राजनीति

ग्राउंड रिपोर्ट: आज़म ख़ान और उत्तर प्रदेश की मुस्लिम सियासत

‘मिसाल दी जाती है कि छोटा मुंह बड़ी बात. लेकिन यहां तो बड़ा मुंह छोटी बात हो रही है. प्रधानमंत्री नुक्कड़ सभाएं कर रहे हैं. अरे! 1.31 अरब के वज़ीरे आज़म! भूखे को रोटी दो, नंगे को कपड़ा दो. क़ब्रिस्तान और श्मशान मत दो.’

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चुनावी जनसभा को संबोधित करते आज़म ख़ान (फोटो: आज़म ख़ान अनआॅफिशियल फेसबुक पेज )

आंबेडकरनगर,उत्तर प्रदेश: मुख्यधारा के मीडिया और बहुसंख्यक समाज के बीच नफरत की नजर से देखे जाने वाले आज़म ख़ान का जादू अल्पसंख्यकों के सिर चढ़ कर बोलता है. यह बात उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में जगह- जगह साबित हो रही है. इसमें कोई दोराय नहीं कि न आज़म ख़ान अपने विरोधियों को सह पाते हैं और न ही उनके विरोधी उन्हें.

यही वजह है कि उन्होंने ‘आज तक’ के पत्रकारों पर मुकदमा ही नहीं किया बल्कि उनके विरुद्ध संसदीय विशेषाधिकार का मामला बनाया, भैंस वाले मामले पर ब्लॉगर पर केस किया और दलित लेखक कंवल भारती को भी जेल भिजवाया, इसके बावजूद इस चुनाव में मोदी और अमित शाह की तेजाबी ज़बान का अगर कोई जवाब देता है वह आज़म ख़ान ही हैं. भले ही शिवराज सिंह चौहान कहें कि उनका नाम ज़बान पर लाने के बाद नहाना पड़ता है.

आंबेडकरनगर जिले की कटेहरी विधानसभा क्षेत्र के इत्तिफातगंज कस्बे में सभास्थल पर उनका हेलीकॉप्टर उतरते ही न सिर्फ धूल का बवंडर का उठता है बल्कि लोगों के दिलों में जज़्बात का एक तूफान खड़ा होने लगता है.

यह बुनकरों का कस्बा है और आंबेडकर नगर की उपजाऊ धरती पर यहां के व्यापारी और किसान यह उम्मीद पाले हुए हैं कि अगर सपा सरकार अगली बार आई तो उनकी खुशहाली बढ़ेगी. इसी जज़्बे को आज़म ख़ान फौरन पकड़ लेते हैं. पहले तो वे हेलीकॉप्टर की ओर दौड़ रहे नौजवानों को अपनी तरफ बुलाते हुए कहते हैं,’ हेलीकॉप्टर से अच्छा है मुझे देख लो. वह बेजान है और हम जानदार हैं.’

यह अपील सुनते ही भीड़ वापस मंच की ओर खिंच आती है और वे उसे सुरक्षा घेरे में ही बैठने का आदेश दे देते हैं. उसके बाद वे इस चुनाव की अहमियत पर टिप्पणी करते हैं, ‘चुनाव चंद दिनों का मेहमान है आया है, चला जाएगा. पर यह एक लफ़्ज़ आने वाले पांच सालों के लिए एक इबारत लिख जाएगा.’

फिर वे उसी तरह अपने उत्पीड़न को मुद्दा बनाते हैं जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 के चुनाव में बनाते थे. ‘आज़म ख़ान एक बदनाम आदमी है. जिसने भारत मां को डायन कहा. उसके बाद नारा लगा-जो आज़म ख़ान का सिर लाएगा, राम भक्त कहलाएगा, लेकिन मेरे दामन में पैबंद हैं पर धब्बा नहीं है.’

इस निजी सफाई के साथ वे नोटबंदी और प्रधानमंत्री पर आ जाते हैं. हालांकि वे उनका नाम नहीं लेते लेकिन बादशाह कहकर जब वे संबोधित करते हैं तो इस देहाती कस्बे की पब्लिक को सब कुछ समझ में आ जाता है. वे कहते हैं कि कालाधन लाने का वादा किया था प्रधानमंत्री ने लेकिन बादशाह ने चोर को ख़बरदार कर दिया और चोर पैसा लेकर भाग गया.

