बिहार चुनाव: ‘नियोजित शिक्षकों में जैसा गुस्सा है उससे साफ है कि ये सरकार नहीं रहेगी’

ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार के क़रीब चार लाख से अधिक नियोजित शिक्षकों की सेवा शर्त, पूर्ण वेतनमान जैसी विभिन्न मांगों को लेकर लंबे समय से नीतीश सरकार से ठनी हुई है. अब शिक्षक संघ और शिक्षकों का कहना है कि वे इस चुनाव में सरकार से आर पार की लड़ाई करने जा रहे हैं.

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अगस्त महीने में बिहार सरकार द्वारा अनुमोदित नियोजित शिक्षक सेवाशर्त 2020 की प्रति जलाकर विरोध जताते बिहार के नियोजित शिक्षक. (फोटो साभार: ट्विटर/@Dharmendrajee1)

ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार के क़रीब चार लाख से अधिक नियोजित शिक्षकों की सेवा शर्त, पूर्ण वेतनमान जैसी विभिन्न मांगों को लेकर लंबे समय से नीतीश सरकार से ठनी हुई है. अब शिक्षक संघ और शिक्षकों का कहना है कि वे इस चुनाव में सरकार से आर पार की लड़ाई करने जा रहे हैं.

अगस्त महीने में बिहार सरकार द्वारा अनुमोदित नियोजित शिक्षक सेवाशर्त 2020 की प्रति जलाकर विरोध जताते बिहार के नियोजित शिक्षक. (फोटो साभार: ट्विटर/@Dharmendrajee1)
अगस्त महीने में बिहार सरकार द्वारा अनुमोदित नियोजित शिक्षक सेवाशर्त-2020 की प्रति जलाकर विरोध जताते बिहार के नियोजित शिक्षक. (फोटो साभार: ट्विटर/@Dharmendrajee1)

बिहार के करीब चार लाख नियोजित शिक्षक लंबे समय से सेवा शर्त, पूर्ण वेतनमान और अन्य मांगों को लेकर नीतीश सरकार के खिलाफ संघर्षरत हैं.

हालांकि चुनावी दांव खेलते हुए सरकार ने दो महीने पहले अगस्त में नियोजित शिक्षकों के वेतन में 22 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा की थी.

दरअसल सरकार ने नई नियमावली में नियोजित शिक्षकों के मूल वेतन में 15 फीसदी की बढ़ोतरी की है, जो कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ) मिलाकर करीब 22 फीसदी होता है. अप्रैल 2021 से नई नियमावली के प्रभावी होने की बात कही गई है.

शिक्षक संघ इसको सरकार का ‘चुनावी पैंतरा’ बताते हुए शिक्षकों के जरिये करीब 14 लाख मतदाताओं को बरगलाने की ‘बेशर्मी’ क़रार दे रहे हैं.

बता दें कि सरकार ने अपनी घोषणा में वेतन में बढ़ोतरी के अलावा नियोजित शिक्षकों को 15 दिन की पैटरनिटी लीव और सात साल की जगह तीन साल की नौकरी पर पैटरनिटी लीव देने की बात कही है.

वहीं, मैटरनिटी लीव को 135 दिन से बढ़ाकर 180 दिन किया गया है. साथ ही स्थानांतरण और प्रमोशन समेत कई दूसरी सुविधाओं के लाभ की बात भी कही है. इसमें शिक्षक की मृत्यु के बाद अनुकंपा पर नौकरी का वादा भी शामिल है.

लेकिन नियोजित शिक्षक इस नई सेवा शर्त से बेहद नाराज़ हैं. उल्लेखनीय है कि शिक्षकों ने 5 सितंबर को शिक्षक दिवस पर काला बिल्ला लगाकर संकल्प दिवस मनाया था.

उन्होंने मुंह पर काली पट्टी बांधकर इसे अपमान दिवस बताते हुए सरकार के खिलाफ अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी.

सरकार से नियोजित शिक्षकों की नाराज़गी के बीच महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपने नामांकन के बाद ये कहकर मुद्दे को हवा दे दी कि हम नियोजित शिक्षकों को समान काम के बदले समान वेतन देंगे.

