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भारतीय न्यायपालिका के इतिहास का एक दुखद क्षण

पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण बता रहे हैं कि 10 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश की अदालत में जो हुआ, वह सर्वोच्च न्यायालय और भारत की न्यायपालिका के भविष्य पर गंभीर सवाल खड़े करता है.

भारत का सर्वोच्च न्यायालय. (फोटो: रॉयटर्स)

भारत का सर्वोच्च न्यायालय. (फोटो: रॉयटर्स)

9 नवंबर को, जस्टिस चेलामेश्वर की पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई की. इस याचिका में भ्रष्टाचार के एक ऐसे कथित आचरण, जिसमें उच्च न्यायपालिका के सदस्य शामिल हो सकते हैं, की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी.

चूंकि यह मामला न्यायपालिका की ईमानदारी और साख से संबंधित है, इसलिए जस्टिस जे. चेलामेश्वर की पीठ ने प्रतिवादी को नोटिस भेजा और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को केस डायरी समेत जांच से संबंधित सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों को बंद लिफाफे में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश किया.

पीठ ने (मुख्य न्यायाधीश समेत) कोर्ट के पांच वरिष्ठतम जजों की संवैधानिक पीठ के सामने इस मामले की आगे की सुनवाई के लिए 13 नवंबर की तारीख़ मुक़र्रर की है.

यह जांच उड़ीसा हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस (रिटायर्ड) आईएम क़ुद्दुसी और ओडिशा के कुछ अन्य बिचौलियों, जिनमें एक नाम बिस्वनाथ अग्रवाल का है, के ख़िलाफ़ सीबीआई द्वारा किए गए एक एफआईआर से संबंधित है.

आरोप यह लगाया गया है कि अग्रवाल ने कानपुर के एक मेडिकल कॉलेज के प्रोपराइटरों से सुप्रीम कोर्ट से उनके हक में फैसला दिलवाने के नाम पर काफी पैसा लिया था. ये पैसा कथित तौर पर कुछ जजों को दिया जाना था.

इससे जुड़ा तथ्य यह है कि यह मामला उस समय जिस पीठ के सामने था, उसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा कर रहे थे. सीबीआई द्वारा किए गए एफआईआर के एक संबंधित अनुच्छेद में कहा गया है:

‘सूचनाओं से यह भी पता चलता है कि प्रसाद एजुकेशनल ट्रस्ट ने सर्वोच्च न्यायालय में एक रिट याचिका (सिविल) सं. 797/2017 दायर की थी. श्री बीपी यादव ने इस साज़िश को आगे बढ़ाते हुए श्री आईएम क़ुद्दुसी और श्रीमती भावना पांडेय से आग्रह किया, जिन्होंने अपने संपर्कों की बदौलत सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को रफा-दफा कराने का आश्वासन दिया. उन्होंने एक प्राइवेट व्यक्ति- बिस्वनाथ अग्रवाल, निवासी, एचआईजी-136, फेस 1, कानन विहार, चंद्रशेखरपुर, भुवनेश्वर, ओडिशा को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का फैसला उनके अनुकूल तरीके से करवाने का ज़िम्मा सौंपा. श्री विश्वनाथ का दावा था कि इस मामले से जुड़े महत्वपूर्ण सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों से उनका नज़दीकी रिश्ता है. उन्होंने यह भरोसा दिलाया कि वह इस मामले का फैसला उनके मन-मुताबिक तरीके से करवा देंगे. लेकिन, लोकसेवकों को भ्रष्ट और ग़ैरक़ानूनी तरीके से लालच देकर यह काम कराने के बदले में उन्होंने काफी पैसे की मांग की.’

इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट से इस बेहद संवेदनशील मसले की जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) के गठन की मांग की गई थी. इस याचिका में सीबीआई जांच की मांग नहीं की गई थी, क्योंकि मौजूदा हालात में जब सीबीआई केंद्र सरकार के हाथों का खिलौना बनी हुई है, सरकार इस सूचना का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर सकती है.

