भारत

जिस सरकार ने नोटबंदी की, उसी को क़र्ज़ माफ़ी का ख़र्च भी उठाना चाहिए

अगर न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग उथली राजनीति है तो नरेंद्र मोदी का देश भर में घूम-घूम कर चुनावी सभाओं में वादा करना उथली राजनीति नहीं थी?

MODI-FARMER PTI

(फोटो: पीटीआई)

देश के शीर्ष नेतृत्व से न्यूनतम ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, और यहां पर न्यूनतम उम्मीद भी क्या है? न्यूनतम उम्मीद का मतलब यह नहीं कि जो वादा किया वह किसी भी कीमत पर पूरा किया जाए. ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ वाली बात तो कोई नहीं कर रहा है. पर कम से कम से कम ‘हमने ऐसा कोई वादा नहीं किया’ इस तरह के सफेद झूठ न बोले जाएं, इतनी उम्मीद तो कम से कम की जाए!

19 जुलाई को कृषि मंत्री जी ने लोकसभा में कहा कि कृषि उत्पाद पर 50 प्रतिशत मुनाफा देने वाला वादा प्रधानमंत्री जी ने कभी नहीं किया. कृषि मंत्री का यह बयान अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है. देश का कृषि मंत्री संसद में खड़ा होकर इतना सफेद झूठ बोलने की हिम्मत रखता हो, तो यह चिंता का विषय है. विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों की चुनावी सभाओं में जो वादा प्रधानमंत्री जी ने किया था.

उन्होंने कहा था, एक बात हमने मेनिफेस्टो में रखी है और बड़ी हिम्मत के साथ रखी है. किसान को, जो इनपुट कॉस्ट लगता है, खाद का खर्चा होता है, पानी का होता है, बिजली का होता है, दवाई का होता है, खेती में जितनी लागत होती है, उसके ऊपर 50 प्रतिशत मुनाफा तय करके उसका सपोर्ट प्राइज तय होना चाहिए’. लब-ब-लब इतना सुस्पष्ट और असंदिग्ध वचन 2014 के चुनावी सभा में मोदीजी ने दिया था.

और अब इन्हीं के कैबिनेट में कृषि मंत्री भरी संसद में उतने ही असंदिग्ध और सुस्पष्ट तरीके से कहते हैं कि हमने ऐसा कोई वचन नही दिया है, या वादा नहीं किया है. और जिनका यह बयान था वह प्रधानमंत्री इस पर मौन रहते हैं, यह बात हतप्रभ करने वाली है.

इस तरह का झूठा बयान एक राजनैतिक चाल है और खुले तौर पर प्रधानमंत्री की शह पर खेली गई है. क्योंकि इस तरह का बयान कृषि मंत्री द्वारा पहले भी दिया जा चुका है, और जिसका पुनरुच्चार संसद में किए जाने पर भी प्रधानमंत्री मौन है.

अगर प्रधानमंत्री पद की साख की थोड़ी भी चिंता होती तो राधामोहन सिंह गलत कह रहे हैं, ऐसा स्पष्टीकरण मोदीजी दे सकते थे. वे अब भी ऐसा कर सकते हैं, जो उन्होंने किया नहीं है. मीडिया क्रांति के जमाने में इस तरह का झूठ शायद जनता के लिए पहली बार परोसा जा रहा है.

प्रधानमंत्री और कृषि मंत्री के इस झूठ को नजरअंदाज करते हुए, ‘इस तरह का वादा किस तरह से व्यावहारिक नहीं है’ ऐसी चर्चा हो रही है. जो किसान नेता प्रधानमंत्री से यह अपना वादा पूरा करने की मांग कर रहे हैं, उन पर उथली राजनीति करने का आरोप भी लगाया जा रहा है.

लेकिन सवाल यह उठता है कि जब प्रधानमंत्री देश भर में घूम-घूम कर चुनावी सभाओं में यह वादा किए जा रहे थे, क्या तब वह उथली राजनीति नहीं थी? तब यह सवाल क्यों नहीं उठा?

किसान आंदोलन के नेताओं पर ऐसा आरोप लगाने वाले क्या बताएंगे कि अगर 50 प्रतिशत व्यावहारिक नहीं है तो फिर कितना प्रतिशत मुनाफा उन्हें मंजूर होगा? 10 प्रतिशत, 5 प्रतिशत, 40 प्रतिशत, 2 प्रतिशत या फिर 0 प्रतिशत? या फिर किसी भी प्रकार के न्यूनतम समर्थन मूल्य देना ही उन्हें मंजूर नहीं है?

यह सवाल इसलिए कि वादे के मुताबिक समर्थन मूल्य तो दूर, सरकार के घोषित किए अधमरे समर्थन मूल्य भी नसीब होने के लिए किसानों को संघर्ष करना पड़ रहा है. इन हालात में क्या किसानों को आप व्यावहारिकता सिखाएंगे? या फिर सरकार पर वादा निभाने के दबाव बनाएंगे? किसान नेताओं पर उथलेपन का आरोप लगाने वाले बुद्धिजीवी चाहते क्या हैं?