तेजस्वी ने नियोजित शिक्षकों की मांग को जायज़ क़रार देते हुए ये भी कहा था कि नियोजित शिक्षकों को नीतीश जी ने इस्तेमाल किया और जब वो अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे थे, संघर्ष कर रहे थे, तब उनको लाठी डंडे से पिटवाने का काम किया. और अपने कई भाषणों से धमकाया भी.

द वायर  से बात करते हुए परिवर्तनकारी प्रारंभिक शिक्षक संघ, दरभंगा के जिला अध्यक्ष संजय कुमार राय इस घोषणा को सरकार की दोहरी नीति, दोहरी चाल बताते हैं.

वे कहते हैं, ‘सरकार द्वारा हमें फिर से छला गया है. ये सरकार हमें मानसिक रूप से पंगु बना देना चाहती है. हम बच्चों को पढ़ाएं या पेट के लिए ही संघर्ष करते रहें.’

वे नियोजित शिक्षकों की शब्दावली में कहते हैं कि सरकार ने फिर से ‘चाइनीज वेतनमान’ का निर्माण किया है और वही वेतन आज तक हमें मिल रहा है.

वे सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ‘चौथे ग्रेड में जो एक सरकारी वर्कर है उससे भी कम वेतन हमें मिलता है. हमारे लिए कोई बोनस तक नहीं है. सरकार ने हमें ठगने का काम किया है, चाइनीज वेतनमान और चाइनीज सेवा शर्त को मंच से दिखा-दिखाकर आज वो वाहवाही लूट रही है और जनता को समझा रही है कि हम नियोजित शिक्षकों को निहाल कर दिए हैं.’

वे इस सेवाशर्त को शिक्षकों के साथ खिलवाड़ बताते हुए कहते हैं, ‘पीएफ की जो एकमात्र बात हुई सरकार द्वारा 1 सितंबर 2020 से, जबकि हम लोगों को जबसे साठ साल किया गया उस दिन से पीएफ मिलना चाहिए. लेकिन ये सरकार जबरदस्ती हमसे जॉइनिंग डेट एक सितंबर 2020 लिखवाना चाहती है. जैसे मेरी जॉइनिंग 2003 की है, लेकिन यहां भी हमारे साथ धोखा.

पीएफ के सवाल पर वो सरकार को निर्लज्ज बताते हुए कहते हैं कि पीएफ हाईकोर्ट ने दिया है. सरकार ने तो कोर्ट के निर्णय के बाद भी कुछ नहीं किया. सरकार पर अवमानना दायर किया गया, लेकिन वो कोर्ट के फैसले की लगातार अवहेलना करती रही. कोर्ट के दूसरे समन के बाद सरकार सेवाशर्त में ईपीएफ को डालकर आज अपनी पीठ थपथपा रही है.

संजय कुमार राय.
संजय कुमार राय.

संजय ट्रांसफर के सवाल पर भी सरकार को चालबाज़ कहते हैं, ‘पंचायत से जो हम लोगों के स्थानांतरण का मामला है तो ये म्युचअल ट्रांसफर है. अब बताइए हम को अगर कहीं जाना है और दूसरी तरफ का आदमी यहां नहीं आना चाहता हो तो कैसा ट्रांसफर?’

वे दो टूक अंदाज़ में कहते हैं, ‘ हम इन सब बातों को लेकर इस सरकार के खिलाफ सचेत हैं और अपने भविष्य के लिए फैसला कर चुके हैं.’

नई सेवा शर्त से ख़फ़ा संजय बताते हैं, ‘हमारे कई शिक्षक साथी रिटायर हुए लेकिन उनको किसी भी तरह का एक रुपये का लाभ नहीं मिला. मतलब जब तक काम तब तक वेतन और जब रिटायर हुए तो पेंशन है न कोई रिटायरमेंट प्लान.

संघ के जिला सचिव मोहम्मद कलीम की मानें तो शिक्षकों के आक्रोश का असर चुनावी नतीजों में भी दिखेगा. उनका कहना है कि शिक्षकों में जिस तरह का गुस्सा है उससे साफ है कि ये सरकार नहीं रहेगी.