इसके साथ ही वे बसपा और भाजपा की नजदीकी को उजागर करना भी नहीं भूलते क्योंकि उन्हें मालूम है कि अगर अल्पसंख्यकों के वोट बसपा को गए तो सपा का जीतना मुश्किल है. तब शायद इस इलाके में ‘दादा’ के नाम से जाने जाने वाले धर्मनिरपेक्षता के योद्धा जयशंकर पांडे का चुनाव जीतना कठिन हो जाएगा.

यहां पर आज़म ख़ान का डायलॉग जनता के जज़्बात को छूता है और वह बार-बार ताली बजाती है और आज़म ख़ान जिंदाबाद के नारे लगाती है.

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बलरामपुर जिले में आज़म ख़ान की चुनावी रैली. (फोटो: राजन पांडेय)

‘कौन थी वह जिसने गुजरात में आपके क़ातिलों के लिए वोट मांगा? आग नहीं लगा रहा हूं. आग लगाने वालों (मायावती) का पता बता रहा हूं. पिछले चुनाव में बीजेपी वालों ने मुसलमानों के मोहल्ले में जाकर पूछा कि याद है. लोगों ने कहा हां जनाब याद है गुजरात का वह मंज़र. लोगों ने वोट दिया और क़ातिल को मसीहा बना दिया.’

उसके बाद वे प्रधानमंत्री पर व्यंग्य के ऐसे तीखे तीर चलाते हैं कि उससे जहां भाजपा विरोधियों के हौंसले बुलंद होते हैं वहीं मोदी भक्त सुनकर दंगे पर उतर सकते हैं.

‘मिसाल दी जाती है कि छोटा मुंह बड़ी बात. लेकिन यहां तो बड़ा मुंह छोटी बात हो रही है. प्रधानमंत्री नुक्कड़ सभाएं कर रहे हैं. अरे! 1.31 अरब के वज़ीरे आज़म! भूखे को रोटी दो, नंगे को कपड़ा दो. कब्रिस्तान और श्मशान मत दो. गुजरात में बेगुनाहों को बहुत श्मशान दिए है प्रधानमंत्री ने. बादशाह हमारी भैंसिया नहीं भूले, लेकिन अपनी पत्नी को भूल गए. बादशाह झूठा नहीं होता. अगर झूठा होता है तो बादशाह नहीं होता. पहले कहा शादी नहीं की. बाद में जब पत्नी सामने आई तो कहा पहले ही छोड़ दिया था. अरे शादी तो भगवान रामचंद्र ने भी की थी. क्या आप उनसे भी बड़े हो गए? अगर आरएसएस वालों की तरह सब लोग शादी करना बंद कर दें तो यह दुनिया ठहर जाएगी. इसलिए भागो नहीं सच्चाई बताओ. बीवी को क्यों नहीं ला रहे हो. जब तक भारत का पीएम अपनी पत्नी को न्याय नहीं देता वह देश की बहू बेटियों को न्याय नहीं देता.’

वे गाय, गंगा और गीता पर भी टिप्पणी करते हैं और उसकी सांप्रदायिक व्याख्या की आलोचना करते हुए मुसलमानों को उनसे और भारत की साझी विरासत से जोड़ते हैं. इस दौरान वे क़ुरान की आयत भी पढ़ते हैं और लोगों के जज़्बात को उस ऊंचाई तक ले जाते हैं, जहां तक उनका हेलीकॉप्टर उड़ता है.

बाद में जब वे स्थानीय प्रत्याशी जयशंकर पांडेय का हाथ पकड़ कर उनके लिए वोट मांगते हैं तो हिंदू-मुस्लिम एकता के योद्धा जयशंकर पांडेय की आंखों में आंसू आ जाते हैं और भीड़ में उत्साहित कार्यकर्ता उछल-उछलकर एक दूसरे से गले मिलते हैं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)