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कश्मीर से ग्राउंड रिपोर्ट: क्यों घाटी में पुलिसवाला होना सबसे मुश्किल काम है

कश्मीरी पुलिसकर्मी अपने पेशे के चलते आतंकियों और स्थानीय लोगों की एक बड़ी आबादी के लिए घृणा का पात्र बन जाते हैं वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रीय स्तर पर भी उनकी फिक्र करता कोई नहीं दिखता.

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(इलस्ट्रेशन: एलिज़ा बख़्त/द वायर)

‘अपनी पिछली छुट्टी में मैं घर गया था. मेरी साली शादी के बाद पहली बार हमारे घर आई थी. रात को खाना खाने बैठे तो किसी ने घर के बाहर के दरवाज़े पर ज़ोर का पत्थर मारा. अब हम पूरी रात घर की लाइट बंद करके अंधेरे कमरे में पड़े रहे. हमें यह डर था कि शायद आतंकवादियों ने हमला कर दिया. साली और पत्नी ने किसी तरह खाना खाया लेकिन रात भर कोई सो नहीं पाया. सुबह होते ही मैंने घर छोड़ दिया और वापस ड्यूटी पर लौट आया. जब से पुलिस की नौकरी जॉइन की है तब से शायद ही किसी रिश्तेदार के शादी-ब्याह या दूसरे फंक्शन में शामिल हुआ हूं. ऐसे किसी कार्यक्रम में जाने का मतलब है आतंकवादियों का आसान टारगेट बनना.’

ये बातें हमें जम्मू कश्मीर पुलिस में कॉन्स्टेबल यूनुस ने बताई.

जम्मू कश्मीर में एक पुलिसवाले की मुश्किलों की चर्चा करते हुए यूनुस आगे कहते हैं, ‘हमारी स्थिति बहुत अजीब है. जब ड्यूटी पर होते हैं तो घर को लेकर डर लगा रहता है और जब घर जाते हैं तो वहां भी चैन से नहीं सो पाते हैं. कश्मीर में आतंकियों ने पुलिस यूनिफॉर्म के ख़िलाफ़ मोर्चा छेड़ रखा है. जब हम घर जाते हैं तो उनके लिए सबसे आसान टारगेट होते हैं.’

कुछ ऐसा ही कहना जम्मू कश्मीर पुलिस में हेड कॉन्स्टेबल निसार का है. उनके परिवार में मां, पत्नी और एक बेटा हैं जो उनके साथ नहीं रहते हैं. बहुत कम उम्र में ही पुलिस की नौकरी जॉइन करने वाले निसार घर में कमाने वाले इकलौते हैं.

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वे कहते हैं, ‘पूरे देश में जब कोई पुलिस की नौकरी जॉइन करता है तो उसको सम्मान मिलता है. जब वह कोई अच्छा काम करता है तो शान से अड़ोस-पड़ोस में बताता है लेकिन कश्मीर में पुलिस की नौकरी में जोख़िम बहुत ज़्यादा मिलता है. मेरी पोस्टिंग कहां होती है. मैं पुलिस में क्या काम करता हूं. किसी को नहीं बता पाता हूं. सबसे झूठ बोलना पड़ता है. आपको नहीं पता कौन आतंकियों के लिए मुखबिरी कर दे.’

फिलहाल जम्मू कश्मीर में जिस तरह आतंकवादी और उनके समर्थक राज्य पुलिस को निशाना बना रहे हैं, वह चिंता का विषय है. बीते कई महीनों से जम्मू कश्मीर पुलिस के जवान आतंकियों के आसान के निशाने पर हैं.

Srinagar: A security personnel guards near Lal Chowk during a strike called given by Hurriyat leaders on the 71st Independence Day, in Srinagar on Tuesday. PTI Photo (PTI8_15_2017_000102B)

श्रीनगर के लाल चौक पर तैनात एक जवान. (फोटो: पीटीआई)

23 जून को श्रीनगर के नौहट्टा इलाके में स्थित जामिया मस्जिद के बाहर सुरक्षा में तैनात जम्मू कश्मीर सीआईडी के डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित की उग्र भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी.

इस घटना पर जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा, ‘जम्मू कश्मीर पुलिस पूरे मुल्क के सबसे अच्छे पुलिस बलों में से एक है. हम संयम बरत रहे हैं क्योंकि हमारा सामना हमारे ही लोगों से है लेकिन कब तक ऐसा चलेगा. अभी कुछ समय पहले एसएचओ, फिर पांच पुलिस वाले अब ये डीएसपी… ये तो अपने काम से नहीं गया था, वे वहां थे ताकि लोगों की ज़िंदगियां बचा सकें. वह अपना काम करने… अपना फर्ज़ निभाने के लिए वहां गए थे.’

