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कश्मीर में वार्ताओं का हश्र देखकर केंद्र सरकार के नए क़दम से बहुत उम्मीद नहीं दिखती

वार्ताकार दिनेश्वर शर्मा सिर्फ़ अलगाववादियों से ही वार्ता नहीं कर रहे. उन्हें प्रदेश सरकार में शामिल भाजपा से भी जूझना होगा, जो अलगाववादियों को रियायत देने के बिल्कुल ख़िलाफ़ है.

Kashmiri protesters run towards Indian security personnel during a demonstration against the plan to resettle Hindus, in Srinagar April 10, 2015. REUTERS/Danish Ismail

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नरेंद्र मोदी सरकार ने इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को जम्मू कश्मीर के लिए मुख्य वार्ताकार के तौर पर नियुक्त किया है. इस तथ्य से आप काफी गलत निष्कर्ष निकाल सकते हैं.

उदाहरण के तौर पर, आप यह यकीन कर सकते हैं कि सरकार एक राजनीतिक मसले को सुरक्षा का मसला बनाने पर आमादा है या आप यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि सरकार सिर्फ शर्मा जैसे किसी व्यक्ति में विश्वास जता सकती है, जो एक गोपनीयता बरतनेवाले राज्य के सबसे गोपनीय पर्तों से ताल्लुक रखते हैं.

गौरतलब है कि शर्मा ने 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में जम्मू और कश्मीर में अपनी सेवाएं दीं. उन्होंने इंटेलीजेंस ब्यूरो के कश्मीर डेस्क का भी नेतृत्व किया.

इंटेलीजेंस ब्यूरो के प्रमुख के तौर पर तो कश्मीर उनकी कार्यसूची में था ही. इसलिए कश्मीर की उनकी जानकारी को लेकर कोई संदेह नहीं होना चाहिए. जिन लोगों से वे संभवतः मिलेंगे, उनसे भी वे अच्छी तरह से परिचित होंगे.

केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने यह स्पष्ट किया है कि शर्मा के अधिकारों का दायरा व्यापक होगा और वे ‘जिससे चाहें, बात करने के लिए’ स्वतंत्र होंगे.’

राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि कश्मीर की समस्या का हल सिर्फ कश्मीरियों को गले लगा कर किया जा सकता है, न कि गोलियों या गालियों को नई पहल का आधार बनाकर.

मेरा अपना अनुभव है कि जम्मू-कश्मीर पर नजर रखनेवाले आईबी अधिकारियों के पास राज्य के मसलों की समझ कई दूसरे लोगों की तुलना में ज्यादा सुलझी हुई होती है.

अपनी जिम्मेदारियों के तहत उन्हें अक्सर हालातों के कुरूप पहलुओं से सामना करना पड़ता है, जो उन्हें यथार्थवादी बना देता है. ऐसा सिर्फ भारत के मामले में ही नहीं है.

इजरायल में भी इंटेलीजेंस प्रमुखों का स्थितियों के प्रति नजरिया आदर्शवादी या वैचारिक से ज्यादा यथार्थवादी देखा गया है. पिछले साल इजरायल के सत्ताधारी गठबंधन के अध्यक्ष ने इस बात को लेकर दुख प्रकट किया कि ‘गुजरते वर्षों के साथ शिन बेट और मोसाद वामपंथी हो गए.’

कहने का मतलब ये नहीं है कि शर्मा वामपंथी या शांतिवादी ही हैं- हमारे पास इस बारे में कोई टिप्पणी करने के लिए पर्याप्त आंकड़े नहीं हैं.

इसलिए, एक तरफ हमारे पास एएस दूलत का उदाहरण है, जिन्हें शांतिवादी की श्रेणी में रखा जा सकता है, तो दूसरी ओर हमारे पास एमके नारायणन या वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल का भी उदाहरण है, जो यह दिखाते हैं कि वे युद्धप्रिय भी बने रह सकते हैं.

यहां बस इतना कहना मुनासिब होगा कि शर्मा की पृष्ठभूमि के कारण उनके बारे में पहले से कोई राय कायम करना दुरुस्त नहीं होगा.

