भारत

यह समाज और इसका वातावरण बच्चों के अनुकूल नहीं है

यह ‘अच्छे स्पर्श’ और ‘बुरे स्पर्श’ की सरलीकृत बायनरी से आगे बढ़ने का वक़्त है. बच्चों के लिए न विशेष अदालतें हैं, न काउंसलिंग के इंतज़ाम हैं, न ही सुरक्षित वातावरण जिसमें वह पल-बढ़ सकें.

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फोटो: रॉयटर्स

एक एतिहासिक फैसले में तमिलनाडु के मदुरई जिले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शंनमुगसुंदरम ने स्कूल के प्रधानाचार्य अरोक्यासामी को 91 बच्चों एवं बच्चियों के साथ यौन अत्याचार के मामले में दोषसिद्ध घोषित करते हुए उसे 50 साल से अधिक की सजा दी.

खबरों के मुताबिक जज ने उसे भारतीय दंड विधान, अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम और तमिलनाडु महिला उत्पीड़न विरोधी अधिनियम जैसे कानूनों के तहत दोषी पाया.

पब्लिक प्रासिक्यूटर पी परीमालादेवी के मुताबिक यह ‘देश में पहली घटना है’ जब अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के लिए बने स्पेशल कोर्ट ने किसी अपराधी को पचास साल की सजा दी और जुर्माना लगाया.

गौरतलब है कि मदुरई जिले के पोथुम्बु के सरकारी हाईस्कूल के अपने कार्यकाल में अरोक्यासामी ने 91 छात्रों को (जिनमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे) को हवस का शिकार बनाया था और इस मामले का खुलासा तभी हुआ जब पंजू नामक व्यक्ति की बेटी (जो अब इस दुनिया में नहीं है) ने उसके साथ हो रही ज्यादती का विरोध किया और अरोक्यासामी के अपराधों का भंडा फूट गया.

स्कूलों के अंदर यौन अत्याचार की बढ़ती घटनाओं के खुलासे की पृष्ठभूमि में यह ऐतिहासिक फैसला सुकून दे सकता है, अलबत्ता इस खबर पर जिन दिनों आप सभी की निगाह पड़ रही होगी, तभी पानीपत का मिलेनियम स्कूल (जिसकी देश में तमाम शाखाएं हैं तथा जहां सालभर की छात्रों की फीस डेढ दो लाख है) में छात्रा के साथ हुई यौन अत्याचार की घटना, जयपुर के अस्पताल में फिलवक्त कोमा में पड़ी छात्रा (जिसके साथ दो अध्यापकों ने कई माह तक अत्याचार किया था) गुड़गांव के प्रद्युम्न आदि तमाम खबरें आप की निगाह से गुजरी होंगी.

मुमकिन है कि गुड़गांव की 12 साल की अनामिका (बदला हुआ नाम) की खबर भी आपने देखी हो जो सात साल तक अपने ही पिता के हाथों यौन अत्याचार का शिकार होती रही. अपने साथ हो रही इस ज्यादती का एहसास उसे तब हुआ जब उसे ‘अच्छा स्पर्श’, बुरा स्पर्श’ आदि के बारे में स्कूल में बताया गया.

या आदिवासी बच्चों के लिए बने आवासीय विद्यालयों में छात्राओं-छात्रों के साथ होने वाली ऐसी घटनाएं (जो आम तौर अख़बारों में स्थान तक नहीं हासिल कर पातीं) आप ने कहीं सोशल मीडिया पर देखी हो.

दरअसल स्कूल हो या अपने घर का आंगन कहीं भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं और यही बार-बार देखने में आता है कि अधिकतर बच्चे उन्हीं लोगों द्वारा यौन अत्याचार का शिकार होते हैं जिन्हें वे जानते हैं या जो उनके ‘आत्मीय’ कहलाते हैं.

याद करे कि कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए की सरकार के दिनों में- जब रेणुका चैधरी भारत सरकार का समाज एवं बाल कल्याण मंत्रालय संभाल रही थीं तब मंत्रालय के तहत संपन्न अध्ययन ‘स्टडी आन चाइल्ड एब्यूज इंडिया 2007’ ने ही इस बात का खुलासा किया था कि 53 प्रतिशत बच्चे यौन हिंसा के शिकार होते हैं, और उनके पीड़कों में अधिकतर मामलों में उनके करीबी कहलाने वाले लोग ही शामिल होते हैं.