हालांकि यह हमला बहुत वीभत्स था. हिंदुस्तान टाइम्स ने कश्मीर के वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से बताया कि डीएसपी की हत्या का वीडियो बहुत ही वीभत्स था. इसके सार्वजनिक होने के बाद के परिणामों के डर के चलते सरकार ने इसे खरीदकर नष्ट कर दिया है.

इस वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, ‘डीएसपी को नग्न कर दिया गया था और हिंसक तरीके के साथ उनके साथ मारपीट की गई थी. उनके हाथ और पैरों को मोड़ दिया और इस तरह से तोड़ दिया गया था, जैसे गन्ना तोड़ा जाता है.’

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उन्होंने आगे बताया कि इसके स्रोत और वीडियो को नष्ट करने के लिए सरकार ने वित्तीय उपाय किए. इस वीडियो को एक नागरिक ने शूट किया था जो घाटी में कई एजेंसियों के लिए सूचना देने (इनफॉर्मर) का काम करता है.

हालांकि कश्मीर पुलिस पर यह अकेला हमला नहीं है. हाल की घटनाओं को देखें तो इससे पहले 16 जून को लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने अनंतनाग ज़िले के अचबल इलाके में घात लगाकर पुलिस दल पर हमला किया जिसमें छह पुलिसकर्मी शहीद हो गए. पंद्रह जून को कुलगाम के बोगुंद में और श्रीनगर के हैदरपुरा में हुए दो अलग-अलग हमलों में दो पुलिसवालों की हत्या कर दी गई थी.

इस साल ईद के वक़्त हालात इतने बिगड़ गए थे कि जम्मू कश्मीर पुलिस ने एडवायज़री जारी कर अपने कर्मचारियों से सार्वजनिक स्थलों पर ईद की नमाज़ अदा करने से बचने को कहा था. पुलिस कर्मचारियों को ज़िला पुलिस लाइन या सुरक्षित मस्जिदों में नमाज़ अदा करने का परामर्श दिया गया.

हाल ही में यह चुनौती और बढ़ गई जब सेना के जवानों पर पुलिसकर्मियों से हाथापाई का आरोप लगा. गौरतलब है कि पिछले महीने जम्मू कश्मीर के गांदेरबल ज़िले में एक जांच चौकी पर सेना के जवानों की कथित हाथापाई में सात पुलिसकर्मी घायल हो गए थे.

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(फोटो: पीटीआई)

कश्मीर में आतंकी आए दिन न सिर्फ पुलिसकर्मियों पर हमले कर रहे हैं, बल्कि उनके परिवार वालों को भी निशाना बना रहे हैं. एक आंकड़े के मुताबिक कश्मीर में इस साल अब तक आतंकियों के हमले में 28 पुलिसकर्मी मारे जा चुके हैं.

जम्मू कश्मीर पुलिस की कुल तादाद एक लाख 20 हज़ार है. ये जवान कठुआ से लेकर कारगिल के कोने तक अपने जीवन को दांव पर लगा रहे हैं. आंकड़ों के मुताबिक पिछले तीन दशकों में आतंकियों से लड़ते हुए 1600 पुलिस वाले मारे गए है. यह संख्या इस देश में किसी भी आॅर्गनाइजेशन द्वारा आतंकवाद विरोधी अभियानों में जान गंवाने वालों में सर्वाधिक है.

श्रीनगर में तैनात एक पुलिसकर्मी बताते हैं कि पिछले कुछ समय में कई पुलिसकर्मियों के घरों में चरमपंथी घुसे थे और उनके परिजनों को धमकाया था, जिसके बाद पुलिस ने परिजनों की सुरक्षा पर ध्यान देना शुरू किया है.

वहीं, एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, ‘कश्मीर में सेना या केंद्रीय बलों के जवान सिर्फ अपनी ड्यूटी पूरी करते हैं, उसके बाद वो अपने बैरकों में लौट जाते हैं. जबकि पुलिस के सामने 24 घंटे का काम होता है.’

