भारत

केंद्रीय सूचना आयोग के पास 32,000 से अधिक आरटीआई अनुरोध लंबित: सरकार

केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने संसद में बताया कि 2021-22 में छह दिसंबर 2021 की स्थिति के अनुसार 32,147 आरटीआई अनुरोध लंबित थे. इससे पहले सतर्क नागरिक संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में बताया गया था कि केंद्रीय सूचना आयोग में अपील/शिकायत के निपटारे के लिए औसतन एक साल 11 महीने का समय लग रहा है.

(​फोटो साभार: विकिपीडिया)

नई दिल्ली: सरकार ने गुरुवार को कहा कि केंद्रीय सूचना आयोग के पास 32,000 से अधिक आरटीआई (सूचना का अधिकार) अनुरोध लंबित हैं.

प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक सवाल के लिखित जवाब में राज्यसभा को यह जानकारी दी. उन्होंने कहा कि 2019-20 और 2020-21 के दौरान क्रमशः 35,178 और 38,116 आरटीआई अनुरोध लंबित थे.

सिंह ने कहा कि 2021-22 में छह दिसंबर 2021 की स्थिति के अनुसार 32,147 आरटीआई अनुरोध लंबित थे.

उन्होंने कहा कि सरकार ने लोक सूचना अधिकारियों और प्रथम अपीलीय प्राधिकारियों के लिए प्रशिक्षण के माध्यम से क्षमता विकसित करने और दिशानिर्देश जारी करने जैसे कई कदम उठाए हैं ताकि उन्हें सूचना प्रदान करने व प्रथम अपील का प्रभावी ढंग से निपटान करने के लिए सक्षम बनाया जा सके ताकि सूचना आयोग में अपीलों की संख्या कम हो.

सिंह ने कहा कि सरकार ने सार्वजनिक प्राधिकरणों को अधिकतम सूचनाओं को प्रकट करने पर जोर देते हुए स्पष्टीकरण आदेश जारी किए हैं ताकि लोगों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास मौजूद सूचना प्राप्त करने के लिए आरटीआई आवेदन दायर करने का सहारा नहीं लेना पड़े.

उन्होंने कहा कि कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग आरटीआई अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के माध्यम से सरकार में पारदर्शिता और जवाबदेही में सुधार संबंधी वार्षिक कार्यक्रम लागू कर रहा है जिसमें राज्य प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान और राज्य सूचना आयोग को नुक्कड़ नाटक, स्थानीय लोक मंडली के उपयोग, स्थानीय भाषाओं में प्रचार सामग्री के विकास, दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रम, क्षेत्रीय भाषाओं में ऑनलाइन प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम सहित विभिन्न गतिविधियां शुरू करके आरटीआई पर जागरूकता उत्पन्न करने के लिए वित्तीय सहायता दी गई है.

देश के सूचना आयोगों की क्या है स्थिति

सूचना का अधिकार कानून के तहत सूचना आयोग सूचना पाने संबंधी मामलों के लिए सबसे बड़ा और आखिरी संस्थान है, हालांकि, सूचना आयोग के फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है.

सबसे पहले आवेदक सरकारी विभाग के लोक सूचना अधिकारी के पास आवेदन करता है. अगर 30 दिनों में वहां से जवाब नहीं मिलता है तो आवेदक प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास अपना आवेदन भेजता है.

अगर यहां से भी 45 दिनों के भीतर जवाब नहीं मिलता है तो आवेदक केंद्रीय सूचना आयोग या राज्य सूचना के आयोग की शरण लेता है. लेकिन देश भर के सूचना आयोग की हालात बेहद खराब है.

आलम ये है कि अगर आज की तारीख में सूचना आयोग में अपील डाली जाती है तो कई सालों बाद सुनवाई का नंबर आता है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इन आयोगों में कई सारे पद खाली पड़े हैं.

उल्लेखनीय है कि सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम 12 अक्टूबर, 2005 को लागू हुआ था. इस साल इसके कार्यान्वयन के 16 साल पूरे हो गए. इस कानून ने लाखों लोगों को सूचना प्राप्त करने और सरकार को जवाबदेह ठहराने का अधिकार दिया है.

आरटीआई कानून के तहत 30 दिनों के अंदर आवश्यक रूप से सूचना देनी होती है और ऐसा नहीं करने पर जन सूचना अधिकारी पर प्रतिदिन 250 रुपये का जुर्माना और अधिकतम 25 हजार रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है.

कानून के मुताबिक, जनसूचना अधिकारी के वेतन से यह जुर्माना वसूला जाता है. आरटीआई कानून के तहत सूचना आयोग अंतिम अपीलीय प्राधिकरण होते हैं. सूचना आयोग केंद्रीय स्तर (केंद्रीय सूचना आयोग- सीआईसी) और राज्यों (राज्य सूचना आयोग) में स्थापित किए गए हैं.

आरटीआई कानून की 16वीं वर्षगांठ की पूर्व संध्या पर ‘सतर्क नागरिक संगठन’ द्वारा जारी एक रिपोर्ट में इस कानून और उसके अमल को लेकर कई आंकड़े पेश किए गए थे.