ऐसे लोग जिन पर बच्चे ही नहीं उनके माता-पिता भरोसा करते हैं. महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अध्ययन में उजागर यह तथ्य भी रेखांकित हुआ था कि जहां 53 फीसदी बच्चे जीवन में कभी न कभी अत्याचार का शिकार होते हैं, वहीं महज छह फीसदी बच्चे इसके बारे में शिकायत करते हैं.

अर्थात अधिकतर मामले दबे ही रह जाते हैं. यह भी सोचने का मसला है कि अत्याचारी इस कदर बेखौफ होकर इसे कैसे अंजाम देता है.

दरअसल वह जानता होता है कि बच्चा इसके बारे में बोलेगा नहीं, और अगर बोलेगा तो उस पर कोई यकीन नहीं करेगा और अगर यकीन भी किया तो समुदाय के अन्य सदस्य विभिन्न कारणों से- फिर चाहे ‘परिवार की इज्जत’ का सवाल हो या ‘बच्चे के भविष्य’ की चिंताएं हों या अत्याचारी की आर्थिक-सामाजिक शक्ति का डर हो- उसे उठाएंगे नहीं और मान लें कि कोई कदम उठाया भी गया तो भी अदालती प्रक्रियाओं में इतनी खामियां हैं कि उसे लाभ मिल जाएगा.

कहा जा सकता है कि इस मसले पर पनपे आक्रोश का ही नतीजा था कि बाल यौन अत्याचार के मामलों को भारतीय दंड विधान के तहत देखने को लेकर सवाल उठे थे, जो वह वयस्क एवं बच्चों में फर्क नहीं करता था और न ही बच्चों के खिलाफ संभव सभी किस्म के यौन अत्याचार इसमें शामिल नहीं थे और ऐसे मामलों से निपटने के लिए, एक विशेष कानून बनाने की बात हुई थी और मई 2012 में ही राज्यसभा एवं लोकसभा ने प्रोटेक्शन आफ चिल्ड्रेन फ्राॅम सेक्युअल आफेन्सेस एक्ट, 2012 पारित कर दिया था जिसका मकसद बताया गया था कि यौन अत्याचार एवं शोषण से बच्चों की रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान मजबूत किए जाएं.

यह विडंबना ही है कि इतनी बड़ी मानवीय त्रासदी (जब पचास फीसदी बच्चे जीवन में कभी न कभी यौन हिंसा का शिकार होते हैं, जिसमें महज लड़कियां नहीं, लड़के भी शिकार होते हैं) का एहसास आज भी बहुत कम है.

लड़कों के साथ अतिरिक्त दिक्कत यह होती है कि पुरुषत्व की जो धारणा बालपन से ही उनके मन में भर दी जाती है, उसमें कई बार वह चुप ही रह जाते हैं.

कुछ समय पहले ‘ह्यूमन राइटस वाच’ ने 82 पेज की एक रिपोर्ट ‘ब्रेकिंग द साइलेंस: चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज इन इंडिया’ जारी की थी, और उसने फिर एक बार 2007 के अध्ययन के निष्कर्षों को ही गोया रेखांकित किया था.

रिपोर्ट ने इस विस्फोटक तथ्य को उजागर किया था कि किस तरह भारत में बाल यौन अत्याचार घरों, स्कूलों एवं बच्चों की देखरेख के लिए बनी आवासीय सुविधाओं में आम है.

किस तरह सरकार की मौजूदा नीतियां/प्रतिक्रिया (बच्चों को यौन अत्याचार से बचाने और पीड़ितों का इलाज करने में) बुरी तरह नाकाफी हैं.

किस तरह तमाम बच्चों को पीड़ादायी मेडिकल परीक्षणों और पुलिस तथा अन्य अधिकारियों की तरफ से दूसरी बार दुर्व्यवहार का शिकार बनाया जाता है, जो बच्चों की बात पर यकीन नहीं करना चाहते.