वे समान काम और समान वेतन की बात करते हुए कहते हैं, ‘2020 की धोखाधड़ी के बाद नियोजित शिक्षकों ने संकल्प लिया है कि जो सरकार हमें सुप्रीम कोर्ट में हराने का काम कर सकती है उसको हमारे भविष्य की चिंता नहीं हो सकती.’

अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कलीम कहते हैं, ‘जब समान काम और समान वेतन का मामला हाईकोर्ट में था तब ये सरकार कहती थी जो फैसला आएगा वो मान्य होगा लेकिन फैसले के बाद सरकार पलट गई.

कलीम सरकार के नए वादों पर कहते हैं, ‘ये अंधी-बहरी सरकार कभी शिक्षकों के हक में आगे नहीं आई. हम 2008 में लड़े 2009 में लड़े और अब तक निरंतर आंदोलन में हैं. लेकिन बस हजार दो हजार की बढ़ोतरी की गई. हमें कभी शिक्षक का सम्मान नहीं मिला. शिक्षक का वेतन नहीं मिला.’

वहीं, नियोजित शिक्षिका अनामिका कहती हैं, ‘हमारी नाराज़गी आपको चुनाव में नज़र आएगी. वाजिब मांगों को नज़रअंदाज़ करके आप सरकार में नहीं रह सकते.’

वे आगे कहती हैं, ‘कोरोना का समय हो, बाढ़ हो या और दूसरे मौक़े हों, सरकार हमसे वर्किंग डे में सब कुछ करवाती है इस पर हमें ऐतराज़ नहीं है लेकिन मताधिकार में तो हम अपनी राय देंगें ही.’

अनामिका बदहाल शिक्षा व्यवस्था के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराते हुए कहती हैं, ‘पठन-पाठन के अलावा हर काम करवाया जाता है. मैंने 2015 में जॉइन किया है और अब तक यही समझ में आया है कि पढ़ाई सरकार की प्राथमिकता में है ही नहीं. उनका अपना काम पहले ज़रूरी है.’

अनामिका.
अनामिका.

वे आगे जोड़ती हैं, ‘हमें लगता है विद्यालय जो है वो सिर्फ कागज पर चल रहा है. इससे शिक्षकों का भी मनोबल घट रहा है और बच्चों का भी. बच्चे पढ़ना चाहते हैं, टीचर भी पढ़ाना चाहते हैं लेकिन इतना ज़्यादा एक्स्ट्रा वर्क लोड है कि समय ही नहीं बचता.’

सरकार की घोषणाओं पर वे कहती हैं, ‘ये सरकार हमें सम्मान क्या देगी ये हमें अपना नौकर और गुलाम समझती है. जिस राज्य में गुरु का ही सम्मान नहीं है उस राज्य में शिक्षा का स्तर क्या होगा. हमने अपनी मांगों को लेकर बहुत संघर्ष किया लेकिन हमें सिर्फ उत्पीड़न ही मिला है. बहुत ज़्यादा दुव्यर्वहार हुआ है हम शिक्षकों के साथ.’

समान काम समान वेतन का ज़िक्र करते हुए कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि हम कम काम करते हैं या कम शिक्षित हैं. कुछ टीचर्स तो ऐसे हैं जिन्होंने ट्रेंड जॉइन किया फिर भी हम किसी गिनती में नहीं हैं. और जो ही हमारा वेतन है वो भी समय से नहीं मिलता, अभी त्योहार के समय भी यही हाल है.

संघ के जिला उपाध्यक्ष संतोष कुमार दास सरकार पर सीधे आरोप लगाते हैं, ‘देखिए केंद्र सरकार की ओर से बिहार सरकार को हमारे नाम पर बहुत पैसा मिल रहा था लेकिन वो हमारे पैसे को साइकिल योजना, पोशाक योजना, छात्रवृत्ति योजना में खर्च करती थी और हमें 4 से 5 हजार ही देती थी. इस बात की पोल उस वक़्त खुली जब केंद्र सरकार ने पैसे की कटौती की और कहा कि हम तो शिक्षकों के लिए पैसा दे रहे थे. उसके बाद हम लोग रोड पर संघर्ष के लिए उतरे.’