वे आगे कहते हैं, ‘कश्मीर में पुलिसकर्मियों पर दबाव दोहरा है. जहां एक ओर पुलिसकर्मी केंद्रीय बलों के साथ मिलकर शांति व्यवस्था को बनाए रखने का काम करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनके अपने काम मसलन वीआईपी की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था बनाए रखना, अपराधियों की पकड़, यातायात सुचारु करना, अदालती कार्रवाई में हिस्सा लेना, खुफिया सूचनाओं को एकत्र करने जैसे तमाम काम होते हैं. यहां एक पुलिस वाला किसी भी दूसरे बल की तुलना में लगभग दोगुना काम करता है.’

वो कहते हैं, ‘भारतीय सेना, सीआरपीएफ और बीएसएफ के जवानों को घाटी की रक्षा करते हुए निश्चित समय ही बिताना होता है. उन्हें जब छुट्टी मिलती है तो वह सुकून से घर जाते हैं और छुट्टी बिताकर आते हैं. या फिर एक समय के बाद उनका यहां से तबादला हो जाता है तो वो यहां की उठापठक से दूर हो जाते हैं, जबकि पुलिसवाले जीवनभर चलने वाली लड़ाई में भाग ले रहे हैं. वो अपनी छुट्टी में सुकून से नहीं होते हैं और न ही रिटायरमेंट के बाद उन्हें आज़ादी मिलती है.’

कश्मीर में सरकार पुलिसकर्मियों की मांगों को लेकर कितनी संजीदा है इसका अंदाज़ा 16 जून को अनंतनाग ज़िले के अचबल में आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के हमले में शहीद हुए पुलिस अधिकारी फिरोज़ अहमद डार की बुलेटप्रूफ गाड़ी की मांग से ज़ाहिर हो जाता है.

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(फोटो: शोम बसु)

कश्मीर के जाबांज़ पुलिस अधिकारियों में शुमार फिरोज़ डार शहीद होने के कई महीने पहले से आतंकियों के राडार पर थे. वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक पिछले साल शेरबाग इलाके में एक प्रदर्शन के दौरान उन पर ग्रेनेड से हमला भी हुआ था. जिसके चलते डार ने कई बार बुलेटप्रूफ गाड़ी की मांग भी की थी, लेकिन उनकी मौत होने तक यह मुहैया नहीं कराई गई.

आतंकवादियों ने सिर्फ डार की हत्या नहीं की थी, बल्कि उनके शरीर को बुरी तरह से क्षत-विक्षत कर दिया था, ख़ासतौर पर उनके चेहरे को. उन पर बेहद नज़दीक से गोलियां दागी गई थीं. फिरोज़ के परिवार में उनकी पत्नी के अलावा दो बेटियां दो साल की सिमरन और पांच साल की अदा हैं.

घाटी में तैनात एक पुलिस अधिकारी का कहना है, ‘घाटी में भारतीय सेना, सीआरपीएफ और बीएसएफ के जवानों के साथ पुलिसकर्मियों की भी मौत होती है लेकिन इसे लेकर लोगों और सरकार का नज़रिया अलग-अलग है. कश्मीर में जब किसी पुलिसकर्मी की मौत होती है तो गृह मंत्रालय स्टेटमेंट जारी नहीं करता है. किसी को इस बात का फर्क नहीं पड़ता है.’

वे आगे कहते हैं, ‘घाटी में आतंक से लड़ रही सेना और केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों के प्रति देश भर में सहानुभूति रहती है. उनकी शहादत पर उनके राज्य के नेता और बड़े अधिकारी परिवार से मिलने पहुंचते हैं लेकिन राज्य पुलिस की शहादत पर हमारा ध्यान अक्सर नहीं जाता है.’

वे कहते हैं, ‘16 जून को मारे गए पुलिसकर्मियों को आख़िरी विदाई देने कोई राजनेता नहीं पहुंचा. डीएसपी अयूब की हत्या के बाद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कड़ा बयान ज़रूर आया. उन्होंने लोगों से कहा कि वह ऐसा कुछ न करें जिससे पुलिस का सब्र टूट जाए. मेरा बस इतना कहना है कि आज ज़रूरत यह है कि पूरा देश जम्मू कश्मीर पुलिस के साथ खड़ा हो और उसका मनोबल बढ़ाए.’

हालांकि इसके बावजूद जम्मू कश्मीर पुलिस को आलोचनाओं का सामना ही ज़्यादा करना पड़ता है. पिछले साल अप्रैल में राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) में हुए विवाद के दौरान सोशल मीडिया पर कश्मीर पुलिस को ट्रोल किया गया. उनकी देशभक्ति पर तमाम तरह के सवाल उठाए गए. मीडिया के एक धड़े ने भी पुलिस बलों के राष्ट्रवाद या निष्पक्षता पर सवाल खड़ा किया.

हालांकि उस दौरान कई पुलिस अधिकारियों ने इसका क़रारा जवाब भी दिया था. बारामुला के तत्कालीन पुलिस उपाधीक्षक फिरोज़ याह्या ने इस मामले में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एक धड़े को आड़े हाथों लेते हुए अपने फेसबुक पेज पर लिखा, ‘मेरे कई साथी मुझसे पूछ रहे हैं और कई अन्य निश्चित रूप से सोच रहे होंगे कि हम किसकी लड़ाई लड़ रहे हैं? मैं सभी से बस यही कह सकता हूं कि यह एक अन्य दौर है और यह भी गुज़र जाएगा. जम्मू कश्मीर पुलिस को (इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में) किसी से राष्ट्रवाद पर प्रमाण-पत्र लेने की ज़रूरत नहीं है. हमें कानून के दायरे में रहकर अच्छे काम जारी रखने की ज़रूरत है और हमें इससे कोई नहीं डिगा सकता.’

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(फोटो: शोम बसु)

वहीं, तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (अपराध) मुबस्सिर लतीफ़ी ने कहा था, ‘पुलिस बलों को राष्ट्रवाद या निष्पक्षता को लेकर उनसे कोई प्रमाण पत्र लेने की ज़रूरत नहीं है, जिनकी वीरता केवल की-पैड्स तक ही सीमित है. जम्मू कश्मीर पुलिस का बलिदान व वीरता को लेकर रिकॉर्ड रहा है. इसने राज्य को आतंकवाद जैसे पागलपन से बाहर निकाला है.’

हाल ही में 10 जून को आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का एक वीडियो सामने आया. जिसमें पुलिसवालों से अपील की गई थी कि वे भारतीय सेना का साथ न देकर कश्मीर को भारत से अलग करने की लड़ाई में शामिल हो जाएं.

जानकार बताते है कि आतंकी संगठन ऐसा आतंकवाद विरोधी अभियानों में पुलिस की अहम भूमिका निभाने के चलते करते हैं. जम्मू कश्मीर पुलिस का मज़बूत खुफिया तंत्र सेना और केंद्रीय सुरक्षों बलों की कार्रवाइयों में बेहद उपयोगी साबित होता है. कश्मीर में जितने भी मुठभेड़ हुए हैं उसमें से बड़ा हिस्सा पुलिस के खुफिया तंत्र के चलते संभव हो पाया है. आतंकी संगठनों को इसी बात की परेशानी है.

पुलिसकर्मियों को होने वाली मुश्किलों के सवाल पर अनंतनाग के एसएसपी अल्ताफ अहमद ख़ान कहते हैं, ‘सबसे बड़ी मुश्किल परिवार को लेकर होती है. लगातार तबादला होने से बच्चों की पढ़ाई-लिखाई में समस्याएं आती हैं. छुट्टियां कम होने के चलते परिवार को वक़्त नहीं दे पाते हैं. लगातार फंसे होने के चलते परिवार से मिले हुए ही काफी वक़्त बीत जाता है.’

गौरतलब है कि अल्ताफ कश्मीर के उन पुलिसकर्मियों में शामिल हैं जिन्हें आतंकी अपना निशाना बनाते रहे हैं. अल्ताफ अहमद ख़ान से छुटकारा पाने के लिए आतंकियों ने उनके सरकारी निवास पर रॉकेट लॉन्चर भी दागे थे, लेकिन वह बाल-बाल बच गए थे. अल्ताफ ने दक्षिण कश्मीर और जम्मू संभाग के डोडा में भी बतौर डीएसपी आतंकरोधी अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई है. हाल ही में वो यूएन मिशन की ड्यूटी से लौटे हैं.

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अनंतनाग के एसएसपी अल्ताफ अहमद ख़ान उन पुलिसकर्मियों में शामिल हैं जिन्हें आतंकी अपना निशाना बनाते रहे हैं. (फोटो: शोम बसु)

जम्मू कश्मीर में कार्यरत आईपीएस अधिकारी बसंत रथ कहते हैं कि जम्मू कश्मीर में शहीद होने वाले पुलिसकर्मी सम्मान के हकदार हैं. अपने एक लेख में कहते हैं, ‘सोपोर से लेकर शोपियां, तंगधार से लेकर त्राल, कुलगाम से कुंजेर तक जम्मू कश्मीर के महिला और पुरुष पुलिसकर्मी उग्रवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे हैं. इस दौरान वे अपनी शारीरिक तकलीफों और परिवारवालों व रिश्तेदारों के सामाजिक बहिष्कार की भी परवाह नहीं करते हैं. वे आतंकियों से मुठभेड़ के दौरान पीछे नहीं हटते हैं. वे शांति वाले इलाकों में पोस्टिंग नहीं मांगते हैं. वे अन्य संगठनों में प्रतिनियुक्ति की तलाश नहीं करते हैं. वे सरकारों के साथ सौदा करने के लिए बड़े पैमाने पर छुट्टियों पर जाने की धमकी नहीं देते. वे सेवानिवृत्ति के बाद बेहतर पेंशन के लिए पूछने के लिए जंतर मंतर पर इकट्ठा नहीं होते. यह उनका दैनिक जीवन है दिन-ब-दिन. रात-दर-रात. अपने घरों से दूर, अपने माता-पिता, पत्नियों और बच्चों से दूर.’

वे आगे लिखते हैं, ‘वे 1989 के गर्मियों से आतंकियों और उनकी गोली को अपनी छाती पर लेते रहे हैं. उन्होंने भारत के विचार को अपने कंधे पर उठाया हुआ है. कठुआ से लेकर कारगिल तक वे चुनौतियों का सामना करते हैं और राष्ट्र के लिए खड़े रहते हैं.’

कश्मीर में तैनात एक पुलिसकर्मी मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाते हैं. वे कहते हैं, ‘पुलिस में होने के कारण घाटी में रहने वाले लोगों का एक वर्ग है जो हमें पंसद नहीं करता है. दिनभर हम उनसे भिड़ते रहते हैं, रात में जब वो घर लौट जाते हैं तो हम भी घर लौटते हैं जो उन्हीं के मोहल्ले में होता है, लेकिन हमें उन्हीं लोगों के साथ रहना पड़ता है. वहां हमारी सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं होती है.’

वे आगे कहते हैं, ‘सोचिए कितना मुश्किल होता है, लेकिन मीडिया का एक वर्ग कभी हमें हीरो या रोल मॉडल नहीं बनाता है. वह आतंकियों के मारे जाने पर उनके जनाज़े पर जुटने वाली भीड़ या फिर उनके सोशल मीडिया प्रोफाइल से शेयर किए जाने वाले वीडियो पर ख़बरें बनाता है. मीडिया के इस गैरज़िम्मेदार वर्ग को यह समझ नहीं आता कि इससे हमारे मनोबल पर कितना फर्क पड़ता है.’

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(फोटो: शोम बसु)

एक अन्य पुलिसकर्मी पुलिस को मिलने वाले रिस्क अलाउंस (अशांत क्षेत्र में मिलने वाले भत्ते) पर सवाल उठाते हैं. उनका कहना है कि यहां केंद्रीय बल और पुलिसकर्मी एक तरह का काम करते हैं. दोनों पर रिस्क बराबर होता है, लेकिन जहां केंद्रीय बलों को 4500 रुपये प्रति माह रिस्क अलाउंस मिलता है, वहीं राज्य पुलिसकर्मियों को 75 से 100 रुपये प्रति माह रिस्क भत्ता मिलता है.

हालांकि इस जम्मू कश्मीर पुलिस प्रमुख एसपी वैद ने हाल ही में बयान दिया है कि पुलिस को मिलने वाले रिस्क अलाउंस में बढ़ोतरी का प्रस्ताव सरकार के पास लंबित है. मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के साथ अपनी पिछली मुलाकात में इस पर विस्तार से चर्चा की है. जल्द ही कश्मीर पुलिस को मिलने वाले रिस्क भत्ते में इज़ाफे की उम्मीद है.

वहीं एक अन्य पुलिसकर्मी ने आतंकी मुठभेड़ के दौरान मारे गए उन जवानों का मसला उठाया जिनके सर्विस हथियार आतंकी अपने साथ उठा ले गए थे. उनका कहना था कि ऐसे पुलिसकर्मियों की संख्या 60 से ज़्यादा है. उनके परिवारजनों को पेंशन से लेकर अन्य सुविधाएं इसलिए नहीं मिली है क्योंकि इस मसले की जांच चल रही है. ऐसे में पुलिसकर्मियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ता है.

(शोम बसु के सहयोग के साथ)