राजनीति

लद्दाख: भाजपा सहित सभी राजनीतिक-धार्मिक समूहों ने पहाड़ी परिषद चुनाव के बहिष्कार का फैसला किया

नवनिर्मित केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के बौद्ध बहुल लेह जिले में भाजपा सहित सभी राजनीतिक और धार्मिक संगठनों की मांग है कि क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची के तहत लाया जाए. ये समूह क्षेत्र की जनसांख्यिकी, भूमि और नौकरियों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं.

Leh: Vehicles pass through the Leh Gate in Leh, Ladakh, Sunday, July 12, 2020. (PTI Photo) (PTI12-07-2020 000194B)

लेह में बना लेह गेट. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: एक अप्रत्याशित कदम उठाते हुए नवनिर्मित केंद्र शासित प्रदेश बने लद्दाख के बौद्ध बहुल लेह जिले के सभी राजनीतिक और धार्मिक संगठनों ने आगामी हिल काउंसिल चुनावों में भाग नहीं लेने का फैसला किया है. उनकी मांग है कि क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची के तहत लाया जाए.

ये समूह क्षेत्र की जनसांख्यिकी, भूमि और नौकरियों की सुरक्षा के लिए संवैधानिक सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं.

संयोगवश समूहों ने यह फैसला ऐसे समय में किया है जब भारत और चीन के सैनिकों के बीच तनातनी के कारण लद्दाख में हो रहे घटनाक्रमों पर दुनियाभर की नजर है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) जिले के सर्वोच्च निकाय संगठन में होने वाले चुनावों का बहिष्कार करने वालों में शामिल है और उसने इस संबंध में जारी घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर भी किया है. इस मांग के कारण भाजपा नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ सकता है.

यह देखना भी दिलचस्प होगा कि क्या भाजपा लद्दाख को संवैधानिक सुरक्षा मुहैया कराती है या जम्मू कश्मीर की तरह केवल अधिवास संबंधी कानून देकर संतुष्ट कराने की कोशिश करेगी.

एक संयुक्त बयान में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, भाजपा के राजनीतिक प्रतिनिधियों और विभिन्न धार्मिक समूहों के नेताओं ने चुनावी प्रक्रिया का बहिष्कार करने का एकमत से फैसला किया.

12 नेताओं द्वारा हस्ताक्षरित बयान में कहा गया है, ‘पीपुल्स मूवमेंट के शीर्ष निकाय ने सर्वसम्मति से तब तक आगामी छठी लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद (एलएडीएचसी), लेह चुनाव का बहिष्कार करने का संकल्प लिया है जब तक कि लद्दाख और उसके लोगों को बोडो प्रादेशिक परिषद की लाइन पर छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा नहीं मिल जाती है.’

इस समूह का गठन इस साल अगस्त में तब किया गया था जब सभी बड़े राजनीतिक और गैर-राजनीतिक समूहों ने क्षेत्र की सुरक्षा की मांग को लेकर एक साथ आने का फैसला किया था.

प्रस्ताव पर हस्ताक्षरकर्ताओं में थुपस्तान चेवांग (पूर्व लोकसभा सांसद), स्काईबजे थिकसे खामपो रिनपोचे (पूर्व राज्यसभा सांसद), चेरिंग दोरजे लारोक (पूर्व मंत्री), नवांग रिग्जिन जोरा (पूर्व मंत्री) व अन्य शामिल हैं.

सबसे शक्तिशाली धार्मिक समूह लद्दाख बौद्ध संघ भी प्रस्ताव का एक हस्ताक्षरकर्ता है. इसे अंजुमनी मोइन-उल-इस्लाम, अंजुमनी इमामी और क्षेत्र के ईसाई समुदाय जैसे अल्पसंख्यक समूहों का भी समर्थन मिला है.

लेह के भाजपा जिला अध्यक्ष नवांग समस्तन भी प्रस्ताव पर हस्ताक्षरकर्ता हैं. उन्होंने कहा, ‘मांग को लेकर जनभावनाओं को देखते हुए हमारी जिला इकाई ने प्रस्ताव का समर्थन किया है.’

हालांकि, इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया के लिए लद्दाख के भाजपा अध्यक्ष जामयांग सेरिंग नामग्याल से संपर्क करने की सभी कोशिशें बेकार रहीं.

लेह के पूर्व मुख्य कार्यकारी पार्षद रिगजिन स्पल्बर ने द वायर  से बातचीत में कहा कि संविधान की छठी अनुसूची से कम कुछ भी लद्दाख क्षेत्र का भगवाकरण करने के प्रयास के रूप में माना जाएगा.

उन्होंने कहा, ‘हम केवल 300,000 लोग हैं. हम एक विशाल क्षेत्र के साथ एक छोटी आबादी हैं. इस क्षेत्र की जनसांख्यिकी को बदलने में बहुत कम समय लगेगा. हम कुछ ऐसा नहीं मांग रहे हैं जो भारत के संविधान के बाहर है.’

सबसे पहले चुनाव का बहिष्कार करने का विचार रखने वाले स्पलबर ने कहा कि वे जम्मू कश्मीर की तर्ज पर एक अधिवास कानून को अस्वीकार करते हैं. उन्होंने कहा, ‘हम अधिवास कानून को पूरी तरह से खारिज करते हैं, क्योंकि यह बाहरी लोगों को बसने की अनुमति देने के लिए एक रास्ता है.’

पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य में पीडीपी-भाजपा सरकार में मंत्री रहे चेरिंग दोरजे ने कहा कि लद्दाख के लोग पिछले एक साल में भाजपा के उदासीन रवैये से थक गए हैं.

उन्होंने कहा, ‘जब तक इस क्षेत्र को संविधान की छठी अनुसूची के तहत नहीं लाया जाता, कोई भी मतदान में भाग नहीं लेगा. यहां तक कि भाजपा की स्थानीय इकाई भी भाग नहीं ले सकती है.’

परिषद की 26 सीटों पर 16 अक्टूबर को चुनाव होने हैं.

क्या है छठी अनुसूची?

छठी अनुसूची में भूमि अधिकारों के संरक्षण, मूल निवासी की सामाजिक-सांस्कृतिक और जातीय पहचान के लिए असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम में जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए प्रावधान हैं.

पिछले साल सितंबर में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (एनसीएसटी) ने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखा था, जिसमें सिफारिश की गई थी कि लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत एक आदिवासी क्षेत्र घोषित किया जाए.

हालांकि, पिछले साल दिसंबर में केंद्र ने संकेत दिया कि लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत नहीं लाया जा सकता है.

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