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रक्षा मंत्रालय द्वारा बनाई जाने वाली समितियां उनके उद्देश्य में सफल होती क्यों नहीं दिखतीं?

पिछले कई दशकों में रक्षा मंत्रालय ने कई सारे पैनल, समितियों, कार्यसमूहों और टास्क फोर्सों का गठन किया है, लेकिन कुछ को छोड़कर अधिकतर समितियों के सुझावों या सिफ़ारिशों का नाममात्र या कोई प्रभाव नहीं पड़ा है.

रक्षा मंत्रालय और सैन्य अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह. (फोटो: पीटीआई)

रक्षा मंत्रालय और सैन्य अधिकारियों के साथ हुई एक बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: रक्षा मंत्रालय समितियां बनाने के लिए लालायित रहने वाला विभाग प्रतीत हो रहा है. पिछले कई दशकों में इसने ढेरों पैनल, समितियां, कार्यसमूह, और टास्क फोर्सों का गठन किया है.

आमतौर पर इन सबका गठन ऐसे मामलों पर विचार करने के लिए किया जाता है, जिस पर पहले से ही किसी समूह द्वारा विचार किया जा चुका होता है और बाद में इन रिपोर्ट्स और सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है.

मंत्रालय ज्यादा से ज्यादा सिर्फ इतना करता है कि वो सुझावों में से लागू करने के लिए इधर-उधर से कुछ उठा लेता है और बाकी सिफारिशों को या तो सीधे खारिज कर दिया जाता है या उस पर चुप्पी साध ली जाती है.

नतीजतन कुछ को छोड़कर अधिकतर समितियों का नाममात्र या बिल्कुल भी प्रभाव नहीं पड़ता है, चाहे ये रक्षा जरूरतों को स्वदेश में निर्मित करने, उपकरणों के आवंटन की रफ्तार बढ़ाने या रक्षा मंत्रालय के कामकाज में तेजी लाने के विषय पर हो.

उदाहरण के तौर, पर 26 अगस्त को रक्षा मंत्रालय ने दिल्ली में आईआईटी के निदेशक वी. रामागोपाल राव की अध्यक्षता में एक पांच सदस्यीय समिति के गठन की घोषणा की, जिसका काम ‘वर्तमान और भविष्य की रक्षा एवं युद्ध जरूरतों’ के लिए सरकार द्वारा संचालित रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) की 52 प्रयोगशालाओं का कायापलट करना है.

यह साल 2007 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के पूर्व सचिव डॉ. पी. रामा राव की अध्यक्षता में गठित समिति के समान ही है, जिसका काम डीआरडीओ के कामकाज की समीक्षा करना था.

राव समिति ने साल 2008 में अपने सुझावों को सौंपा, जिसके बाद डीआरडीओ प्रयोगशालाओं और संबंधित संस्थानों को छोटे तथा अधिक प्रबंधनीय समूह में परिवर्तित किया गया.

लेकिन इन सुझावों को लागू करने के लिए भी मंत्रालय ने रक्षा सचिव की अध्यक्षता में एक आंतरिक समिति बनाई, जिसने राव समिति की सिफारिशों पर विचार किया और इस बात को लेकर सहमति जताई कि डीआरडीओ के प्रयोगशालाओं  को सात समूहों में बांटा जाना चाहिए और इसके प्रमुख पद का कार्यभार नामी वैज्ञानिक को सौंपा जाना चाहिए.

हालांकि साल 2011-12 से इस व्यवस्था को बदलने के लिए फिर से पुनर्विचार करने पर जोर दिया जाने लगा और ऐसा क्यों किया जा रहा है, इसका बयान करना मुश्किल है.

खास बात ये है कि भारत को रक्षा जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर बनाने को लेकर समितियों और कार्यबलों की कोई कमी नहीं है.