इससे पहले भी ऐसे कई मौके रहे हैं, जब आम लोगों में विश्वास बहाल करने के लिए संवेदनशील मसलों की सुनवाई पांच सर्वाधिक वरिष्ठ जजों द्वारा की गई है. ऐसे दो मामलों में से एक- इंदिरा गांधी की चुनाव अपील का था और दूसरा- आपातकाल के दौरान बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबीअस कॉर्पस) केस था, जिसमें जस्टिस एचआर खन्ना विरोध करने वाले एकमात्र जज थे, जिसके चलते मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी उनसे छिन गई थी.

भारत के पूर्व महान्यायवादी (अटॉर्नी जनरल) सीके दफ्तरी की सलाह पर तब के मुख्य न्यायाधीश एएन राय बंदी प्रत्यक्षीकरण के मामले को मुख्य न्यायाधीश द्वारा चुन लिए गए किन्हीं भी पांच जजों की पीठ के हवाले करने की जगह पांच वरिष्ठतम जजों की पीठ को सौंपने को तैयार हुए थे.

शुक्रवार, 10 नवंबर को, मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने एक सात जजों की पीठ (जो कि सुनवाई शुरू होने से पहले 5 सदस्यीय पीठ में बदल दी गई थी) गठित की, जिसकी अध्यक्षता उन्होंने ख़ुद की.

इस पीठ ने जस्टिस चेलामेश्वर द्वारा दिए गए काफी उचित आदेश को इस आधार पर रद्द कर दिया कि पीठों का गठन करने का आधिकार सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को दिया गया है.

यहां यह याद दिलाना उचित होगा कि मुख्य न्यायाधीश के अलावा पांच वरिष्ठतम जजों में से किसी को भी जल्दबाजी में गठित की गई इस संवैधानिक पीठ का हिस्सा बनने के लिए नहीं चुना गया. जो बात सबसे ज़्यादा ध्यान खींचती है वह यह कि मुख्य न्यायाधीश को अपने बाद के चार वरिष्ठतम जजों में से किसी पर शायद विश्वास नहीं है.

अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट के एक जज की शक्तियां

मुख्य न्यायाधीश यह भूल रहे हैं कि संविधान अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट के जजों को बेहद विशिष्ट शक्ति प्रदान करता है. किसी भी कोर्ट को, यहां तक कि हाईकोर्ट को भी यह अधिकार नहीं दिया गया है.

यह अनुच्छेद सुप्रीम कोर्ट के जजों को किसी भी कानून के किसी भी प्रावधान को दरकिनार करने का अधिकार देता है, अगर उसे लगता है कि उसके सामने आए केस में पूर्ण न्याय करने के लिए ऐसा करना ज़रूरी है.

सुप्रीम कोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसले इस विशेष आधिकार की ओर इशारा करते हैं और इसकी व्याख्या करते हैं. एक फैसला एआर अंतुले से जुड़े एक मामले में सात जजों की पीठ वाला है और दूसरा- यूनियन कार्बाइड में 5 जजों की पीठ वाला है.

यह स्पष्ट तौर पर कहा गया था कि अनुच्छेद 142 का दायरा काफी विस्तृत है. यह भी कहा गया कि किसी भी मामले में वास्तविक न्याय करने के लिए कोई भी क़ानून, जिनमें संसद द्वारा बनाए गए क़ानून भी शामिल हैं, को दरकिनार किया जा सकता है. इस शक्ति पर सिर्फ एक बंदिश थी, और वह यह कि संविधान के प्रावधानों की अनदेखी नहीं की जा सकती.

दूसरी बात, संविधान में ऐसा कहीं नहीं लिखा गया है कि सिर्फ मुख्य न्यायाधीश ही पीठों का गठन कर सकता है. हद से हद इस अधिकार को एक नियम या परंपरा में खोजा जा सकता है. लेकिन, अनुच्छेद 142 के मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट इन दोनों से भी बंधा हुआ नहीं है.