वे मुख्यमंत्री को निशाना बनाते हुए कहते हैं, ‘नीतीश जी का कितनी ही बार वक्तव्य आ चुका है कि हमें वोट की चिंता नहीं है हम समान वेतन नहीं दे सकते. वो कह चुके हैं कि अयोग्य शिक्षकों की बहाली करके शिक्षा व्यवस्था को नष्ट किया गया, फिर भी हमने इनकी नौकरी बचाई.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘ये है मुख्यमंत्री की सोच, और नीति देखिए गरीब बच्चे, जो स्कूल में पढ़ते हैं सिर्फ उसके लिए लॉकडाउन है बाकी सब कुछ खुला हुआ है भीड़ से कोई फर्क नहीं पड़ रहा चुनाव भी हो रहा है.’

वे स्कूलों की स्थिति को लेकर कहते हैं, ‘हम पर हर समय दबाब बनाया जाता है. आप घूमकर देखिए कितने ही विद्यालय के भवन जर्जर हैं लेकिन हम से कहा जा रहा है बूथ की व्यवस्था कीजिए, लाइट खरीदकर लाइए.’

संतोष कुमार दास.
संतोष कुमार दास.

संतोष सरकार को मौकापरस्त बताते हैं और अपना अनुभव बताते हैं, ‘अभी बाढ़ के समय आदेश मिला और हमने खाना बनाना शुरू कर दिया. अपना पैसा लगाकर, कर्जा लेकर और अभी तक एक पैसा नहीं आया न बाढ़ वाला न क्वारंटीन वाला. अब लाखों रुपये के कर्जा में फंसा दिए हम लोगों को. दुकानदारों तक से मुंह छिपाना पड़ रहा है.’

सरकार के रवैये पर उनका कहना है, ‘अभी एक लेटर निकाल दिए कि अक्टूबर की सैलरी दे दी गई है अब अख़बार देखकर दुकानदार लोग पीछे पड़ गए कि बक़ाया दीजिए. जबकि सितंबर का भी सैलरी अभी नहीं मिला है. क्या कहा जाए ये सरकार चलने वाली नहीं है.’

संतोष आगे कहते हैं कि शिक्षक को दोषी ठहराकर ये सरकार अपनी पीठ भी थपथपा लेती है. इनकी सरकार में शिक्षक सब कुछ है बस वो शिक्षक नहीं है, रुपये बांटने के समय खजांची हो जाते हैं, दवा बांटते समय स्वास्थ्यकर्मी और खाना बनाते समय रसोईया…शिक्षक है कहां. शिक्षक के बिना इनका कोई काम नहीं होता लेकिन इनके पास शिक्षकों के लिए सांत्वना भी नहीं है.

वे कहते हैं, ‘बस अफसरशाही चल रही है, किसी भी विभाग में छोटा से छोटा काम के लिए भी कुछ न कुछ चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है.’

संघ के जिला प्रवक्ता बिक्रम आदित्य झा कहते हैं, ‘शिक्षकों की मनोदशा बहुत खराब हो चुकी है. गुरु की तुलना देवताओं से होती थी लेकिन इस सरकार में हम चपरासी से भी नीचे हैं. और ये बात सरकार की तरफ से कही जाती है कि आप चपरासी से बदतर हैं.’

वे कहते हैं कि इसका असर साफ-साफ चुनाव पर पड़ने वाला है और आने वाला समय शिक्षकों के हित में होगा.

वे समान काम समान वेतन को लेकर सरकार की वादाखिलाफी पर कहते हैं, ‘बिहार की तस्वीर और तकदीर बदलने के लिए हमारी बहाली हुई और बिहार की तस्वीर इन अर्थों में बदली भी कि पहले स्कूल से ड्रापआउट बच्चों की संख्या बहुत ज़्यादा थी, लेकिन हमने बच्चों को विद्यालय से जोड़ा. और जो बिहार शिक्षा के मापदंडों पर सबसे निचले पायदान पर था उसमें सुधार भी हुआ.’