साल 1992-93 में तत्कालीन डीआरडीओ प्रमुख और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की अध्यक्षता में एक 10 वर्षीय योजना बनाई गई थी, जिसका काम साल 2005 तक रक्षा जरूरतों को पूरा करने के लिए स्वदेश निर्मित उपकरणों की मात्रा 30 फीसदी से बढ़ाकर 70 फीसदी करने की थी.

हालांकि, करीब दो दशक बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है और भारत लगातार आने वालों सालों में दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में से एक के रूप में उभर रहा है.

इसके बाद साल 2004 में सरकार ने पूर्व वित्त सचिव विजय केलकर की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, जिसका उद्देश्य निजी क्षेत्र को प्रमुखता से शामिल करते हुए रक्षा अधिग्रहण प्रक्रियाओं में बदलाव की सिफारिश करना था.

यह रिपोर्ट दो भागों में प्रस्तुत की गई थी: पहली अप्रैल 2005 में आई, जो स्वदेशी उत्पादन को बढ़ावा देने के कई तरीकों की सिफारिश करने के अलावा रक्षा खरीद प्रक्रियाओं पर केंद्रित थी.

हालांकि केलकर समिति की कुछ सिफारिशें जैसे कि 15 वर्षीय उपकरण अधिग्रहण योजना का निर्माण और रक्षा खरीद में ऑफसेट की शुरुआत करने को स्वीकार किया गया था, लेकिन बाकी कई सुझावों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

खारिज की गई सिफारिशों में निजी क्षेत्र में ‘रक्षा उद्योग रत्नों’ को मान्यता देने और बढ़ावा देने की महत्वपूर्ण सिफारिश शामिल थी, जो प्रमुख रक्षा विनिर्माण परियोजनाओं और संयुक्त उपक्रमों का कार्य कर सकते थे.

इसके अगले साल सौंपे गए दूसरे भाग में भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के  नौ रक्षा उपक्रमों (डीपीएसयू) के लिए अधिक स्वतंत्रता का सुझाव दिया गया था, ताकि उन्हें अधिक कुशल बनाने के लिए विदेशी मूल उपकरण निर्माताओं के साथ संयुक्त उद्यम और संघों का गठन किया जा सके.

सात साल बाद 2012 में रक्षा मंत्रालय ने ‘डीपीएसयू द्वारा संयुक्त उद्यम कंपनियों की स्थापना के लिए दिशानिर्देश’ जारी किए, जिसे कुछ रिपोर्टों के अनुसार साल 2016 में रद्द कर दिया गया.

केलकर समिति ने आयुध फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) के निगमीकरण की भी सिफारिश की थी, जिसका सुझाव इसके पांच साल पहले साल 2000 में टीकेए नायर समिति द्वारा दिया गया था.

आगे चलकर साल 2015 में (रिटा.) वाइस एडमिरल रमन पुरी समिति द्वारा थोड़े बदलाव के साथ फिर से यही सिफारिश की गई थी और इसके अगले साल (रिटा.) लेफ्टिनेंट जनरल डीबी शेकतक समिति ने इन्हीं सुझावों को दोहराया.

हालांकि काफी बाद में 16 मई, 2020 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ओएफबी की स्वायत्तता, जवाबदेही और दक्षता में सुधार लाने के व्यापक रक्षा सुधारों के एक हिस्से के रूप में इसके कॉर्पोरेटाइजेशन के निर्णय की घोषणा की.

हालांकि अब तक इसके बारे में कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है कि कब और कैसे इन ‘सुधारों’ को लागू किया जाएगा.

इससे पहले साल 2001-02 में लालकृष्ण आडवाणी की अगुवाई वाले मंत्रियों के समूह, जिसने 1999 में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध में हुई इंटेलिजेंस चूकों की जांच की थी, की सिफारिशों के बाद रक्षा मंत्रालय ने सैन्य खरीद को कारगर बनाने के लिए कुछ उपायों को शुरूआत की थी.