ज्यादातर फसलों के समर्थन मूल्य बस कागज पर ही रह जाते हैं. अरहर जैसी फसलों तो समर्थन मूल्य देने से गरीब ग्राहकों का भी फायदा होगा. जिस देश में गरीबों के खाने में प्रोटीन की कमी होती हो और जहां दाल गरीबों के लिए प्रोटीन का सबसे सस्ता स्रोत हो, वहां दाल की फसलों की उत्पादकता और उत्पाद दोनों में बढ़ोतरी करनी होगी, और इस उत्पादकता को संजोने के लिए समर्थन मूल्य का सहारा आज की व्यवस्था में आवश्यक है.

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कृषि उत्पाद की कीमतों में उतार-चढ़ाव बड़े पैमाने पर होते रहते हैं, पर देश के भीतर इन कीमतों में स्थिरता लाकर उत्पादकता बढ़ाने का न्यूनतम समर्थन मूल्य के अलावा अन्य कोई विकल्प इस वक़्त हमारे पास नहीं है.

अगर बाजार की कीमतें और समर्थन मूल्य का फर्क सीधे किसान के खाते में जमा करने का कोई उपाय होता, तो सरकार द्वारा कृषि उत्पाद की खरीदारी करने की भी आवश्यकता नहीं होती. पर आज की स्थिति में यह संभव नहीं है.

इसलिए समर्थन मूल्य को लेकर जो किसान आंदोलन कर रहे हैं, उनके पास ऐसा करने के लिए मजबूत आर्थिक और नैतिक आधार है. इसलिए इन आंदोलनों पर उथलेपन का आरोप मढ़ कर सरकार के झूठ पर पर्दा डालने का प्रयास निंदनीय है.

समर्थन मूल्य के अलावा दूसरा मुद्दा है कर्ज माफी का. कर्ज माफी राज्यों का विषय है और अपने बजट से राज्य सरकारें कर्ज माफी दें- इस तरह की बातें किसानों को गुमराह करने वाली हैं.

पहली बात, कर्ज माफी कोई सार्वकालिक बंदोबस्त या उपाय नहीं है, यह तो स्पष्ट है. पर कर्ज माफी से कर्ज चुकाने की नीयत बदल कर बैंकों की क्षमता पर असर होने का डर कई बार दिखाया जाता है.

सतही तौर पर शायद किसी को इस काल्पनिक डर में वास्तविकता नजर आ जाए. भारत के पहले मुख्य सांख्यिकीविद डॉ. प्रनब सेन ने इस सिलसिले में जो बातें रखी हैं, उन्हें ध्यान में रखना होगा. क्या कर्ज माफी की मांग बार-बार हो रही है? बिल्कुल नही.

2009 में हुई राष्ट्रीय स्तर की कर्ज माफी की पृष्ठभूमि सूखा था. इस तरह की प्राकृतिक विपदा को छोड़ दें, तो किसान संगठनों ने कभी भी कर्ज माफी की मांग नहीं की है. इस बार जो मांगें उठ रही हैं, उसकी पृष्ठभूमि नोटबंदी की है. नोटबंदी की वजह से किसानों का जो नुकसान हुआ है, उसका सीधा संबंध नोटबंदी से है. ऐसा डॉ. सेन ने कहा है.

सच कहें तो असंगठित क्षेत्र पर नोटबंदी का बहुत बुरा असर हुआ, यह जानने के लिए किसी का अर्थशास्री होना जरूरी नहीं है. नकद लेनदेन की व्यवस्था में जब 86 प्रतिशत रकम अचानक निकाल ली जाती है, और आपूर्ति महीनों तक नहीं हो पाती, तब यह तो तय है कि इसके बड़े ही विपरीत परिणाम सामने आएंगे.

इस असंगठित क्षेत्र का सबसे बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र का है. तो ऐसे में जिस केंद्र सरकार ने नोटबंदी की, उसी सरकार को कर्ज माफी का खर्च भी उठाना चाहिए. पर यह खर्च अब राज्यों के माथे मढ़ा जा रहा है. करे कौन और भरे कौन?

आज 8 महीनों बाद प्रधानमंत्री इस विषय में भी कुछ बोल नहीं रहे हैं. आखिर क्या हासिल हुआ इस निर्णय से? किस तरीके से यह निर्णय लिया गया? इन सवालों की जवाबदेही क्या प्रधानमंत्री की नहीं बनती? कितना कालाधन नष्ट हुआ, इसका जवाब कब तक यही दिया जाता रहेगा कि ‘रिजर्व बैंक नोट गिन रहा है’?

जितनी राजकीय पूंजी मोदीजी के पास है, पिछली कई सरकारों के पास नहीं थी. ऐसी स्थिति में अगर वे अपनी गलती मान भी लें तो जनता उसे स्वीकार कर लेगी. पर उतनी न्यूनतम ईमानदारी दूर की बात है.

इस निर्णय से किसी का कुछ खास नुकसान नहीं हुआ, सरकार इसी तर्ज पर चल रही है. ऐसे में नुकसान झेल रहे किसानों के प्रति संवेदना प्रकट करने का तो सवाल ही नहीं आता.

शायद इस तरह की न्यूनतम उम्मीद रखना ही गलत होगा. सभी चुनावों में मिल रहे बहुमत के शोर में चाहे नोटबंदी की जवाबदेही हो या फिर समर्थन मूल्य पर कृषि मंत्री का झूठ हो, इनसे कुछ उम्मीद रखना बेमानी लगता है.

(मिलिंद मुरुगकर अर्थशास्त्र और राजनीति पर लिखते हैं.)