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प्रणब पीएम बनने के लिए अधिक योग्य थे लेकिन मेरे पास कोई विकल्प नहीं था: मनमोहन

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ‘द कोएलिशन ईयर्स: 1996-2012’ प्रकाशित, किताब में है विभिन्न गठबंधन सरकारों का लेखा-जोखा.

New Delhi: Former President Pranab Mukherjee with former prime minister Manmohan Singh at the release of his book "The Coalition Years" at a function in New Delhi on Friday. PTI Photo by Atul Yadav (PTI10_13_2017_000129B)

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब ‘द कोएलिशन ईयर्स: 1996-2012’ के मौके पर पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्र में 2004 से 2014 तक लगातार दो बार संप्रग गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर चुके पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शुक्रवार को दावा किया कि प्रधानमंत्री बनने के मामले में उनके पास तो कोई विकल्प ही नहीं बचा था तथा पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी इस बात को अच्छी तरह जानते थे.

उन्होंने यह बात दिल्ली स्थित तीन मूर्ति सभागार में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ‘द कोएलिशन ईयर्स: 1996-2012’ के उद्घाटन के अवसर पर कही जो इस दौर में केंद्र की विभिन्न गठबंधन सरकारों का लेखाजोखा है.

डॉ. सिंह ने पूर्व राष्ट्रपति को प्रतिष्ठित एवं जिंदादिल सांसद एवं कांग्रेस जन के रूप में याद करते हुए कहा कि पार्टी में हर कोई उनसे जटिल एवं मुश्किल मुद्दों के हल की उम्मीद करते थे.

मनमोहन ने वर्ष 2004 में अपने प्रधानमंत्री बनने का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में चुना और प्रणबजी मेरे बहुत ही प्रतिष्ठित सहयोगी थे.

उन्होंने कहा, मुखर्जी के पास यह शिकायत करने के सभी कारण थे कि मेरे प्रधानमंत्री बनने की तुलना में वह इस पद प्रधानमंत्री के लिए अधिक योग्य हैं… पर वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानते थे कि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था.

उनकी इस टिप्पणी पर न केवल मुखर्जी तथा मंच पर बैठे सभी नेता बल्कि श्रोताओं की अग्रिम पंक्ति में बैठी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया सहित सभी श्रोता हंसी में डूब गए. मुखर्जी की पुस्तक के लोकार्पण अवसर पर मुखर्जी, मनमोहन के साथ साथ माकपा नेता सीताराम येचुरी, भाकपा नेता सुधाकर रेड्डी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव, द्रमुक नेता कानिमोई मंच पर मौजूद थे. श्रोताओं में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे.

सिंह ने कहा कि इससे उनके और मुखर्जी के संबंध बेहतरीन हो गए तथा सरकार को एक समन्वित टीम की तरह चलाया जा सका. जिस प्रकार से उन्होंने भारतीय राजनीति के संचालन में महान योगदान दिया है, वह इतिहास में दर्ज होगा.

मनमोहन ने मुखर्जी के साथ अपने संबंधों को याद करते हुए कहा कि वह 1970 के दशक से ही उनके साथ काम कर रहे हैं. डॉ. सिंह ने कहा कि वह दुर्घटनावश राजनीति में आए जबकि मुखर्जी एक कुशल एवं मंजे हुए राजनीतिक नेता हैं.

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री रहने के दौरान सरकार को जब भी किसी जटिल मुद्दे का हल निकालना होता था तो मंत्री समूह का गठन किया जाता था और अधिकतर जीओएम की अध्यक्षता उस समय मुखर्जी ही कर रहे होते थे.

इस अवसर पर मुखर्जी ने कहा कि उन्होंने इस पुस्तक में राजनीतिक कार्यकर्ता की नजर से 1996-2004 तक की लंबी राजनीतिक यात्रा को समझाने एवं समीक्षा का प्रयास किया.

उन्होंने कहा कि उन्हें संसद में लंबा अनुभव रहा है और उन्हें संसद में देश के कई बड़े नेताओं को सुनने का मौका मिला. उन्होंने कहा कि यह पुस्तक किसी इतिहासकार की नजर से नहीं बल्कि एक राजनीतिक कार्यकर्ता के नजर से लिखी गई है. उन्होंने कहा कि 1996 से लेकर 2004 के बीच पुस्तक में देवगौड़ा सरकार, गुजराल सरकार, वाजपेयी सरकार और मनमोहन सरकार के कामकाज का ब्यौरा दिया गया है.