संगठन ने देश भर के सभी 29 आयोगों के प्रदर्शन पर आरटीआई एक्ट के तहत प्राप्त जानकारी के आधार पर ये रिपोर्ट तैयार की है. रिपोर्ट के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

1. देश में तीन सूचना आयोग पूरी तरह से निष्क्रिय हैं, क्योंकि सूचना आयुक्त के पद खाली होने के बावजूद यहां किसी भी नए आयुक्त की नियुक्ति नहीं हुई है. इस समय झारखंड, त्रिपुरा और मेघालय के आयोग पूरी तरह से निष्क्रिय पड़े हुए हैं.

2. अन्य तीन सूचना आयोग (नगालैंड, मणिपुर और तेलंगाना) वर्तमान में बिना मुख्या सूचना आयुक्त के काम कर रहे हैं.

3. 25 सूचना आयोगों द्वारा एक अगस्त, 2020 और 30 जून, 2021 के बीच 1,56,309 अपीलें और शिकायतें दर्ज की गईं. इसी अवधि के दौरान 27 आयोगों द्वारा 1,35,979 मामलों का निपटारा किया गया.

4. 26 सूचना आयोगों में 30 जून, 2021 तक लंबित अपीलों और शिकायतों की संख्या 2,55,602 थी. आयोगों में अपीलों/शिकायतों का बैकलॉग लगातार बढ़ता जा रहा है. साल 2019 के आकलन में पाया गया था कि 31 मार्च, 2019 तक 26 सूचना आयोगों में कुल 2,18,347 अपीलें/शिकायतें लंबित थीं.

5. आकलन से पता चलता है कि ओडिशा सूचना आयोग को प्रति मामले को निपटाने में सबसे ज्यादा औसतन छह साल आठ महीने का समय लग रहा है. यानी कि यदि आज इस आयोग में कोई शिकायत या अपील दायर करता है तो उसका निपटारा साल 2028 में हो सकेगा.

6. इसी तरह प्रति मामले को निपटाने में गोवा के आयोग में पांच साल 11 महीने, केरल में चार साल 10 महीने और पश्चिम बंगाल में चार साल सात महीने का समय लग रहा है.

7. केंद्रीय सूचना आयोग में अपील/शिकायत के निपटारे के लिए औसतन एक साल 11 महीने का समय लग रहा है. वहीं महाराष्ट्र के आयोग में मामले के निपटारे में तीन साल छह महीने का समय लगता है.

8. आकलन से पता चलता है कि 13 आयोगों को नए मामले को निपटाने में 1 साल या उससे अधिक का समय लग रहा है.

आरटीआई आवेदकों के उत्पीड़न और हत्या के मामले बढ़े

इससे पहले आरटीआई एक्ट के कार्यान्वयन की स्थिति पर आई एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में आरटीआई आवेदकों के उत्पीड़न और हत्या के मामले बढ़ रहे हैं और आने वाले वर्षों में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे बड़ी चुनौती है.

आरटीआई दिवस (12 अक्टूबर) की पूर्व संध्या पर ‘ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया’ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया था कि पिछले 15-16 वर्षों में कम से कम 95-100 आरटीआई आवेदकों की हत्या हुई है, जबकि 190 अन्य पर हमला किया गया.

रिपोर्ट में कहा गया है कि कई ने आत्महत्या की और उनमें से सैकड़ों ने शक्तिशाली लोगों द्वारा उन्हें परेशान किए जाने की सूचना दी.

गैर-सरकारी संगठन ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल इंडिया (टीआईआई) द्वारा ‘स्टेट ट्रांसपेरेंसी रिपोर्ट 2021’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में कहा गया है कि इतनी भयावह स्थिति होने के बावजूद सरकार देश के हित में अपनी जान गंवाने वाले आरटीआई कार्यकर्ताओं और सूचना चाहने वालों पर कोई डाटा नहीं रखती है.

इसमें कहा गया है, ‘आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती सूचना चाहने वालों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है, क्योंकि देशभर में आरटीआई आवेदकों के उत्पीड़न और हत्या के मामले बढ़ रहे हैं.’

आरटीआई कानून के क्रियान्वयन पर उठते सवाल

आरटीआई क़ानून की 16वीं वर्षगांठ के मौक़े पर एक कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस मदन बी. लोकुर ने सरकार द्वारा सुनियोजित तरीके से आरटीआई कानून को कमजोर करने की कोशिशों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की थी.

उनका कहना था कि एक लोकतांत्रिक गणराज्य के कामकाज के लिए सूचना महत्वपूर्ण है. इसका उद्देश्य सुशासन, पारदर्शिता व जवाबदेही को स्थापित करना है.

पीएम केयर्स फंड का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि इस पर आरटीआई एक्ट लागू न होने के चलते नागरिकों को पता ही नहीं है कि इसका पैसा कहां जा रहा है.

जस्टिस लोकुर ने कहा था, ‘इसे लेकर कोई जानकारी सार्वजनिक क्यों नही हैं कि इस फंड में प्राप्त हुए करोड़ों रुपये को कहां खर्च किया जा रहा है? यदि आप पीएम-केयर्स की वेबसाइट जाएंगे, तो वहां 28.03.2020 से 31.03.2020 के बीच प्राप्त हुए अनुदान का ऑडिट रिपोर्ट मिलेगा. इसमें कहा गया है कि चार दिन में 3000 करोड़ रुपये प्राप्त हुए थे. यदि आप इसका औसत निकालें, तो पता चलेगा कि हर दिन सैकड़ों-हजारों करोड़ रुपये इस फंड में प्राप्त हुए हैं. ये पैसा कहां जा रहा है? हमें नहीं पता चल रहा है.’

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के अनुसार)