राजनीति

तुलसीदास का ‘निषाद’ अब राजनीति के अखाडे़ में ताल ठोक रहा है

तुलसीदास का निषाद प्रभु राम से विवाद बढ़ाने से डरता था जबकि 2017 में निषादों ने राजनीति के अखाडे़ में ताल ठोंक दी है. इस बार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में निषाद एक बड़ी ताक़त के रूप में उभरे हैं.

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चुनावी रैली के दौरान निषाद पार्टी के नेता और समर्थक. (फोटो साभार: फेसबुक)

आज उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चौथे चरण में मतदान हो रहे हैं. इस चरण में गंगा और यमुना के किनारे बसे इलाहाबाद में भी मतदान हो रहा है. उत्तर प्रदेश के चुनाव में नदियां एक प्रमुख उत्प्रेरक की भूमिका अदा करती हैं.

इलाहाबाद में ऐसा ही है. इलाहाबाद में गंगा प्रदूषित हैं. इसे स्वच्छ और निर्मल रखने के लिए नागरिकों के साथ साधु-महात्मा और श्रद्धालु भी सरकार से निवेदन करते रहे हैं. पर्यावरणविदों की स्थायी चिंता में गंगा का प्रदूषण तो शामिल है ही.

भारतीय जनता पार्टी अपनी बृहत्तर राजनीतिक-सांस्कृतिक कार्यनीति में गंगा को सबसे ऊपर रखती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी इलाहाबाद आते हैं तो ‘मां गंगा’ की सार्वजनिक वंदना करना नहीं भूलते हैं.

उनकी सरकार ने नमामि गंगे परियोजना चलायी है जिसमें गंगा नदी के किनारे बसे कुछ निषाद नौजवानों को रोजगार मिला है, लेकिन इन निषादों का इतने भर से काम नहीं चलने वाला है. वे पिछले दो दशक से नदियों पर अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं.

इलाहाबाद में यमुना नदी के किनारे उच्च कोटि का बालू निकलता है जिससे पुल, सड़कें, हवाई-अड्डे और भवन बनते हैं. नदियों से बालू निकालने का कार्य इसके किनारे बसे लोग तब से करते आ रहे हैं जब से भवन निर्माण में बालू-सीमेंट का प्रयोग शुरू हुआ. बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बालू निकालने का काम फायदेमंद साबित हुआ. इस पेशे पर दबंग समूह काबिज़ होने लगे.

इसी बीच यूपी माइनर एंड मिनरल कंसेशंस रूल, 1963 के नियम 9(2) के द्वारा बालू निकालने के लिए वरीयता अधिकार ‘प्रिफरेंशियल राइट’ उन जातियों को दिया गया जो बालू निकालने के काम में सदियों से संलग्न रही हैं जैसे मल्लाह, केवट, बिंद, निषाद, मांझी, बाथम, धीवर, तीमर, चाईं, सिरहिया, तुरहा, रैकवार, कैवर्त, खुल्वत, तियर, गौडिया, गोड़िया और काश्यप.

इस प्रकार राज्य ने भी जाति और पेशे के संबंध को एक निश्चित सीमा के साथ मान्यता दी है. 1963 के नियम 9(2) के साथ यह भी उल्लेखनीय है कि जिस व्यक्ति को बालू निकालने की अनुमति दी जानी होती है. उसकी वित्तीय स्थिति को देखा जाता है कि वह इस कार्य को करने के लिए आवश्यक सुविधाएं जुटा पाएगा कि नहीं. यही वह बिंदु है जहां माफिया के लोग इस पेशे में उतर जाते हैं.

ठेका किसी निषाद के नाम होता है, पैसा किसी माफिया का लगता है और जिस व्यक्ति के नाम का ठेका आवंटित होता है, वह दिहाड़ी मजदूर के रूप में बालू निकाल रहा होता है. इसके कारण पूरे उत्तर प्रदेश में बालू के खनन पर दबंग माफियाओं का कब्जा होता चला गया है.

यहां पर मैं माफिया शब्द का इस्तेमाल जान-बूझकर कर रहा हूं. अपने एक अध्ययन में जेफ्री विट्सो दिखाते हैं कि बिहार में सोन नदी में निकाली जाने वाली बालू पर किस प्रकार कुछ चुनिंदा माफिया समूह कब्ज़ा जमाकर उसे राज्य की चुनावी राजनीति से जोड़ने में कामयाब रहे हैं. उत्तर प्रदेश में भी यही हो रहा है.

12 जुलाई 2006 के अपने एक निर्णय में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने माफिया के बालू खनन पर कब्ज़े को लेकर चिंता जाहिर की थी. इस मामले में बालू के खनन से जुड़े पट्टे पर बेनामी रूप से कुछ दबंगों ने अपने नाम के ठेके आवंटित करा रखे थे. इस प्रकार दबंग समूह निषादों को उनके परंपरागत पेशे से उन्हें बाहर कर देते हैं.

जाति और पेशे के संबंध को पुनर्जीवित करने के लिए उन्हें न्यायपालिका की शरण में जाकर अपने ऐतिहासिक दावे प्रस्तुत करने होते हैं. इतिहास न्यायालय में पहुंच जाता है और नदी से जीविका चलाने वाले समुदायों के पक्ष में गवाही देता है.

इलाहाबाद जिले में यमुना नदी के किनारे बसे गांवों के अपने अध्ययन में मैंने पाया है कि बालू के खनन पर अधिकार जमाने के लिए क्षेत्र की दबंग जातियों और निषादों के बीच संघर्ष दशकों से चल रहा है. दबंग जातियों से जुड़े लोगों ने एक तरह से बालू के खनन पर पूरी तरह से कब्ज़ा जमाने का प्रयास किया है.