इसलिए जस्टिस चेलामेश्वर की पीठ के आदेश को रद्द नहीं किया जा सकता था. वास्तव में, 10 नवंबर का आदेश पूरी तरह से न्याय के अधिकार क्षेत्र से परे और अमान्य है. यह रूपा हुर्रा मामले में संविधान पीठ के फैसले से स्पष्ट होता है, जिसमें यह साफ तौर पर कहा गया था कि सुप्रीम कोर्ट की किसी पीठ के किसी भी फैसले को सुप्रीम कोर्ट के किसी अन्य पीठ द्वारा ख़ारिज नहीं किया जा सकता, भले ही ऐसा किसी बड़ी पीठ द्वारा ही क्यों न किया जाए.

किसी फैसले को उसी पीठ द्वारा पुनर्विचार करके या एक दोषहारी याचिका (क्यूरेटिव पिटीशन) के द्वारा, जिस पर सुनवाई तीन वरिष्ठतम जजों के साथ उन्हीं जजों के द्वारा की जा सकती है, ही ख़ारिज किया जा सकता है.

चूंकि अनुच्छेद 144 यह व्यवस्था करता है कि सिविल और न्यायिक प्राधिकारियों को कोर्ट के सहायक के तौर पर कार्य करना होगा- इसका अर्थ यह है कि दूसरी पीठों को भी किसी पीठ के फैसलों को लागू करना है- इसलिए 10 नवंबर को मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ भी चेलामेश्वर पीठ के फैसले के ख़िलाफ़ आचरण नहीं कर सकती थी.

चूंकि, यह ज़रूरत संविधान के प्रावधान के तहत लगाई गई है, इसलिए अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल इसे प्रभावहीन बनाने के औज़ार के तौर पर नहीं किया जा सकता है.

इसलिए मुख्य न्यायाधीश की पीठ द्वारा दिया गया आदेश पूरी तरह से उसके अधिकार क्षेत्र के परे और अमान्य है.

हितों का टकराव

यहां इस ओर भी ध्यान दिलाना ज़रूरी है मुख्य न्यायाधीश हितों का टकराव होने के कारण इस मामले में कोई फैसला नहीं ले सकते हैं, क्योंकि जांच में उनकी संलिप्तता की ओर भी उंगली उठ सकती है.

एफआईआर में वर्णित तथ्यों में, हालांकि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नाम का स्पष्ट तौर पर उल्लेख नहीं किया गया है, लेकिन यह ज़रूर ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जब यह साज़िश रची जा रही थी, तब मामला उनकी पीठ के सामने विचाराधीन था.

साथ ही यह भी याद रखा जाना चाहिए कि बिचौलिया बिस्वनाथ अग्रवाल ओडिशा से है और सह-अभियुक्त आईएम क़ुद्दुसी भी उड़ीसा हाईकोर्ट के भूतपूर्व जज थे, और दीपक मिश्रा का गृह राज्य भी ओडिशा है.

यह शक़ की सुई को वर्तमान मुख्य न्यायाधीश की ओर घुमाने का काम करता है. इन परिस्थितियों में हितों के टकराव के क़ानून के तहत मुनासिब यही था कि मुख्य न्यायाधीश इस रिट याचिका को हाथ न लगाएं. उन्हें इस रिट के मामले में न्यायिक ही नहीं, प्रशासनिक कार्यों से भी ख़ुद को अलग कर लेना चाहिए था.

हमें यह ज़रूर से ध्यान रखना चाहिए कि पिनोशेट मामले में हाउस ऑफ लॉर्ड्स को भी अपना एक फैसला वापस लेना पड़ा था, क्योंकि एक लॉर्ड की पत्नी का इस केस के एक पक्ष से कोई दूर का रिश्ता था.

अब आगे का रास्ता क्या है? अगर भारत के सुप्रीम कोर्ट को बचाना है, तो मेरी राय में एक सभी जजों वाली पीठ को स्थिति का आकलन करना चाहिए और इस मामले में क़ानूनी पक्ष पर पूर्वाग्रह से मुक्त होकर बुद्धिमानी के साथ विचार करना होगा.

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