेल और 50 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

इस विधेयक को पिछले साल संसद के शीतकालीन सत्र में ही पेश किया जाना था लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ.

इन्हीं मांगों को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर मातृ सदन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस किया और कहा कि सरकार संतों से बात करे और उनकी मांगों पर विचार कर उन्हें स्वीकार करे ताकि संतों की जान बचाई जा सके. इस कार्यक्रम में सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर और रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित संदीप पांडेय मौजूद थे.

पाटकर ने कहा, ‘यह कितनी अजीब बात है कि एक हिंदुत्ववादी सरकार के शासन काल में गंगा के संरक्षण के मुद्दे पर साधु अपनी जान की बाजी लगाए हुए हैं और सरकार ही नहीं समाज भी इतना संवेदनशील नहीं कि उनके साथ सहानुभूति भी दिखा सके.’