सरकार ने अपने विभिन्न नियमों-अधिनियमों के द्वारा बालू, मोरंग, बजरी या ऐसे ही अन्य लघु खनिजों (माइनर मिनरर्ल्स) को उत्खनित करने के लिए जो वरीयता अधिकार दिए हैं, जब वे हड़प लिए जाते हैं तो इसके विरूद्ध निषाद समुदाय और विभिन्न जन संगठन लामबंद भी होते हैं.

3 मार्च 2005 को ऑल इंडिया किसान मजदूर सभा- एआईकेएमएस के नेतृत्व में सैकड़ों निषादों ने कंजासा गांव में विरोध प्रदर्शन किया. उनका प्रदर्शन मशीनों से बालू निकालकर उन्हें लोडर्स में भरकर बाहर भेजने के खिलाफ था. निषाद परंपरागत औजारों से बालू निकालते हैं. उसे खाली नाव में भरा जाता है. इस पर एक सामान्य टैक्स देना होता था. इसे नवाई कहते हैं. इसमें यमुना के किनारे बसे निषादों की एक बड़ी जनसंख्या को रोजगार मिल जाता है.

मशीनें इस व्यवस्था को खत्म कर देती हैं. वे रोजगार को कुछ हाथों में सीमित कर देती हैं. निषाद इसके खिलाफ लामबंद हुए, प्रदर्शन किया और पुलिस के आने पर यह प्रदर्शन हिंसक हो उठा और दोनों पक्षों के लोग घायल हुए. पुलिस के वाहन भी फूंके गये. अब भी इसका मुकदमा माननीय उच्च न्यायालय में चल रहा है.

न्यायालय के बाहर नदी के बालू पर निषादों के हकदारी के आंदोलनों ने गति प्राप्त करने का प्रयास किया है. निषादों ने गांवों में लगातार जन सभाएं की हैं. उन्होंने 12 जनवरी 2016 को असरावल खुर्द में और जनवरी 2016 के अंतिम सप्ताह में कांटी गांव में जनसभा की. इसमें निषाद और आल इंडिया किसान मजदूर सभा ने हिस्सा लिया.

ऑल इंडिया किसान मजदूर सभा के समर्थन से इस बार इलाहाबाद की बारा विधानसभा में राजकुमार पथिक निर्दलीय उम्मीदवारी पेश कर रहे हैं. उनका चुनाव चिन्ह नाव है जो निषादों की अस्मिता से अंगबद्ध है. निषाद यमुना नदी में अवैध मशीनों व लोडरों के प्रयोग, अवैध रूप से सूखी बालू को उठाया जाना, मांझियों को रवन्ना देने की मांग, वनोत्पादों पर तथा गिट्टी व सिलिका सैंड के काम का मूल अधिकार गांव के गरीबों को देने की मांग कर रहे हैं.

निषादों की यह कहानी उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में अपना विस्तार कर रही है. अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल निषाद समुदाय की कई जातियां अभी हाल तक समाजवादी पार्टी की समर्थक मानी जाती रही हैं.

2016 में समाजवादी पार्टी ने निषाद समुदाय में शामिल आधा दर्जन से ज्यादा जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रयास किया था जिससे उसका अनुसूचित जातियों के बीच आधार बढ़े तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2016 में जब इलाहाबाद आए तो उन्होंने ‘निषादराज की भूमि’ का बार-बार उल्लेख किया.

उत्तर प्रदेश के इस विधानसभा चुनाव में निषाद एक महत्वपूर्ण अस्मिता के रूप में उभरे हैं. निषादों की एक बड़ी संख्या और राजनीतिक प्रभाव को देखते हुए डा. संजय कुमार निषाद ने पिछले कई वर्षां में निषाद पार्टी के बैनर के तले निषादों को गोलबंद किया है.

इस विधानसभा चुनाव में निषादों की प्रदेश की सत्ता में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने कृष्णा पटेल के नेतृत्व में अपना दल और पीस पार्टी के साथ गठबंधन भी किया है. 60 उम्मीदवारों के साथ निषाद पार्टी अपना ध्यान पूर्वी उत्तर प्रदेश में केंद्रित कर रही है. वह अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल जातियों तथा पीस पार्टी के मुस्लिम आधार को इस गठबंधन में समाहित कर राजनीति नई इबारत लिखना चाह रही है.

इसके लिए उसने बाहुबलियों को अपनी पार्टी में जगह देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई है. निषाद पार्टी ने बाहुबली धनंजय सिंह को टिकट दिया है जो एक समय बसपा में बहुत प्रभावशाली माने जाते रहे हैं. समाजवादी पार्टी से तीन बार विधायक रहे विजय मिश्रा भी निषाद पार्टी में शामिल होकर चुनाव लड़ रहे हैं.

2017 में निषाद पार्टी का चुनाव चिन्ह भोजन से भरी थाली है. सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी में गोस्वामी तुलसीदास ने कवितावली में निषादों के जीवन के बारे में लिखा था. तब निषाद के पास थाली नहीं थी. उसके बच्चों के लिए घर पर केवल सहरी मछली ही उपलब्ध थी जिन्हें ठीक से वेद की शिक्षा भी नहीं मिलने वाली थी. आज निषादों के पास ‘डाक्टर’ संजय कुमार हैं. तुलसीदास का निषाद प्रभु राम से विवाद बढ़ाने से डरता था जबकि 2017 में निषादों ने राजनीति के अखाडे़ में ताल ठोंक दी है.

(लेखक जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोधार्थी हैं)