भारत

ख़िलजी युद्ध जीतने के बाद पाता है कि उसे मुट्ठीभर राख के सिवा कुछ नहीं मिला

जायसी का ‘पद्मावत’ युद्ध की व्यर्थता को दिखाने वाली रचना है. यह प्रेम की पीड़ा को रेखांकित करने वाला काव्य है. क्या भंसाली की फिल्म में प्रेम की ये पीड़ा दिखेगी?

Padmawati-FacebookFinal

फोटो साभार: (फेसबुक/दीपिका पादुकोण)

अब जबकि संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ इस साल यानी 2017 के एक दिसंबर को रिलीज़ होने जा रही है तो इसे लेकर हल्की-सी ट्रोलिंग फिर से शुरू हो गई है.

भंसाली जिस तरह बड़े-बड़े विज्ञापन देकर इस फिल्म का प्रचार कर रहे हैं (और इसमें कुछ गलत नहीं है) तो उसकी प्रतिक्रिया होने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है.

जब वे जयपुर में इसकी शूटिंग कर रहे थे तब तो उनके और उनकी टीम के साथ करणी सेना के आक्रामक दुर्व्यवहार की ख़बरें आई थीं और इसी वजह से उनको जगह भी बदलनी पड़ी.

जैसे-जैसे भंसाली की फिल्म के रिलीज होने की तारीख़ करीब आ रही है कुछ ख़बरिया पोर्टलों पर इस तरह की ख़बरें भी आ रही हैं कि एक ख़ास जाति को लोगों को इंतज़ार है कि ये फिल्म कैसी होगी? संकेत किधर है ये समझा जा सकता है.

करणी सेना के लोग इस बात को समझने और मानने को तैयार नहीं थे कि ‘पद्मावती’ या ‘पद्मिनी’ एक कल्पित चरित्र है और इस चरित्र की पहली कल्पना अवधी और हिंदी के कवि मलिक मुहम्मद जायसी (जिनका जन्म हिंदी के आलोचक रामचंद्र शुक्ल ने 1492 में माना है) ने अपने काव्य-ग्रंथ ‘पद्मावत’ (1540) में की थी.

इस काव्यग्रंथ की पृष्ठभूमि में अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा चितौड़ पर चढ़ाई और विजय (1303) है. इस तरह देखें तो जायसी ने अलाउद्दीन ख़िलजी द्वारा चित्तौड़ पर चढ़ाई और विजय के 237 साल बाद अपने काव्यगंथ की रचना की थी.

जी हां, 237 साल बाद. ख़िलजी शासन के सबसे प्रामाणिक इतिहासकारों में से एक किशोरी लाल शरण ने भी माना है कि पद्मिनी एक काल्पनिक चरित्र है. फिर भी न करणी सेना और न कुछ दूसरे लोग इसे मानने को तैयार हैं.

उनके तर्क भी अजीब हैं. जैसे- चित्तौड़ में पद्मिनी महल है इसलिए पद्मिनी थीं, आदि-आदि. लेकिन ऐसे लोग ऐतिहासिक प्रमाण पेश नहीं करते कि सच में कोई पद्मिनी नाम की रानी थीं और उन्हें लेकर ही अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़ पर आक्रमण किया है. ख़िलजी ने आक्रमण ज़रूर किया था लेकिन उसकी वजह पद्मिनी नहीं थीं. ऐसा इतिहास कहता है.

फिर भी ‘पद्मिनी’ या ‘पद्मावती’ को लेकर बवाल क्यों हो रहा है? ये समझने की ज़रूरत है. कई बार ऐसा होता है कि साहित्यिक कृतियों में आए काल्पनिक चरित्र इतने प्रभावशाली हो जाते हैं कि ऐतिहासिक और वास्तविक चरित्रों से अधिक लोकमानस को प्रभाविक करते हैं.

इसका एक उदाहरण तो ब्रेम स्टोकर का उपन्यास ड्रैकुला (1897) है जिसने कई फिल्मों और विधाओं को जन्म दिया है. ड्रैकुला का मिथक यथार्थ से ज़्यादा ताक़तवर हो चुका है. कोई ड्रैकुला था ही नहीं.

दूसरा उदाहरण भारतीय है- के. आसिफ़ की फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’. ये भी अनारकली के मिथक पर आधारित है. अब्दुल हलीम शरर और इम्तियाज़ अली ‘ताज’ जैसे उर्दू लेखकों ने ‘अनारकली’ का मिथक रचा, जिसे के. आसिफ़ ने अपनी फिल्म के माध्यम से भारत के घर में पहुंचा दिया. ऐसा ही कुछ पद्मिनी के साथ हुआ.

इतिहासहीन लोगों को ये अनुमान नहीं हो सकता है कि मलिक मुहम्मद जायसी की रचना के कारण पद्मिनी का कल्पित किस्सा कई साहित्यिक रचनाओं, फिल्मों और धारावाहिकों में ऐसे आया मानों वह ऐतिहासिक चरित्र हैं.