इसमें साल 2001 में रक्षा मंत्रालय की समर्पित ‘कैपिटल एक्विजिशन विंग’ की स्थापना शामिल है.

तब से कम से कम चार समितियों ने हथियार खरीद के लिए रक्षा मंत्रालय द्वारा विकसित संगठनात्मक संरचना और प्रक्रियाओं के विभिन्न पहलुओं की जांच की है.

पहली समिति का गठन साल 2007 में एनएस सिसोदिया की अध्यक्षता में हुआ, जो सेवानिवृत्त नौकरशाह और नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के महानिदेशक थे. इनकी रिपोर्ट शायद कभी सार्वजनिक नहीं की गई.

साल 2012 में राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद ने रक्षा आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता के विभिन्न पहलुओं की जांच करने के लिए पूर्व सचिव रवींद्र गुप्ता की अगुवाई में एक टास्क फोर्स का गठन किया.

चार साल बाद, साल 2016 में मैनेजमेंट प्रोफेशनल प्रीतम सिंह की अध्यक्षता वाली समिति ने अन्य बातों के साथ रक्षा अधिग्रहण संगठन के स्थापना की सिफारिश की, जिसका उद्देश्य स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा तथा खरीदी कार्यों को एक संगठन के दायरे में लाना था.

उसी साल 2016 में एक अन्य पूर्व सचिव धीरेंद्र सिंह की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की समिति ने एक भारी-भरकम रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसने रक्षा खरीद प्रक्रिया (डीपीपी)-2016 में कई प्रक्रियात्मक परिवर्तन करने का आधार बनाया.

हैरानी की बात ये है कि इसकी भी वर्तमान में रक्षा मंत्रालय के महानिदेशक (अधिग्रहण) के नेतृत्व में पिछले साल गठित एक समिति द्वारा समीक्षा की जा रही है.

इस बीच साल 2008 में पूर्व सचिव (रक्षा वित्त) वीके मिश्रा की अगुवाई वाली रक्षा व्यय समीक्षा समिति ने रक्षा क्षेत्र में खर्च को युक्तिसंगत बनाने के लिए कई सिफारिशें कीं, जो करीब-करीब उसी तरह थीं, जैसी एक पूर्व मंत्री की अगुवाई वाली अरुण सिंह समिति ने 25 साल पहले की थी.

इन समितियों की सिफारिशों से क्या निकला, इसके बारे में तो पता नहीं चला, लेकिन साल 2016 में जनरल शेकतकर की अगुवाई में एक और समिति बना दी गई, जिसे सेना की युद्ध क्षमताओं को बढ़ाने के लिए रक्षा खर्च को संतुलित करने के संबंध में सुझाव देने को कहा गया.

शेकतकर समिति द्वारा रक्षा बजट, आधुनिकीकरण, संरचनात्मक पुनर्गठन और प्रशिक्षण इत्यादि के संबंध में की गईं 188 सिफारिशों में से मुट्ठी भर सिफारिशों को अप्रैल 2020 तक लागू किया गया है, जिसमें एक चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ शामिल है.

चूंकि स्वीकृत प्रस्तावों को लागू करने के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं की गई है, इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी कि अगर आगे चलकर रक्षा मंत्रालय की रुचि इनमें से खत्म हो जाती है और वो समान मुद्दों की जांच करने के लिए फिर से एक समिति का गठन कर दे.

ये असंख्य समितियां और कार्य बल शायद ही कभी फलदायी साबित हुए हों और इसकी प्रमुख वजहें राजनीतिक और नौकरशाही नेतृत्व में बदलाव आना या सिफारिशों के लागू होने से पहले उसमें रुचि का खत्म हो जाना है.

उदाहरण के तौर पर, पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर रक्षा अधिग्रहण संगठन बनाने के लिए उत्सुक थे, लेकिन जैसे ही वे गोवा के मुख्यमंत्री बनें, उसके बाद साल 2016 की प्रीतम सिंह समिति की रिपोर्ट के जरिये इस प्रक्रिया को कारगर बनाने के अनगिनत सुझावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया.

