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उत्तराखंड: पहाड़ों में आपदाएं सियासी मुद्दा क्यों नहीं बनती हैं…

पहाड़ों में जनता की दुख-तकलीफ़ों को दूर करने के सियासी एजेंडा में पर्यावरण और विकास के सवाल हमेशा से ही विरोधाभासी रहे हैं क्योंकि राजनीतिक दलों को लगता है कि पर्यावरण बचाने की बातें करेंगे तो विकास के लिए तरसते लोग वोट नहीं देंगे.

फरवरी 2021 में हुए ग्लेशियर हादसे में पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुई धौलीगंगा पनबिजली परियोजना. (फोटो: पीटीआई)

उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव सिर पर हैं. दो दशक पूर्व राज्य बनने के बाद अब चार महीने बाद यहां के मतदाता पांचवीं बार नई सरकार के लिए वोट डालेंगे. लेकिन जब भी राजनीतिक पार्टियां चुनाव में वोट मांगने जाती हैं तब न तो कोई पर्यावरण की बात करता है और न ही पहाड़ों में हर साल होने वाली आपदाओं से बचाव के लिए कोई चिंता उनकी बातों, भाषणों या घोषणा पत्र में झलकती है.

दूसरी ओर मौसमी बदलाव, भयावह आपदाएं और पर्वतीय जनजीवन पर प्रकृति के रौद्र रूप का सबसे ज़्यादा दुष्प्रभाव साल दर साल तीव्र हो रहा है.

वास्तव में पहाड़ों में जनता की दुख-तकलीफों को दूर करने के सियासी एजेंडा में पर्यावरण और विकास के सवाल हमेशा से ही विरोधाभासी रहे हैं. इसलिए कि राजनीतिक दलों को लगता है कि पर्यावरण बचाने की बातें करेंगे तो विकास के लिए तरसते लोग वोट नहीं देंगे.

जाने-माने पर्यावरणविद व मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं, ‘पर्यावरण संरक्षण की बातों को उत्तराखंड की सियासी पार्टियां और उनके नेतागण विकास विरोधी अवधारणा मानकर चलते हैं. जबकि हमें पर्यावरण संरक्षण की चिंता इसलिए होनी चाहिए कि इसी पर हमारी भावी पीढ़ी का भविष्य टिका है. यदि पर्यावरण का संरक्षण नहीं होगा और ऐसी नीतियां अपनाई जाती रहेंगी जिनसे विकास नहीं बल्कि विनाश को न्योता मिलेगा तो ज़ाहिर सी बात है कि हम अपने समाज ही नहीं समूची मानवता को एक अंधेरी गली में धकेल रहे हैं.’

वस्तुतः हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन होने की घटनाएं कोई नई बात नहीं हैं लेकिन हाल के वर्षों में बादल फटने, भूस्खलन और अचानक भारी वर्षा के कारण पर्वतीय क्षेत्रों में भारी तबाही हुई है.

हाल मे लौटते मानसून की भारी वर्षा के इस बुरे हश्र से कुमायूं मंडल में सबसे ज़्यादा तबाही हुई है करीब 70 से ज्यादा लोग जान से हाथ धो बैठे हैं. अकेले नैनीताल में बाढ़ व भूस्खलन ने तीन दर्जन से ज़्यादा लोगों का जीवन लील लिया.

उत्तराखंड के पहाड़ों में ये आपदाएं घूम-फिरकर जून 2013 की यादों को हर वक्त ताज़ा कर देती हैं जब केदारनाथ में तकरीबन 5,000 से ज़्यादा लोग कुछ ही मिनटों में भारी बाढ़ की चपेट आने से मौत के मुंह में चले गए.

इसी तरह 2021 फरवरी के शुरू में नंदा देवी ग्लेशियर के टूटने से धौली गंगा नदी में आई भारी बाढ़ ने जो तबाही मचाई उसकी विभीषिका से कुछ ही किमी दूर निर्माणाधीन तपोवन-रैणी पावर प्रोजेक्ट में 150 से ज़्यादा श्रमिक और इंजीनियर मौत के मुंह में समा गए.

ज्ञात रहे कि यह पूरा क्षेत्र भूकंप व भूकंपीय लिहाज़ से भी काफी संवेदनशील है. 1991 में उत्तरकाशी में आए भयावह भूकंप से 786 लोगों की मौत हो गई थी. उसके कुछ ही साल बाद 1998 में कैलाश मानसरोवर यात्रा मार्ग में मालपा में एक बड़े भूस्खलन ने जो तबाही मचाई, उसमें बड़ी तादाद में स्थानीय लोग तो मरे ही, मानसरोवर यात्रा पर जा रहे तीर्थयात्री और सैलानी भी अपनी जान से हाथ धो बैठे थे.

मालपा हादसे से उत्तराखंड का यह पर्वतीय क्षेत्र अभी उबर ही न पाया था कि 1999 में चमोली में एक भारी भूकंप (रिक्टर पैमाने पर 6.8) ने 106 स्थानीय लोगों की जान ले ली. इस भूकंप नेना केवल मुख्य सड़कों में दरारें पैदा कर दीं बल्कि बड़े पैमाने पर लोगों के घरों, होटलों और पुलों को भी क्षतिग्रस्त किया.

इन हादसों से पर्वतीय जनजीवन पर तात्कालिक और दूरगामी दोनों ही तरह का दुष्प्रभाव पड़ता है. ज़ाहिर यह है कि पर्वतीय क्षेत्र पहले से ही मानवीय पलायन का बड़ा संकट झेल रहा है.

पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट कहते हैं कि पहाड़ों में जन सुविधाओं की किल्लत के अलावा आपदाओं के डर के मारे भी बड़ी तादाद में लोगों ने पलायन किया है.

उनके मुताबिक़, इसके असर से पहाड़ के मैदानी क्षेत्रों में आबादी का दबाव बहुत बढ़ गया है. ज़ाहिर है कि कोटद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, नैनीताल, हल्द्वानी और उधमसिंह नगर के कई शहरों-कस्बों के लोगों ने नदी-नालों के किनारे मकान बसा दिए. पहाड़ों से आने वाले सैलाब को जब आगे बहाने का रास्ता नहीं मिलता तो बाढ़ की प्रलयकारी तेज़ धाराएं रास्ते में आने वाली हर चीज़ को बहाकर ले जाती हैं.

पर्वतीय जिलों में अक्तूबर 2021 को हुई ताज़ा वर्षा और जनधन की इतनी हानि के कारणों को जानने के लिए अभी वैज्ञानिक आधार तलाशने में वक्त लगेगा लेकिन सरकार की विकास नीति को लेकर कई तरह के प्रश्न हमेशा खड़े रहते हैं.

ऊपरी हिमालयी क्षेत्रों में बड़े बांधों व जल विद्युत परियोजनाओं को प्राकृतिक आपदाओं का सबसे बड़ा कारण माना जाता है. पर्यावरणविद इन संवेदनशील पहाड़ों के सीने को चीर कर रन-फॉर-फीवर पैटर्न पर बांध परियोजनाओं के प्रति सरकारों को अरसे से आगाह करते आ रहे हैं.

हेमवतीनंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय में भौतिक विज्ञान विज्ञान विभाग के प्रोफेसर आलोक सागर गौतम कहते हैं, ‘पर्वतीय इलाकों मे 4-5 साल साल से बेमौसम की भारी वर्षा से वैज्ञानिक हैरान हैं. अब जरूरत इस बात की है कि पहाड़ों मे खेती के लिए मानसून की प्रतीक्षा जून मे नही बल्कि सितंबर-अक्टूबर तक करने का नया ट्रेंड विकसित करना होगा. चीन सीमा से सटे कुमायूं अंचल मे इस बार गढ़वाल के मुकाबले विदा होते मानसून की भारी वर्षा के घटनाक्रम पर गंभीर शोध व विमर्श हो ताकि मौसम के नए बदलावों का सामना हो सके.’

विडंबना यह भी है कि प्रकृति के इस रौद्र रूप और हादसों की आशंकाओं के बीच फंसे जीवित रहने की विवशताओं ने लोगों को अपनी भावी पीढ़ी के भविष्य के प्रति गहरी चिंताओं में डुबो दिया है. मुश्किल यह भी है कि सुदूर क्षेत्र सामरिक दृष्टि और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी बेहद संवेदनशील हैं.

सबसे बड़ी चिंता यह है कि हिमालय के तात्कालिक और दीर्घकालिक संरक्षण के लिए राष्ट्रीय व उत्तराखंड में राज्य स्तर पर सरकारों की ओर से कोई गंभीर चिंताएं नहीं दिखतीं.

हिमालय का यह पर्वतीय अंचल भूकंप, भूस्खलन, बादल फटने, साथ ही ऊंची चट्टानों के गिरने, नदी-नालों के प्रलयंकारी कटाव, ग्लेशियरों के पिघलने और लुप्त होने के साथ ही गर्मियों में यहां के जंगलों में भीषण आगजनी एक स्थानीय समस्या विकराल रूप ले रही है.

सबसे बड़ी चिंता इन आपदाओं के कारण प्रकृति की होने वाली क्षति के साथ ही बेशकीमती जानें जा रही हैं. विशेषज्ञ बादल फटने की घटनाओं से होने वाले हादसों में एकाएक बढ़ोतरी से खासे चिंतित दिखते हैं.

दरअसल, सत्ता में बने रहने के लिए वोट की राजनीति का सबसे अहम रोल हो गया है. पैसा, हैसियत और बाहुबल के बूते सत्ता तक पहुंचने की जद्दोजहद में पर्यावरण संरक्षण और हिमालय को आपदाओं से बचाने जैसी गंभीर बहस में न तो राजनीतिक लोग और सरकारें पड़ना चाहती हैं और न ही नौकरशाही का इस तरह के मामलों से कोई सरोकार दिखता है.

आपदाओं और प्राकृतिक हादसों की इस जद्दोजहद में साधन संपन्न और मैदानी क्षेत्रों में ज़मीन और मकान खरीदने और बनाने की हैसियत वाले लोग ही खुद को सुरक्षित करने की जुगत में सफल हो रहे हैं. इसके उलट साधनहीन, बेबस, बेरोज़गार लोग सुदूर गांवों में जीवन बसर करने को अभिशप्त हैं.

बहरहाल इन प्राकृतिक आपदाओं पर 2-4 दिन तक बहस और खबरें कुछ टीवी चैनलों और अखबारों के पन्नों तक सीमित रहती हैं. और उसके बाद वक्त बीतते ही इन सारी विभीषिकाओं को हमेशा के लिए भुला दिया जाता है.

अगली बार खबरों और बहस के लिए नई तरह की आपदाओं और हादसों के इंतज़ार में ही यहां के सुदूर क्षेत्रों के लोगों के दिन कट जाते हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)