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भगवान कृष्ण के नाम पर पेड़ों को काटने की अनुमति नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट

उत्तर प्रदेश सरकार और लोक निर्माण विभाग समेत उसके प्राधिकारों ने एक सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मथुरा में कृष्ण-गोवर्धन रोड परियोजना के तहत सड़क चौड़ा करने के लिए क़रीब तीन हज़ार पेड़ों को काटने की अनुमति देने का अनुरोध किया है.

New Delhi: A view of the Supreme Court, in New Delhi, on Thursday. (PTI Photo / Vijay Verma)(PTI5_17_2018_000040B)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि ‘भगवान कृष्ण के नाम पर के नाम पर करीब तीन हजार पेड़ों को काटने की इजाजत नहीं दी जा सकती’ और उत्तर प्रदेश सरकार से मथुरा में कृष्ण-गोवर्धन सड़क के लिए काटे जाने वाले पेड़ों को लेकर आकलन करने को कहा.

मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने उत्तर प्रदेश सरकार के लोक निर्माण विभाग के वकील से कहा, ‘भगवान कृष्ण के नाम पर आप हजारों पेड़ों को काट नहीं सकते हैं.’

शीर्ष अदालत ने कहा कि ‘लकड़ी के मूल्य’ के हिसाब से नहीं, बल्कि ऑक्सीजन देने की क्षमता वाले पहलुओं को ध्यान में रखते हुए आकलन करना होगा.

सीजेआई एसए बोबडे और जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस वी. रामसुब्रमण्यम की पीठ ने कहा कि राज्य सरकार यह बता पाने की स्थिति में नहीं है कि वन विभाग पेड़ों का किस तरह आकलन करेगा. आकलन को लेकर अपनाए जाने वाले तरीके के बारे में अवगत कराने के लिए चार हफ्ते का वक्त दिया जा रहा है.

राज्य सरकार और लोक निर्माण विभाग समेत उसके प्राधिकारों ने एक याचिका दायर कर मथुरा जिले में कृष्ण-गोवर्धन रोड परियोजना के तहत कृष्ण मंदिर तक बनी सड़क को चौड़ा करने के लिए 25 किलोमीटर के दायरे में 2,940 पेड़ों को गिराने की अनुमति मांगी थी.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य सरकार ने कहा है कि वह इसके बदले में 138.41 करोड़ रुपये मुआवजे के रूप में देगी. राज्य ने यह भी कहा कि काटे जाने से अधिक पेड़ लगाए जाएंगे, लेकिन अदालत यह कहते हुए इससे संतुष्ट नहीं हुई कि नए पेड़ लगाना 100 साल पुराने पेड़ को काटने के बराबर नहीं है.

राज्य के पीडब्ल्यूडी की ओर से पेश एक वकील ने कहा कि परियोजना के तहत मथुरा में भगवान कृष्ण के जन्मस्थान पर स्थित मंदिर तक जाने वाली सड़क को चौड़ा भी किया जाना है.

पीठ ने कहा, ‘सिर्फ लकड़ी के हिसाब से आकलन न करें, बल्कि आकलन का ऐसा तरीका अपनाएं जिसमें यह ध्यान रखा जाए कि अगर किसी खास पेड़ को नहीं काटा गया तो बाकी जीवन काल में उससे ऑक्सीजन पैदा होने की कितनी क्षमता होगी.’

अदालत ने राज्य के उस सुझाव को खारिज कर दिया कि ट्रैफिक की तेजी से पेड़ों का काटा जाना आवश्यक है. हालांकि, अदालत ने कहा कि अगर रफ्तार धीमी रहती है तो इससे दुर्घटना कम होगी और अधिक सुरक्षित रहेगा.

ताजमहल के संरक्षण को लेकर पर्यावरणविद एमसी मेहता द्वारा दायर जनहित याचिका और कुछ अन्य याचिकाओं पर सुनवाई शुरू होने पर पीठ ने राज्य सरकार से पूछा कि परियोजना के लिए कितने पेड़ काटे जाएंगे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)