समान काम समान वेतन पर हाईकोर्ट में मिली जीत पर वे कहते हैं, ‘विडंबना देखिए 15 साल से मेहनत कर रहे हैं और उच्च न्यायालय ने भी शिक्षकों के मान सम्मान की बात की. सरकार को न्यायालय की बात मान लेनी चाहिए थी. 90 दिन का समय था लेकिन अंतिम क्षणों में सरकार सुप्रीम कोर्ट गई तो निश्चित रूप से उसकी मंशा पर सवाल उठता है.’

नियोजित शिक्षक ललन पासवान साफ शब्दों में कहते हैं, ‘आज वो कुछ भी बोलें हम लोगों का सिर्फ शोषण हुआ है. हम इस सरकार को हटाकर ही दम लेंगे.’

संघ के जिला अध्यक्ष संजय नियोजित शिक्षकों पर सरकार की ज़्यादतियों को याद करते हुए कहते हैं, ‘हमारी बहाली 2003 में पंचायत शिक्षामित्र के रूप में हुई. 11-11 महीने पर अनुबंध को बढ़ाना था. लेकिन जब 33 महीने हो गए तब हमारी छंटनी शुरू हो गई.’

उन्होंने आगे बताया, ‘जब हम इसके खिलाफ 25 नवंबर 2005 को पटना में शांतिपूर्ण धरना प्रदर्शन कर रहे थे तब सरकार ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थे शिक्षकों को मारा पीटा. हाथ-पांव तोड़ दिए, हमारी बहनों को अर्धनग्न तक किया गया.’

उन्होंने आगे बताया कि सरकार पूरी दुनिया में शर्मसार हुई, और जब उसके घिनौने कृत्य की चौतरफा आलोचना हुई तब चार हजार और साठ साल के लिए नियुक्ति दी.

वे कहते हैं, ‘आज तक हमारा सरकारीकरण नहीं किया गया. हम लोग आज भी पंचायत नियोक्ता पर हैं. सरकार की नीयत साफ होती तो हम धरना प्रदर्शन और कोर्ट कचहरी का चक्कर नहीं लगाते.’

वे नीतीश सरकार के पूरे कार्यकाल को ही शिक्षकों के खिलाफ बताते हैं, ‘हमने 2009 में भी धरना प्रदर्शन किया उस समय भी लाठियां मिलीं. बस 2 हजार की बढ़ोतरी हुई. फिर 2015 में हड़ताल पर गए तो सरकार ने हमें आश्वस्त किया कि आप अपने स्कूलों में वापस जाइए हम जो सेवा शर्त और वेतनमान की मांग है उसको को मान लेंगें. लेकिन उनकी धूर्तबाज़ी फिर सामने आ गई. आज भी ये सरकार हमारे नाम पर जनता को गुमराह कर रही है.’

उन्होंने बताया, ‘सरकार के खिलाफ इस साल भी हम 78 दिनों तक हड़ताल पर रहे. इस बीच महामारी आ गई. हालांकि सरकार की तरफ से आश्वस्त किया गया तो हम जनता के हित को देखते हुए स्कूल लौट गए और जितने भी प्रवासी आए, हम ने तत्परता से उनकी सेवा की. जान की परवाह तक नहीं की. लेकिन सरकार की तरफ से घोषणा तक नहीं की गई कि अगर इस महामारी में शिक्षकों की मृत्यु होती है तो उसको कोई लाभ दिया जाएगा जबकि आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्यकर्मी सबको लाभ देने की बात कही गई.’

संजय की मानें तो महामारी में कई शिक्षकों की मौत हुई, लेकिन उनके परिवार को कुछ नहीं मिला.

अदलपुर के प्राथमिक विद्यालय का हाल.
अदलपुर के प्राथमिक विद्यालय का हाल.