एक किस्म की रणनीति

सरकार क्या करना चाह रही है, यह काफी साफ है. इसने अब तक इस यकीन के साथ काम किया है कि समस्या से निपटने के लिए अतीत की नीतियां काफी नरम थीं. कश्मीरियों को यह दिखाने की जरूरत थी कि आतंकवाद से उन्हें कोई फायदा नहीं होगा और बंदूकधारियों के बल पर, चाहे वे चाहे पाकिस्तानी हो या कश्मीरी, वे किसी किस्म की रियायतों की आस नहीं लगा सकते.

इसलिए, आतंकवादियों को सुनियोजित ढंग से मारकर उनके हौसले को पस्त करके और जमीन पर काम करने वालों (ओवरग्राउंड वर्कर्स- आईबी की शब्दावली में ओजीडब्लू) के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाकर और पत्थरबाजों को दबाने के बाद, इसने अब बातचीत के लिए तैयार होने का संकेत दिया है.

पिछले एक साल में न सिर्फ आतंकवादियों के लिए बल्कि उनके समर्थकों और वहां के आम नागरिकों के लिए भी घाटी में हालात काफी नाजुक हैं. सरकार यह संदेश देती दिख रही है कि ‘हम इस (आक्रामक) रास्ते पर आगे भी चल सकते हैं, लेकिन यहां रास्ता निकालने का एक मौका दिया जा रहा है.’

इस नीति की एक नजीर वियतनाम युद्ध के इतिहास में मिलती है, जब निक्सन प्रशासन ने वियतनाम युद्ध को करीब पांच सालों तक सिर्फ इसलिए लंबा खींच दिया, क्योंकि वे यह दिखाना चाहते थे कि ज्यादा कड़ा रुख अपनाकर वे उत्तरी वियतनाम से बेहतर शर्तों पर समझौता कर सकते थे.

इस अभियान में सैकड़ों हजार लोग, जिनमें ज्यादातर वियतनामी थे, मारे गए, लेकिन अंत में उत्तरी वियतनामियों का ही पलड़ा भारी रहा. बल प्रयोग आपको इतनी ही दूर लेकर जा सकता है. इसलिए इस नई सरकारी पहल से कोई उल्लेखनीय सफलता मिलेगी या नहीं, इसकी भविष्यवाणी करना कठिन है.

वैश्विक स्तर पर आतंकवादी अलगाववाद से निपटने के दो सफल तरीके रहे हैं- इसे सैन्य साधनों से कुचल देना या फिर ‘कानून के शासन’ के द्वारा धैर्यपूर्वक और सुनियोजित तरीके से इसका समाधान खोजने की कोशिश करना. भारतीय तरीके में जाने-अनजाने में इन दोनों का घालमेल मिलता है.

कश्मीर में आतंकवाद 25 साल से ज्यादा समय से है. आतंकवाद पर भारत का रवैया किसी भी तरह से नरम नहीं कहा जा सकता है. 1990 से अब तक 20,000 से ज्यादा आतंकवादी मारे गए हैं. साथ ही 15,000 नागरिकों को भी इसमें अपनी जान गंवानी पड़ी है.

इसके बावजूद अलगाववादी विचार जिंदा है और कहीं नहीं तो कम से कम कश्मीर घाटी में. निश्चित तौर पर यह आतंकवाद पाकिस्तानी समर्थन का नतीजा रहा है.

इस समर्थन में सिर्फ आतंकवादियों को प्रशिक्षण और उन्हे हथियार देना ही शामिल नहीं है, बल्कि पाकिस्तान ने घाटी में अपने जवान भी भेजे हैं. लेकिन, यह हालातों से राजनीतिक तौर पर निपटने में भारत की तरफ से उठाए गए गलत कदमों का भी नतीजा है.

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अक्टूबर 2011 में तत्कालीन गृहमंत्री पी चिदंबरम को रिपोर्ट सौंपते वार्ताकार दिलीप पडगांवकर, एमएम अंसारी और राधा कुमार (फाइल फोटो: पीटीआई)

ऐसा नहीं है कि भारत ने राजनीतिक तरीके में हाथ नहीं आजमाया है. इसने वहां अन्य चीजों के साथ राज्य सरकार की फिर से बहाली की है. वहां नियमित अंतराल पर चुनाव करवाए हैं. इसने वहां वार्ताकारों के जरिए मध्यस्थता की भी कोशिश की है. लेकिन, इन सब रास्तों पर सही ढंग से दूर तक चलने का धैर्य नहीं दिखाया गया है.

शर्मा मध्यस्थों की लंबी फेहरिस्त में शामिल हो गए हैं. इस फेहरिस्त में राजेश पायलट और जॉर्ज फर्नांडीस जैसे नाम भी हैं, जिन्होंने सरकार में रहते हुए अलगाववादियों के बीच के राजनीतिक पुल के तौर पर काम करने की कोशिश की.

कश्मीर के मसले पर पहले असली मध्यस्थ केसी पंत थे, जिन्होंने 2001 में नियुक्त किया गया था. लेकिन उस साल दिसंबर में संसद पर हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसी स्थिति बनने के बाद यह मिशन असमय ही समाप्त हो गया.

इससे पहले, अगस्त, 2010 में घाटी में युद्धविराम का प्रकरण हुआ था और हिजबुल मुजाहिदीन और केंद्रीय गृह सचिव कमल पांडे के नेतृत्व में एक सरकारी प्रतिनिधिमंडल के बीच वार्ता हुई थी, जिसे बीच में ही रोक दिया गया था. वे वार्ताएं अंदरूनी भितरघात और इस प्रक्रिया का प्रबंधन कर सकने में दोनों पक्षों की अक्षमता के कारण नाकाम हो गईं.

बिना चक्केवाली बातचीत की गाड़ी

2002 में, कश्मीर में राम जेठमलानी के नेतृत्व में एक ट्रैक-2 कश्मीर कमेटी का गठन किया गया था. दिलीप पडगांवकर, जावेद लाइक़, एमजे अक़बर, पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण, सुप्रीम कोर्ट के वकील अशोक भान, भारतीय विदेश सेवा के रिटायर्ड अधिकारी वीके ग्रोवर और न्यायविद् फली एस नरीमन इसके अन्य सदस्य थे. लेकिन, यह कोशिश भी किसी मंजिल तक नहीं पहुंच सकी.

2003 में सरकार ने एक बार फिर एक वार्ताकार की नियुक्ति की. पूर्व गृह सचिव एनएन वोहरा, 2008 में राज्य के गवर्नर नियुक्त किए जाने तक इस भूमिका में रहे. वे आज भी गर्वनर के पद पर बने हुए हैं.

कई अन्य लोग समस्या का समाधान खोजने के खेल में शामिल हुए. इनमें अरुण जेटली, पूर्व रॉ प्रमुख ए.एस दूलत और ओआरएफ के संस्थापक आरके मिश्रा का नाम लिया जा सकता है. लेकिन, इसका भी कोई फायदा नहीं हुआ.

इस बीच, केंद्रीय गृह मंत्री और उप-प्रधानमंत्री ने खुद जनवरी, 2004 में अलगाववादियों के साथ एक अलग दरवाजा खोलने की कोशिश की. लेकिन, तब तक सरकार चुनावी मुद्रा में आ गई थी, इसलिए इसका भी कोई खास नतीजा नहीं निकला.

आधिकारिक तौर पर वार्ताकारों की नियुक्ति अक्टूबर, 2010 में हुई. इस बार पडगांवकर, राधा कुमार और एमएम अंसारी को वार्ताकार बनाया गया, जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में उन कई प्रस्तावों को एक जगह इकट्ठा किया, जो दशकों से राज्य की फिजाओं में तैर रहे थे. लेकिन,मनमोहन सिंह सरकार ने इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया.

यशवंत सिन्हा की अगुआई में सरोकार रखनेवाले नागरिकों का समूह 2016 और 2017 में सक्रिय था. उन्हें किस हद तक किसी प्रकार का आधिकारिक समर्थन था या नहीं, या वे सरकार द्वारा किसी तरह प्रायोजित थे या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है.

वहां की स्थिति पर उनकी टिप्पणियां काफी पैनी और आधिकारिक पक्ष के विपरीत रही है. शायद सरकार के साथ सिन्हा की अनबन के कारण इस समूह द्वारा सरकार को सौंपी गई रिपोर्ट को नजरअंदाज कर दिया गया.

कई वार्ताकार इसलिए नाकाम रहे, क्योंकि उन्हें कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं दिया गया था, न ही किसी से कोई वादा करने का कोई अधिकार दिया गया था. वे नई दिल्ली के ना-नुकुर वाले रुख या इस्लामाबाद के छल-कपट के बंधक बने रहे.

उनमें से कुछ के पास जरूरी विश्वसनीयता की कमी थी, जबकि दूसरों के मामले में आईएसआई ने अपनी चालबाजियों से इन वार्ताओं का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकलने दिया. कुछ उदाहरणों में वार्ताकारों की नियुक्ति सिर्फ दिखावे के लिए की गई, न कि समस्या का हल निकालने के मकसद से.

New Delhi: Dineshwar Sharma, former Director of Intelligence Bureau, calling on the Union Home Minister, Rajnath Singh, after being appointed as the Representative of Government of India to initiate dialogue in Jammu and Kashmir, in New Delhi on Monday. PTI Photo / PIB (PTI10_23_2017_000209B)

केंद्र सरकार ने इंटेलीजेंस ब्यूरो के पूर्व निदेशक दिनेश्वर शर्मा को जम्मू कश्मीर पर वार्ताकार नियुक्त किया है. शर्मा के साथ केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह. (फोटो: पीटीआई)

इस तरह देखें, तो शर्मा संभवतः सरकारी इख़्तियार के साथ जा रहे हैं, जो अलग ही रणनीति पर काम कर रही है. यह रणनीति एक तरफ कश्मीरी आतंकवाद को बंदूक से कुचलने और दूसरी तरफ जमीनी समर्थकों पर एनआईए के जरिए कार्रवाई करने की है. शायद, यह सफल साबित हो. लेकिन, कश्मीर की पहेली को सुलझाने के लिए असामान्य क्षमताओं की दरकार होगी.

शर्मा सिर्फ अलगाववादियों के साथ ही वार्ता नहीं कर रहे हैं. उन्हें राज्य की सरकार में शामिल युद्धपिपासु भाजपा से भी जूझना होगा, जो अलगाववादियों को किसी किस्म की रियायत देने के बिल्कुल खिलाफ है.

लेकिन, अगर तर्क के हिसाब से बात करें, तो जब तक उनके पास देने के लिए कुछ नहीं होगा, बातचीत का कोई आधार नहीं होगा. और अगर सरकार के नजरिए से देखा जाए, तो यह सोच पाना कठिन है कि वे वास्तव में क्या पेशकश कर सकते हैं.

निश्चित तौर पर सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान है. कोई इस बात को पसंद करे या न पसंद करे, कश्मीर समस्या का समाधान दोतरफा प्रक्रिया की मांग करता है. एक तरफ इसमें घरेलू अलगाववादियों को शामिल करना होगा, दूसरी तरफ पाकिस्तानियों को.

हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद, पाकिस्तान अभी भी अपने जिहादी प्रतिनिधियों की मदद से इस प्रक्रिया को बेपटरी करने की क्षमता रखता है. लेकिन, फिलहाल स्थिति यह है कि भारत, पाकिस्तान के साथ किसी किस्म की कूटनीतिक प्रक्रिया के खिलाफ है.

इसलिए आप इस बात को लेकर निश्चिंत रह सकते हैं कि शर्मा की नियुक्ति पाकिस्तान को भड़काने का काम करेगी. ऐसा नहीं होने की एक सूरत यह है कि नई दिल्ली इस्लामाबाद के साथ एक समानांतर पहल शुरू करे.

इसलिए यहां एक बड़ा सवाल है: पहली बात तो यह कि उनकी नियुक्ति की क्यों गई है? क्या इसका मकसद कश्मीरी सुरंग में से रास्ता निकालने का है? या यह एक तरह से यह सुनिश्चित करने का जरिया है कि कश्मीर घाटी को लेकर सरकार की सख्त नीति की तरफ अमेरिका का बेवजह ध्यान न जाए?

दूसरे शब्दों में यह एक रणनीतिक कदम है, जिसका मकसद सरकार को थोड़ा और समय मुहैया कराना है, ताकि वह जैसा कि राजनाथ सिंह ने कहा ‘स्थायी समाधान’ हासिल करने के रास्ते पर चल सके? या फिर यह कश्मीर को लेकर मोदी सरकार के हृदय परिवर्तन की ओर इशारा करता है?

(लेखक आॅब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में विशिष्ट शोधकर्ता हैं.)

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