मूल अवधी में लिखी गई जायसी की रचना के फारसी में कम से कम बारह रूपांतरण हुए और उनमें ‘पद्मिनी’ या ‘पद्मावती’ का किस्सा आया है. राजस्थान की भाषाओं में भी पद्मिनी के किस्से पर गाथाएं रची जाती रहीं.

राजस्थानी इतिहास के वृंतात लिखने वाले अंग्रेज़ कर्नल जेम्स टॉड ने भी इन गाथाओं के बारे में लिखा और उसके कारण आधुनिक युग में पद्मिनी का किस्सा बंगाल पहुंचा जिस पर देवकी बोस ने 1934 में मूक फिल्म ‘कामोनार अगुन’ भी बनाई.

यहां तक कि दक्षिण में चित्रापु नारायण राव ने ‘चित्तौड़ रानी पद्मिनी’ नाम की फिल्म भी बनाई जिसमें शिवाजी गणेशन और वैजयंती माला बाली ने भूमिकाएं निभाईं.

1954 में आई हिंदी फिल्म ‘जागृति’ में एक गाना है जिसका मुखड़ा है- आओ बच्चों! तुम्हें दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’. इस गाने में एक पंक्ति आती है- कूद पड़ी थी यहां हजारों पद्मिनिया अंगारों पे’.

1964 में हिंदी फिल्म ‘पद्मिनी’ भी आई. इस तरह पद्मिनी का मिथक बढ़ता गया. भंसाली की आने वाली फिल्म भी इस तरह लगभग 475 साल पहले रचे गए एक मिथक की नई पेशकश हैं.

और ऐसा होने में कुछ गलत भी नहीं है. मिथक लगातार बनते हैं और उनको इतिहास समझने की भूल भी होती रही है. इसलिए भंसाली की फिल्म ‘पद्मावती’ को भी इतिहास समझने की भूल न की जाए या इतिहास के बहाने इस पर बखेड़ा न खड़ा किया जाए. हां, ये ज़रूर देखा जाए कि भंसाली ने फिल्म कैसी बनाई है.

मलिक मुहम्मद जायसी का अपना जीवन भी कई तरह की किंवदंतियों से भरपूर है. जायसी की एक आंख नहीं थी. एक किस्सा तो इसी को लेकर है.

कहते हैं कि शेरशाह से जब उनकी पहली मुलाकात हुई तो वह जायसी को देखकर हंसा. जायसी ने पूछा, ‘मोहिका हससि कि कोहरहि.’ यानी मुझ पर हंस रहे हो या मुझे बनाने वाले कुम्हार (ख़ुदा) पर? कहते हैं शेरशाह इस पर लज्जित हुआ.

दूसरी किंवदंती ये है कि जायसी ने अपने स्थानीय राजा से कहा, ‘मैं किसी राजा के तीर से मरूंगा.’ एक दिन वह राजा जंगल में शिकार खेलने गया और एक शेर को देखा. राजा ने तीर चलाके उसे मार दिया. बाद में देखा कि शेर मरने के बाद जायसी के शव के रूप में बदल गया. यानी जायसी ने ख़ुद हठयोग से शेर का रूप धर लिया था. हो सकता है कि आने वाले समय मे जायसी पर भी फिल्म बने.

हिंदी के सबसे बड़े आलोचक रामचंद्र शुक्ल की ये पंक्तियां याद रखने लायक हैं जो उन्होने ‘जायसी ग्रंथावली’ की भूमिका में लिखी हैं, ‘इन्होंने मुसलमान होकर हिंदुओं की कहानियां हिंदुओं की बोली में पूरी सहृदयता के साथ कहकर उनके जीवन की मर्मस्पर्शनी अवस्थाओं के साथ अपने उदार हृदय का पूर्ण सामंजस्य दिखा दिया’.

जायसी सूफी थे और उदारमना थे. हालांकि उनके बारे में भी आजकल प्रवाद फैलाए जा रहे हैं.

संजय लीला भंसाली की ‘पद्मावती’ का अंत कैसा होगा, ये जिज्ञासा का विषय है. जायसी ने तो ये दिखाया है कि अलाउद्दीन ख़िलजी युद्ध जीत लेने के बाद पाता है कि उसे एक मुट्ठी राख के सिवा कुछ नहीं मिला.

जायसी का ‘पद्मावत’ युद्ध की व्यर्थता के बोध को दिखाने वाली रचना है. मध्यकालीन हिंदी साहित्य के आधिकारिक विद्वान प्रो. नित्यानंद तिवारी जायसी की इस अर्धाली ‘सना जो प्रम पीर गा गावा’ का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि ‘पद्मावत’ प्रेम की पीड़ा को रेखांकित करने वाला काव्य है. क्या भंसाली की फिल्म में प्रेम की ये पीड़ा दिखेगी? या कुछ और.

(रवींद्र त्रिपाठी टेलीविजन और प्रिंट मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार, साहित्य-फिल्म-कला-रंगमंच के आलोचक, स्क्रिप्ट लेखक और डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार हैं.)