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‘बोलियों को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग बिल्कुल जायज़ है’

भोजपुरी और हिंदी के प्रमुख भाषा वैज्ञानिक एवं आलोचक डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह बता रहे हैं कि क्यों बोलियों को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए.

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(फोटो: shabd.in)

बोलियां नदी हैं, हिंदी नहर है. नहर का निर्माण होता है लेकिन नदियों का स्वत: निर्माण होता है. भोजपुरी, अवधी, राजस्थानी आदि बोलियों में हिंदी के शब्द नहीं आए है बल्कि इन बोलियों से शब्द हिंदी में गए हैं. यानी हिंदी का निर्माण हुआ है. बोलियों का निर्माण नहीं हुआ है.

अब नहर में पानी नदियों से आता है. अगर नदियां सूख जाएंगी तो नहर भी सूख जाएंगी. इसलिए नहर को बचाने के लिए ज़रूरी है कि नदियों को बचाया जाए. अगर हमें हिंदी को बचाना है तो बोलियों को बचाना होगा. लोक बोलियों के विकसित होने से हिंदी का विकास होगा.

हिंदी का फ्रेम बोलियों का फ्रेम है. हिंदी को पसर्ग हैं ने, का, की, में, पर आदि ये कहां से आए हैं ये लोकबोलियों से आए हैं. हिंदी को जो सहायक क्रिया हैं, था, गी, गे आदि ये सब बोलियों से आई हुई हैं.

लोकबोलियों ने हिंदी का फ्रेम बनाया है. इस फ्रेम में जो शब्द जड़े हैं ये लोकबोलियों के हैं. कहीं अवधी का, कही राजस्थानी, कही भोजपुरी, तो कहीं कन्नौजी के शब्द जड़े हैं. ऐसे में अगर लोकबोलियां मरेंगी तो हिंदी भी मरेगी.

बोलियां हिंदी शब्द भंडार की अक्षय स्रोत हैं. हिंदी भाषा में शब्द बोलियों से ही आ रहे हैं. जैसे भारत किसानों का देश है. बिहार राजभाषा परिषद से दो खंडों में कृषि कोष छपा है, लेकिन इस शब्दकोष के हज़ारों शब्द हिंदी में नहीं आए हैं. अगर आप बोलियों के शब्द नहीं लेंगे तो आपकी हिंदी में नए शब्द कहां से आएंगे.

इसे हिंदी डिक्शनरी में लाना होगा. इससे हिंदी समृद्ध होगी. आप सिर्फ संस्कृत और विदेशी शब्दों के बदौलत हिंदी को समृद्ध नहीं कर सकते हैं.

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संस्कृत को जो मिजाज़ है, वो अलग है. अंग्रेज़ी, फ्रेंच, रशियन आदि विदेशी भाषाओं की जो आत्मा है वो वहां के लोकजीवन का प्रतिबिंब हैं. उसमें लोकजीवन समाया हुआ है, इसलिए हिंदी को जीवंत बनाने के लिए या इसमें लोकजीवन का स्पंदन लाने के लिए आपको मूलबोलियों को संरक्षित करना होगा.

भारत की जो मूल आत्मा है वो लोकबोलियों में बसी है. विभिन्न प्रकार के पेशों के शब्द जैसे लोहारों के शब्द, बढ़ईयों के, किसानों के या चरवाहों के शब्द आपको बोलियों में ही मिलेंगे. संस्कृत, अंग्रेज़ी या दूसरी विदेशी भाषाओं में ये शब्द नहीं मिलेंगे.

अब भोजपुरी में तमाम ऐसे शब्द ऐसे हैं जिनका पर्यायवाची आपको अंग्रेज़ी, हिंदी या दूसरे भाषाओं में नहीं मिलेगा.

इसके अलावा इस मामले में बोलियों की अस्मिता भी जुड़ी हुई है. पहले हिंदी की 17 बोलियां मानी जाती थीं, उसके पहले सिर्फ 8 मानी जाती रही हैं. अब हिंदी की बोलियां 49 हैं. ऐसा क्यों है?

जाहिर है कि भारत में भाषाई अस्मिता की पहचान ने कई बोलियों को स्वतंत्र किया है. जिस तरह से प्रांतों का निर्माण हो रहा है, अस्मितामूलक आंदोलन चल रहे हैं. उसी तरह से बोलियों की अस्मिता सामने आ रही है.

नागपुरी एक समय में भोजपुरी की उपबोली थी, पर आज यह स्वतंत्र हो चुकी है. वह अब भोजपुरी की उपबोली नहीं रही. ऐसे ही पूर्वी मगही की प्रमुख उपबोलियों में कुरमाली, पंचपरगनिया और खोरठा की गिनती होती रही है.

पर अब सभी मगही से स्वतंत्र हो चुकी हैं. कुरमाली, पंचपरगनिया और खोरठा आदि का भी अब स्वतंत्र पहचान बन चुकी हैं. इन सबने अपने अस्मिता की लड़ाई लड़ी. आज इनका साहित्य है और शब्दकोश है.

आज भोजपुरी को आप हिंदी की बोली बता रहे हैं और कल आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद आप उसे भाषा कहने लगिएगा. इसका मतलब यह है कि बोली को भाषा बनाने की क्षमता और अधिकार सरकार में है.

मैथिली हिंदी की अब बोली नहीं है. आठवीं अनुसूची में शामिल होकर वह भाषा का दर्जा प्राप्त कर चुकी है. अब वह मराठी, गुजराती आदि की भांति आठवीं अनुसूची की भाषा है.

ऐसे में लोकबोलियों को बगैर संरक्षित किए हिंदी का विकास की बात सोचना बेमानी है. इसलिए लोकबोलियों को अगर आठवीं अनुसूची में शामिल करके सरकार संरक्षित करना चाह रही है तो इसमें कुछ भी बुरा नहीं है. ये एक अच्छा कदम होगा.

वैसे भी भोजपुरी और राजस्थानी समेत बोलियां आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग कर रही हैं. ये खुद को राजभाषा घोषित किए जाने की मांग नहीं कर रही हैं.

हिंदी राजभाषा है. आठवी अनुसूची में लोकबोलियों को संरक्षित और संवर्धित करने का काम किया जाता है. कुछ परीक्षाओं वगैरह में इस भाषा को मान्यता मिल जाती है. इससे उनकी लोकप्रियता में इज़ाफा हो जाता है, इसलिए बोलियों के विकास के लिए यह ज़रूरी और जायज़ मांग है कि उन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए.