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डिजिटल साक्षरता का सच: ‘मैं डिजिटल साक्षर हूं लेकिन कंप्यूटर नहीं चला सकता’

प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान के तहत अगर कोई व्यक्ति अपना नाम लिखने लायक हो जाता है, तो उसे ‘साक्षर’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है. सरकार इस अभियान का इस्तेमाल अपने आंकड़ों को चमकाने के लिए कर रही है.

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जयपुर: ‘यह डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम, भारत में चलाए जाने वाले किसी भी अन्य साक्षरता कार्यक्रम के जैसा ही है. अगर इस कार्यक्रम में दाखिला लेने वाला कोई व्यक्ति अपना नाम लिखने के लायक हो जाता है, तो उसे ‘साक्षर’ की श्रेणी में डाल दिया जाता है. इन कार्यक्रमों का इस्तेमाल सरकार अपने आंकड़ों को चमकाने के लिए कर रही है.’

यह कहना है राजस्थान स्टेट इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी सर्टिफिकेट (आरएस-सीआईटी) धारक हेमराज का. राजस्थान में सरकारी नौकरी पाने के लिए आईटी साक्षरता का यह कोर्स अनिवार्य है.

दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों में से एक प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान (पीएमजी-दिशा) का लक्ष्य 2019 तक ग्रामीण भारत में छह करोड़ घरों को ‘डिजिटल तौर पर साक्षर’ बनाना है.

इसका बजट 2,351 करोड़ रुपये रखा गया है. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए इस योजना के तहत 2.5 लाख ग्राम पंचायतों को अपने क्षेत्रों से 200-300 उम्मीदवारों को इस कार्यक्रम से जोड़ना है.

कॉमन सर्विस सेंटर का ई-गवर्नेंस सर्विसेज इंडिया लिमिटेड, भारत सरकार के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय द्वारा कंपनीज़ एक्ट, 1956 के तहत मान्यता प्राप्त एक स्पेशल पर्पज व्हीकल यानी विशेष मकसद से गठित उपक्रम है.

इस योजना के क्रियान्वयन की देख-रेख करने की ज़िम्मेदारी इस पर ही है. सेवाएं प्रदान करने के लिए 2.5 लाख ग्राम पंचायतों में कम से कम एक कॉमन सर्विसेज सेंटर (सीएससी) की बात कही गई है.

पीएमजी-दिशा ट्रेनिंग विभिन्न एजेंसियों द्वारा पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के मॉडल पर दी जाती है. इन एजेंसियों को ट्रेनिंग पार्टनर के तौर पर जाना जाता है.

हर ग्राम पंचायत में ये प्रशिक्षण केंद्र (ट्रेनिंग सेंटर) गांवों से करीब पांच किलोमीटर की दूरी पर हैं. कई जगहों पर पहले से ही चल रहे निजी प्रशिक्षण संस्थानों को इन प्रशिक्षण केंद्रों में बदल दिया गया है.

इन केंद्रों को हर रजिस्टर्ड उम्मीदवार के लिए 300 रुपये दिए जाते हैं, लेकिन सिर्फ तभी जब वे सर्टिफिकेशन के लिए एक घंटे के ऑनलाइन ऑब्जेक्टिव टेस्ट में सफल होते हैं.

हर सेंटर के पास कम से कम तीन कंप्यूटर होने चाहिए, जिनके वेबकैम, बायोमेट्रिक फिंगर प्रिंट स्कैनर या आइरिश स्कैनर, इंटरनेट कनेक्शन और बिजली बैकअप से सुसज्जित होने की उम्मीद की जाती है.

प्रशिक्षण का खाका

इस कार्यक्रम के तहत टैबलेट, स्मार्ट फोन और कंप्यूटर आदि उपकरणों को चलाने, इंटरनेट ब्राउज करने, ई-मेल का इस्तेमाल करने, नागरिकों से जुड़ी ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल करने और डिजिटल भुगतान करने की ट्रेनिंग देना शामिल है.

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राजस्थान के कलवर गांव प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान के तहत बनाया गया प्रशिक्षण केंद्र. (फोटो: श्रुति जैन)

ट्रेनिंग की विधि का फैसला करने का अधिकार प्रशिक्षक (ट्रेनर) को दिया गया है. ऐसा कोई तरीका नहीं है, जिससे इस बात की जांच की जा सके कि उम्मीदवार को 20 घंटे की ट्रेनिंग समुचित तरीके से दी गई है या नहीं.

इस योजना के एक ट्रेनिंग पार्टनर एक्सेल टेक्नोवेशन प्राइवेट लिमिटेड के सुनील ने द वायर को बातचीत में बताया, ‘हम विषय से जुड़े वीडियो साझा करते हैं और सॉफ्टवेयर से संबंधित कोई समस्या आने पर प्रशिक्षकों को तकनीकी सहायता देते हैं.’

जयपुर के निवारू गांव में चलने वाले एक सेंटर के ट्रेनर मोहन लाल यादव ने बताया, ‘पीएमजी-दिशा के तहत चलाई जाने वाली कक्षाओं के लिए कोई तय समय नहीं है. उम्मीदवार सामान्य तौर पर सिर्फ ऑनलाइन टेस्ट देने के लिए आते हैं. इसके तहत रजिस्टर्ड उम्मीदवार आमतौर पर 15-35 आयुवर्ग के होते हैं. हमारा सेंटर आरएस-सीआइटी कोर्स भी कराता है. इसलिए हम इस कोर्स के विद्यार्थियों को साथ में ही पीएमजी-दिशा के लिए भी आवेदन करवा देते हैं.’

हर केंद्र में सिर्फ तीन कंप्यूटर हैं. जिसके कारण हर विद्यार्थी को अलग-अलग व्यक्तिगत तौर पर ट्रेनिंग देने में कठिनाई होती है. इसलिए ट्रेनर एक साथ कई विद्यार्थियों को एक ही स्क्रीन पर पढ़ाते हैं.

एमएल शर्मा, जो सांगानेर के एक सेंटर में बतौर ट्रेनर काम कर रहे हैं, ने बताया, ‘इस कोर्स के तहत हर विद्यार्थी को दस दिनों तक दो घंटे की ट्रेनिंग देने की बात कही गई है. मेरे साथ पीएमजी-दिशा के तहत करीब 63 विद्यार्थी रजिस्टर्ड हैं.’

उन्होंने आगे कहा, ‘करीब 200 विद्यार्थी आरएस-सीआईटी, टैली और डेस्कटॉप पब्लिशिंग (डीटीपी) के लिए हमारे संस्थान में आते हैं. दूसरे कोर्सों के लिए फीस 3,000 से 4,000 रुपये के करीब है, लेकिन पीएमजी-दिशा के लिए हमें प्रति उम्मीदवार सिर्फ 300 रुपये का भुगतान ही किया जाता है. ज़ाहिर है, हमारे लिए यह कोर्स घाटे का सौदा है.’

प्रशिक्षण की उपलब्धि

हालांकि, इस कोर्स के तहत व्यापक डिजिटल ट्रेनिंग देने की बात कही गई है, लेकिन छात्रों के शिक्षण उपलब्धि (लर्निंग आउटकम) के आकलन के लिए सिर्फ पांच डिजिटल लेन-देन और ई-मेल सत्यापन (वेरिफिकेशन) (@pmgdisha.in) को ही पर्याप्त माना गया है.

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नेशनल डिजिटल लिटरेसी मिशन के तहत डिजिटल साक्षरता का प्रमाण पत्र लिए राजस्थान के कलवर गांव के शुभम और उनकी बहन. (फोटो: श्रुति जैन)

शर्मा ने यह भी बताया, ‘विद्यार्थी के आउटकम फॉर्म को पूरा करने के लिए पांच डिजिटल लेन-देन अनिवार्य है, जिसके बाद उसे प्रमाण पत्र दिया जा सकता है. एक-एक रुपये का यह लेन-देन ट्रेनिंग सेंटर के खाते से कॉमन सर्विस सेंटर के बीच, सूची में दिए गए किसी एक तरीके (यूएसएसडी, एईपीएस, भिम/यूपीआई, ई-वॉलेट, नेफ्ट आदि) से किया जा सकता है. यह लेन-देन वास्तव में किसके द्वारा किया गया है, इसका पता नहीं लगाया जा सकता है. सामान्य तौर पर ये काम ट्रेनर ख़ुद ही कर देते हैं.’

औपचारिकताओं का बोझ

ट्रेनर के कंधे पर रोजाना के दो घंटे की ट्रेनिंग के अलावा और भी कई ज़िम्मेदारियां लादी गई हैं. इसमें हर उम्मीदवार का आधार और बैंक ब्यौरा भरना, पंचायत के दस्तावेज़ के लिए सरपंच से अनुमति लेना, ई-मेल पते को सत्यापित करना, डिजिटल लॉकर बनाना, और आउटकम फॉर्म भरना शामिल है.

अगर ट्रेनिंग सेंटर सीएससी है, तो भुगतान सीधे उनके बैंक अकाउंट में कर दिया जाता है, लेकिन अगर ट्रेनिंग सेंटर ट्रेनिंग पार्टनर के तहत काम कर रहा है, तो भुगतान पार्टनर को भेजा जाता है, जो बाद में ट्रेनिंग सेंटरों को उनका पैसा देता है.

एक ट्रेनर ने नाम न बताए जाने की शर्त पर द वायर को बताया कि ‘औपचारिकताओं की संख्या इतनी ज़्यादा है कि हमारा सारा समय उन्हें पूरा करने में ही चला जाता है और विद्यार्थियों को प्रशिक्षण देने का समय ही नहीं मिलता.’

उन्होंने आगे कहा, ‘ट्रेनिंग पार्टनर द्वारा अपना कमीशन काट लेने के बाद हमारे हाथ में 300 रुपये में से मात्र 225 रुपये ही आते हैं. सरपंच भी अपना हिस्सा मांगता है, जिसे देने के बाद हमारे हाथ में बहुत कम बचता है. कोई भी इतने कम पैसे के लिए इतनी मुसीबत क्यों मोल लेगा? कई ट्रेनर पीएमजी-दिशा कोर्स के लिए उम्मीदवारों से 100-100 रुपये ले लेते हैं, जबकि यह मुफ्त है.’

एक ऐसा इम्तिहान जिसमें कोई फेल नहीं होता

इस कार्यक्रम में यह व्यवस्था की गई ‘ट्रेनिंग एजेंसियों को सीएससी-एसपीवी द्वारा ट्रेनिंग का पैसा उम्मीदवारों के निर्धारित दक्षता कसौटियों पर खरा उतरने के बाद सफल सर्टिफिकेशन के बाद ही दिया जाएगा.’

इस कोर्स में अधिकतम 250 उम्मीदवारों को दाखिला दिया जा सकता है. एक बार 250 छात्रों को दाखिला दे देने के बाद (जिसकी निगरानी पोर्टल पर की जाती है), नामांकन बंद हो जाता है. अगर इन 250 विद्यार्थियों में से कोई फेल हो जाए (जो आज तक कभी नहीं हुआ है), तो उसकी जगह किसी अन्य को दाखिला देने का प्रावधान नहीं है.

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सांगानेर के प्रधानमंत्री ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान के तहत बनाए गए एक प्रशिक्षण केंद्र में रजिस्टर्ड छात्रों की सूची. (फोटो: श्रुति जैन)

ऑनलाइन टेस्ट में 25 सवाल पूछे जाते हैं, जिनमें से अगर 7 का सही उत्तर दे दिया जाए, तो उम्मीदवार परीक्षा पास कर जाता है. प्रशिक्षकों की मानें, तो इन 25 में से 20 सवाल सामान्य तौर पर हर बार दोहराए जाते हैं.

निवारू ग्रामीण केंद्र में बतौर ट्रेनर सेवा दे रहे सैनी ने बताया, ‘अगर कोई छात्र 7 सवालों का सही जवाब देने में कामयाब रहता है, तो वह पास कर जाता है. अगर वे टेस्ट में पास नहीं होते हैं, तो हमें ट्रेनिंग का पैसा नहीं मिलता है.’

द वायर से बात करते हुए राजस्थान में पीएमजी-दिशा के प्रतिनिधि मधुकर शर्मा ने कहा, ‘डिजिटल सर्टिफिकेशन के लिए ऑनलाइन टेस्ट शुरू करने के लिए छात्र के बायोमेट्रिक फिंगर प्रिंट का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे किसी परीक्षार्थी के बदले किसी अन्य के बैठने की गुंजाइश नहीं बचती. साथ ही, उम्मीदवार के अकाउंट से पांच डिजिटल लेन-देन (जो रिफंडेबल है) ज़रूरी है. सेंटर के अकाउंट से लेन-देन मान्य नहीं है. अपने अकाउंट से लेन-देन करने वाले सेंटरों का बिल नहीं बनाया जाता.’

नेशनल डिजिटल लिटरेसी मिशन से तुलना

इससे पहले, देशभर में आंगनबाड़ी और आशा कार्यकर्ताओं और अधिकृत राशन डीलरों समेत 52.2 लाख लोगों को आईटी ट्रेनिंग देने के लिए दो चरणों में नेशनल डिजिटल लिटरेसी मिशन (एनडीएलएम) चलाया गया था. इस परियोजना को अब बंद किया जा चुका है.

सांगानेर में एक ई-मित्र केंद्र के मालिक पंकज अग्रवाल ने बताया, ‘एनडीएलएम की निगरानी ठीक ढंग से नहीं किए जाने की वजह से लोगों ने इसका दुरुपयोग किया. एनडीएलएम के तहत नामांकन की कोई सीमा निर्धारित नहीं की गई थी और ट्रेनिंग लागत ज़्यादा थी.’

पंकज कहते हैं, ‘एससी-एसटी उम्मीदवारों को 500 रुपये देने होते थे, जबकि ओबीसी श्रेणी के उम्मीदवारों को 300 रुपये देने होते थे. इसमें देखा गया कि ट्रेनर उम्मीदवारों से उनका आधार कार्ड लेकर उनकी जगह टेस्ट दे दिया करते थे और इस तरह उन्होंने ख़ूब पैसा कमाया. अब पीएमजी-दिशा में मॉनीटरिंग बढ़ा दी गई. अब गांव के हर उम्मीदवार के लिए उम्मीदवारों को फोन कॉल उसके रजिस्ट्रेशन को सत्यापित किया जाता है.’

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कलवर गांव के सीताराम डिजिटल साक्षर होने का सर्टिफिकेट दिखाते हुए. (फोटो: श्रुति जैन)

एनडीएलएम को सफलतापूर्वक पूरा करने वालों को इस डिजिटल साक्षरता सर्टिफिकेट की कोई उपयोगिता नज़र नहीं आती. कलवर गांव के 25 वर्षीय सीताराम ने बताया, ‘मैंने इस कार्यक्रम में इस उम्मीद में नाम लिखाया था कि यह सर्टिफिकेट मुझे नौकरी दिलाएगा, लेकिन अब मुझे लगता है कि यह मेरी मूर्खता थी. कागज़ के इस टुकड़े के मुताबिक मैं ‘डिजिटल तौर पर साक्षर’ हूं, लेकिन हकीकत ये है कि मैं न तो कंप्यूटर चला सकता हूं, न ही स्मार्टफोन ही चला सकता हूं. ट्रेनिंग सेंटर में मुझे कुछ चीजें सिखाई गईं, लेकिन मेरे घर में कंप्यूटर और इंटरनेट कनेक्शन न होने के कारण मैं कभी उनका अभ्यास नहीं कर पाया. इसलिए अब मैं सबकुछ भूल गया हूं. मैं कभी किसी डिजिटल साक्षरता परीक्षा में भी नहीं बैठा.’

कलवर गांव में ही एक और डिजिटल साक्षरता सर्टिफिकेट धारक 17 वर्षीय शुभम ने इस कार्यक्रम की हकीकत बताते हुए कहा, ‘गांव के सेंटर के ट्रेनर ने मुफ्त सर्टिफिकेशन कोर्स के लिए हमसे हमारा आधार कार्ड जमा करवा लिया. कुछ दिनों के बाद हमें सर्टिफिकेट के लिए 100 रुपये मांगे. हमें किसी भी चीज के लिए कहीं नहीं जाना पड़ा.’

वैसे इस सर्टिफिकेट को लेकर उम्मीद लगाने वाले लोग भी हैं. सांगानेर के 40 वर्षीय बाबू लाल, जो डिजिटल तौर पर साक्षर हैं, को यकीन है कि ‘अगर मोदी ये सर्टिफिकेट दे रहे हैं, तो आने वाले समय में वे नौकरी के लिए इस सर्टिफिकेट को जरूर अनिवार्य बना देंगे.’

हालांकि, अधिकारियों को भरोसा है कि पीएमजी-दिशा अपने मौजूदा स्वरूप में ज़्यादा जवाबदेही सुनिश्चित करेगा और इससे धोखाधड़ी में कमी आएगी, लेकिन यह साफ नहीं है इसका लाभ उठाने वाले किस स्तर के डिजिटल साक्षर हो पाएंगे और इससे जीवन में कुछ करने की उनकी संभावना कैसे बढ़ेगी.

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