रिपोर्ट की खासियत यह कही जा सकती है कि उसे तैयार करने के लिए परिमाणात्मक विश्लेषण के बजाय केस स्टडी का सहारा लिया गया ताकि बाल यौन अत्याचार मामले में सरकारी प्रणालियों की पड़ताल की जा सके.

रिपोर्ट का साफ निष्कर्ष था कि समस्या को संबोधित करने की सरकारी कोशिशें (जिसमें नए कानून की बात भी शामिल है) असफल होंगी, जब तक हम बचाव करने वाली प्रणालियों को विकसित नहीं करेंगे और न्याय प्रणाली को सुधारेंगे नहीं ताकि अत्याचार की हर घटना की रिपोर्ट मिले और अत्याचारियों को दंड सुनिश्चित किया जा सके.

रिपोर्ट में कुछ केस स्टडीज उदाहरण रूप में ही प्रस्तुत किए गए थे. उदाहरण के लिए 16 साल की नेहा के साथ गांव के दो लोगों ने अत्याचार किया और जब वह थाने पहुंची तो पुलिसवालों ने उसकी रिपोर्ट लिखने से साफ मना कर दिया, तो वहीं 12 वर्षीय कृष्णा की शिकायत लिखने में मना करते हुए पुलिस ने उसे 12 दिन की गैरकानूनी हिरासत में रखा.

ध्यान रहे बच्चों के खुले आकाश में विचरण करने के लिए ऐसी तरह-तरह की बंदिशें महज सुदूर इलाकों में ही मौजूद नहीं है. ऐसी बेरुखी चैतरफा उपर से नीचे तक व्याप्त है.

जैसे पिछले साल जहां एक तरफ बाल अत्याचारों के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए पोस्टरों के इस्तेमाल की बात हो रही थी, वहीं दूसरी तरफ यह सच्चाई भी सामने आ रही थी कि खुद राजधानी में प्रोटेक्शन आफ चिल्डेन फ्राॅम सेक्सुअल आफेन्सेस एक्ट के तहत गठित विशेष अदालत को समाप्त किए जाने को लेकर समाजसेवियों को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा था और अदालत को पूछना पड़ा था कि प्रशासन स्पष्ट करे कि आखिर उसने प्रोटेक्शन आफ चिल्डेन फ्राॅम सेक्सुअल आफेन्सेस एक्ट के तहत गठित विशेष अदालत को क्यों समाप्त किया.

इतना ही नहीं सूचना अधिकार के तहत मांगी गयी जानकारी में इस बात का भी खुलासा हुआ था कि ऐसी गठित विशेष अदालतों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन/नशीली दवाओं/सौंदर्यप्रसाधन अधिनियम आदि के तहत आने वाले मामलों का भी बोझ डाला गया था.

आज जब मीडिया में बाल अत्याचार की घटनाएं सुर्खियों में है फिर एक बार यह सवाल लाजिम हो उठता है कि आखिर ऐसी घटनाओं के दोहराव को रोकने के लिए क्या किया जाए?

एक सुझाव यह आ सकता है कि सेक्स एजुकेशन को स्कूली पाठयक्रम में शामिल किया जाए, जिसके बारे में मौजूदा सरकार की राय बिल्कुल अलग दिखती है.

याद करे कि वर्ष 2014 में तत्कालीन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्द्धन ने स्कूलों में ऐसी किसी शिक्षा पर पाबंदी लगायी.

इतना ही नहीं वर्ष 2016 में नई शिक्षा नीति के लिए सिफारिशें तय कर रहे पैनल को यह निर्देश दिया कि वह सरकारी दस्तावेज से ‘सेक्स’ और ‘सेक्सुअल’ शब्द हटा दें क्योंकि वह लोगों को ‘आहत’ कर सकती है.

स्पष्ट है कि भारत में अभी भी सरकार द्वारा सूत्रबद्ध यौनशिक्षा का स्कूलों में अभाव है.

उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार इस मामले में विकसित देशों के अनुभवों पर गौर करेगी और इस मसले को ‘नैतिक प्रहरी’ के तौर पर नहीं देखेगी और पुनर्विचार करेगी.