कुछ पिछली रिपोर्ट्स सार्वजनिक पटल पर उपलब्ध हैं लेकिन उसमें से चुनिंदा रिपोर्ट ही ऐसी हैं जो इन सुझावों को लागू करने में आने वाली अड़चनों का उल्लेख नहीं करतीं, जिन्हें रक्षा मंत्रालय को पार करना है.

इसके चलते रक्षा मंत्रालय को एक सूचित निर्णय लेने में मुश्किल खड़ी होती है. अक्सर कई रक्षा मंत्रालय से जुड़े संगठनों से भी अनुशंसित परिवर्तनों को लेकर प्रतिरोध जताया जाता है क्योंकि वे अपने विशेष आंतरिक हितों के लिए इसे ठीक नहीं मानते हैं.

ओएफबी का कॉरपोरेटीकरण करने की हालिया सिफारिश इस बाधा का एक प्रमुख उदाहरण है. वैसे तो इसका निगमीकरण करने की वकालत करना एक ट्रेंड बन चुका है, लेकिन इस ‘सुधार’ को लागू करने से कैसे यह आयुध कारखानों को अधिक कुशल बना देगा और आत्मनिर्भरता के उद्देश्य की पूर्ति करेगा, इसका कोई जवाब नहीं दिया गया है.

यह करीब 80,000 ओएफबी कर्मचारियों की चिंताओं को भी दूर करने में विफल है, जब महामारी से प्रभावित भारत में बेरोजगारी तेजी से बढ़ रही है.

कई सारे मामलों में इन रिपोर्ट्स में तुरंत लागू हो पाने वाले सुझाव नहीं होते हैं, जिसके कारण समय बर्बाद करने वाले नौकरशाही हस्तक्षेप को इसे लागू करने का रास्ता निकालना होता है.

अगर करीब से देखें, तो इसमें से कुछ प्रस्ताव लागू करने की संभावना से परे होते हैं लेकिन लागू न कर पाने या इसमें रोड़ा अटकाने के लिए रक्षा मंत्रालय के नौकरशाहों को दोषी ठहराया जाता है.

कई सिफारिशों के साथ एक मूलभूत समस्या उनकी वित्तीय व्यवहार्यता है यानी कि उसमें आने वाला खर्च है. इसके लिए देश के वार्षिक रक्षा बजट को- रक्षा पेंशन को छोड़कर- जीडीपी का 2.5 फीसदी से बढ़ाकर 3 फीसदी करने के सुझाव से बेहतर कुछ नहीं दिखाता है.

लेकिन सेना के आधुनिकीकरण के लिए रक्षा बजट को बढ़ाना क्यों जरूरी है, इसके पीछे के तर्कों की शायद ही कभी व्याख्या की गई हो.

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अर्थव्यवस्था की पंगु स्थिति को देखते हुए इस तरह के आकाशीय रक्षा बजट की भरपाई कैसे की जा सकेगी.

राजकोषीय विवेक के समय में रक्षा मंत्रालय को इसका एहसास होना चाहिए कि अस्पष्ट विचारों पर आधारित, वित्तीय वास्तविकताओं से दूर और बिना उचित बहस या बहु-पक्षीय राजनीतिक समर्थन के आधार पर अतार्किक, छिटपुट और दोहराव वाले प्रयास से भारत के रक्षा प्रबंधन को बदलने की संभावना नहीं है.

रक्षा मंत्रालय के पास उस कहावत को झूठा साबित करने का मौका है, जो कहती है कि समितियां ऐसे लोगों का समूह होती हैं, जो अकेले कुछ नहीं कर सकते, लेकिन एक समूह के बतौर वे यह फैसला कर सकते हैं कि कुछ किया न जा सके.

(लेखक रक्षा मंत्रालय के पूर्व वित्तीय सलाहकार (अधिग्रहण) हैं.)

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