वे नाराजगी जताते हैं, ‘हमें सरकार पर ये आरोप लगाने का हक नहीं है लेकिन हम कहना चाहते हैं कि सरकार के जितने भी कार्यालय हैं वो नियोजित शिक्षकों से ही चल रहे हैं. हम नाम के लिए स्कूल में मौजूद हैं, हमारी पोस्टिंग कहां है, बीआरसी में, अंचल कार्यालय में, प्रखंड कार्यालय में एसडीओ कार्यालय और जिला कार्यालय में. लेकिन सरकार जनता को दिखा रही है कि हमने बच्चों के लिए स्कूल में शिक्षक दिया हुआ है. यहां सरकार की तरफ से दोहन का भारी खेल चल रहा है.’

वो सरकार को तानाशाह बताते हुए कहते हैं, ‘हाईकोर्ट कई बार कह चुका है कि शिक्षकों को मूल विद्यालयों में जाना चाहिए उनकी प्रतिनियुक्ति नहीं होनी चाहिए लेकिन ये सरकार अदालत के निर्देश को धता बताने में पेश-पेश है.’

वो समान काम समान वेतन के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहते हैं, ‘हम हाईकोर्ट से जीते. उस समय सरकार और शिक्षा मंत्री का बार बार बयान आ रहा था कि ये लोग हाईकोर्ट में है और कोर्ट जो निर्णय देगा वो हम मान लेंगे. मगर ये सरकार सुप्रीम कोर्ट चली गई. हम वहां भी चंदा-चुटकी करके पहुंचे. पहले दिन की बहस में जस्टिस आरएफ नरीमन ने समान काम के लिए समान वेतन के पक्ष में बात की. लेकिन दूसरी सुनवाई में जज के पैनल को बदल दिया गया.’

मोहम्मद कलीम की मानें तो 17 साल पहले शिक्षामित्र के तौर पर नियोजित शिक्षकों ने शिक्षा व्यवस्था को बहाल करने में कड़ी मेहनत करनी पड़ी, जिसके फलस्वरूप आज विद्यालय के रख-रखाव और पढ़ाई को वर्ल्ड बैंक भी जानती है.

वो नियोजित शब्द को अपने लिए अपमानित और कलंकित बताते हुए कहते हैं, ‘हमारी बहाली सरकार की अनुशंसा पर पंचयत इकाई से सुख सुविधा समिति के द्वारा की गई. और पहले जो स्कूल महीनों नहीं खुलता था वो समाज और प्रशासन को खुला मिला, पढ़ाते हुए शिक्षक मिले. और जब हम अपनी मेहनत का बदला मांगने पहुंचे तब हमें लाठियां मिलीं.’

वे कहते हैं, ‘नियोजित शिक्षकों के परिवार को देखिए क्या दुर्दशा है. हमने बहुत धैर्य से काम लिया. हमारे कई संघ हैं लेकिन इस मुद्दे पर कहीं कोई बंटवारा नहीं है. हमारे जितने भी संघ हैं सबकी एक ही मांग है हमको पूर्ण वेतनमान दिया जाए. हमें वो तमाम सुविधा दी जाए जो हमारे सरकारी शिक्षक को मिलती है.’

कलीम कहते हैं, ‘अभी चुनावी माहौल में हमारे वित्त मंत्री और डिप्टी सीएम ने कहा कि 51 हजार 555 रुपये नियोजित शिक्षकों का वेतन है, भेद खुल गया. आख़िर ये वेतन क्यों नहीं मिला नियोजित शिक्षकों को. जब आप खुद स्वीकार कर रहे हैं.

वो शिक्षकों के साथ अन्याय की बात करते हुए कहते हैं, ‘2006 से समान वेतन की लड़ाई लड़ते आ रहे हैं. हम सेवाशर्त की मांग करते आ रहे हैं. हम सरकारी कर्मी का दर्जा मांगते आ रहे हैं. 17 साल एक टाइम पीरियड होता है. आप 17 साल से हमें ठगते आ रहे हैं और 2020 में तो आपकी मंशा साफ हो चुकी है.’

शिक्षक संघ और शिक्षकों की मानें तो वो इस चुनाव में सरकार से आर पार की लड़ाई करने जा रहे हैं और अपनी बुनियादी मांग समान काम समान वेतन के मुद्दे पर समझौते को तैयार नहीं हैं.