दूसरा, सुझाव यह भी आ सकता है कि कम से कम बच्चों को ‘अच्छा स्पर्श’, ‘बुरा स्पर्श’ आदि के बारे में गंभीरता से शिक्षा दी जाए ताकि वह उनके साथ हो सकने वाली प्रताडना से बच सकें.

ऐसे प्रचार पोस्टर जिनके जरिए बच्चों को यह समझाने की कोशिश की गई थी कि वह अपने आप को अनुचित व्यवहार से कैसे बचायें और खतरे की स्थिति में किससे संपर्क करें.

‘स्वयं को सुरक्षित रखने के चतुर उपाय’, ‘तुम्हें हर समय सुरक्षित रहने का अधिकार है’, आदि शीर्षकों से बने यह पोस्टर सरल भाषा में बच्चों को सचेत करते दिख रहे थे.

निश्चित तौर पर यह योजना बाल अधिकारों के लिए कार्यरत विशेषज्ञों की सलाहों के अनुरूप ही थी जिसमें उनकी तरफ से यह बात रखी जाती रही है कि किस तरह बच्चों को ‘अच्छे स्पर्श’ और ‘बुरे स्पर्श’ के बारे में बताना जरूरी है.

एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने तो इस मसले पर पहले से प्रचार सामग्री भी तैयार की है, जो अभिभावकों, शिक्षकों को स्पर्श से उपजती चुनौतियों से वाकिफ कराती हैं.

इस संदर्भ में यह सवाल समीचीन हो उठता है कि क्या ऐसे सुझावों की बहुत उपयोगिता है?

इसमें दो तरह की दिक्कतें हैं-एक व्यावहारिक दिक्कत, कई बच्चे-अनामिका की तरह ऐसी उम्र में अत्याचार का शिकार होते हैं, जिन्हें आप कैसे शिक्षित कर सकते हैं.

दूसरा, इस पर अत्यधिक जोर कहीं पीड़ित को ही उसके अत्याचार के लिए जिम्मेदार मानने तक पहुंच जाता है. सोचने का मसला यह है कि स्पर्श के नियम सिखाने तक इस मामले कोे न्यूनीकृत/रिड्यूस करके दरअसल कहीं न कहीं हम आत्मीय कहे गए संबंधों में भी जो सत्ता सम्बन्ध व्याप्त होते हैं, उसकी गंभीरता और व्यापकता की अनदेखी तो नहीं कर रहे हैं.

कुछ न होने से कुछ होता रहे यह बात अपने आप में अच्छी है, ऐसी बात अक्सर कही जाती है. उसी तर्ज पर कहें तो स्पर्श के अच्छे-बुरे होने की बात बच्चे जान जाएं, वह ठीक ही है.

मगर यह सोचने की आवश्यकता है कि ऐसे कदम जिनका दर्शनीय मूल्य ज्यादा होता है, वह शेष समाज की उस विराट असफलता पर परदा डाल देते हैं, जो बच्चों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के सुविचार और जमीनी यथार्थ के गहरे अंतराल को सामने लाता है.

न विशेष अदालतें मौजूद हैं, न बच्चों केे काउंसलिंग के इंतजाम मौजूद हैं और न ही एक सुरक्षित वातावरण जिसमें वह पल बढ़ सकें.

सबसे बढ़कर बड़े बच्चे या बच्चियां- जिन्हें इस बात का बोध भी रहता है, लेकिन परिवार या समाज के अन्दर सत्ता सम्बन्ध ऐसे बने होते हैं कि वह बोल नहीं पाते.

मदुरई के पोथुम्बु के सरकारी स्कूल का प्रधानाचार्य जब 91 बच्चे-बच्चियों को समय-समय पर अपनी हवस का शिकार बना रहा था, तब क्या वह बात उसके सहयोगियों या अन्य लोगों को पता नहीं होगी, मगर वह विभिन्न कारणों से खामोश रहे होंगे.

ऐसे लोग जो ‘पोस्को’ कानून के तहत दोष के भागी माने जाते हैं. सवाल है कि जब आधे से अधिक बच्चे अत्याचार अपने ‘आत्मीयों’ के हाथों झेल रहे हों तो कौन चुप्पी तोड़ेगा और कौन जोखिम उठाएगा?

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और चिंतक हैं)