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हम हीरो नहीं हैं, हम फिल्म नहीं चुनते, फिल्में हमें चुनती हैं: राजेश शर्मा

खोसला का घोंसला, नो वन किल्ड जेसिका, लव शव ते चिकन खुराना और स्पेशल 26 जैसी फिल्मों में ख़ास भूमिका निभाने वाले अभिनेता राजेश शर्मा से बातचीत.

Rajesh Sharma

फिल्म लव शव ते चिकन खुराना के एक दृश्य में अभिनेता राजेश शर्मा. (फोटो साभार: movielala.com)

अभिनेता राजेश शर्मा एक ऐसे कलाकार हैं जिन्हें आप शायद नाम से न जानते हों लेकिन बॉलीवुड में उनके काम को किसी पहचान की ज़रूरत नहीं है.

19 साल तक थियेटर में सक्रिय रहने के बाद कोलकाता का यह कलाकार बंगाली फिल्मों में आया और क्षेत्रीय सिनेमा शुरू हुआ उनका सफ़र अब बॉलीवुड में जारी है.

दिबाकर बैनर्जी की फिल्म खोसला का घोसला में ‘मुंजाल’, राजकुमार गुप्ता की फिल्म नो वन किल्ड जेसिका में ‘इंस्पेक्टर एनके’, लव शव ते चिकन खुराना में ‘टीटू मामा’, नीरज पांडेय की फिल्म स्पेशल 26 में ‘जोगिंदर’ और बीए पास फिल्म में ‘खन्ना’ का यादगार किरदार निभाकर उन्होंने दर्शकों के बीच विशेष पहचान बनाई है. उनसे बातचीत.

हाल ही में रिलीज़ हुई अपनी फिल्म गेमओवर के बारे में बताइए? इसमें क्या ख़ास है?

फिल्म गेमओवर एक कॉमेडी फिल्म हैं. थ्रिलर है. मुख्य भूमिका एक लड़की की है जिसका नाम सनाया सावित्री है. उसकी ज़िंदगी में कुछ घटनाएं हुई हैं जिसकी वजह से वह समाज के लालची लोगों को फंसाती है और उन्हें ठिकाने लगाती है.

मैं इस फिल्म में रंगीन अवस्थी नाम का किरदार निभा रहा हूं. जिसका पिता विदेश में रहता है और पत्नी गुज़र चुकी है. वह मूल रूप से एक ठरकी व्यक्ति है. वो लड़की उसके ठरकीपन का ही फायदा उठाती है.

फिल्म में मेरा किरदार कॉमेडी का ही है और फिल्म एक कॉमेडी थ्रिलर है और लोगों को लग रहा है कि ये बोल्ड फिल्म हैं, लेकिन ऐसा नहीं है.

आपने लंबे समय तक थियेटर किया है. उसके बाद आपने तमाम बंगाली फिल्मों में काम किया और फिर बॉलीवुड में आए. अपने इस सफ़र के बारे में कुछ बताइए?

फिल्मों में आने से पहले मैं थियेटर करता था. मैंने 19 साल तक थियेटर किया है. थियेटर करने के दौरान मेरे पास फिल्मों के लिए कोई वक़्त नहीं बचता था. हालांकि थियेटर में अब भी ऐसा सिस्टम नहीं बन पाया कि है आप ठीक तरीके से अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें. तो फिर फिल्मों में आना पड़ा. और बांग्ला फिल्मों से इसकी शुरुआत हुई.

हिंदी फिल्मों में शुरुआत थियेटर करने के ही दौरान हुई. एक बार हम दिल्ली में थियेटर करने गए थे वहां फिल्म निर्देशक दिबाकर बनर्जी आए हुए थे. वहां उनसे मुलाकात हुई और उन्होंने वहीं मुझे खोसला का घोंसला फिल्म का आॅफर दिया. और इस तरह खोसला का घोंसला से हिंदी फिल्मों की शुरुआत हुई.

मेरी पहली हिंदी फिल्म खोसला का घोंसला थी और दूसरी फिल्म थी परिणिता. हालांकि परिणिता पहले रिलीज़ हो गई थी लेकिन मेरी पहली खोसला का घोंसला ही थी. इससे पहले मैं बंगाली फिल्मों में काम कर चुका था. मैंने बंगाल की कई कॉमर्शियल फिल्मों में काम किया है.

आप एनएसडी से हैं? इस बारे में क्या कहेंगे?

मैं एनएसडी से नहीं हूं. मेरे बारे में आॅनलाइन माध्यमों में जो जानकारी है वो गड़बड़ है. मैं कोलकाता में ही पला-बढ़ा हूं और वहीं की थियेटर संस्था ‘रंगकर्मी’ से जुड़ा था.

मेरी पढ़ाई-लिखाई कोलकाता में हुई है और कॉलेज भी कोलकाता में रहा है. मेरी पैदाइश पंजाब के पटियाला की है बाकि रिहाइश बंगाल में हुई. मैं छोटा था तब पापा बंगाल चले आए थे.

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स्कूल में ही जो सालाना जलसा हुआ करता था तो उसमें कविता पाठ आदि किया करता था. वहीं से नाटकों के प्रति रूझान शुरू हुआ हालांकि स्कूल में मैंने एक भी नाटक नहीं किया. स्कूल से निकलकर जब कॉलेज पहुंचा तो यहां नाटकों की शुरुआत हुई.

तभी पता चला कि एक संस्था है रंगकर्मी जो निरंतर थियेटर करती है. थियेटर की तलाश में मैं था जो रंगकर्मी संस्था के साथ पूरी हुई. कलकत्ते में मैं उससे जुड़ा और रेगुलर थियेटर करने लगा. आज भी मैं कलकत्ता में ही रहता हूं.

आम तौर पर देखा ये जाता है कि बॉलीवुड में काम करने वाले अधिकांश लोग मुंबई शिफ्ट हो जाते हैं. आपने कोलकाता क्यों नहीं छोड़ा?

आज भी मैं कलकत्ता (कोलकाता) में ही रहता हूं. आपसे बात भी मैं कलकत्ता के अपने घर में बैठकर कर रहा हूं. बंबई (मुंबई) मैं सिर्फ काम के सिलसिले में जाता हूं और काम ख़त्म कर वापस कलकत्ता लौट आता हूं.

मैंने कलकत्ता इसलिए नहीं छोड़ा क्योंकि मैं मुंबई शिफ्ट नहीं करना चाहता था. मैं आपको बताऊं कि मुझे वैसा कुछ करना नहीं था, जो मुंबई में जाकर लोग करते हैं. मतलब कुछ बनने के लिए मुझे मुंबई नहीं जाना था. मैं थियेटर एक्टर था ही और धीरे-धीरे फिल्मों में मुझे काम मिलना शुरू हो गया.

मैं ज़रूरत से ज़्यादा फिल्मों में काम भी नहीं करता. हालांकि लोग मुझसे बोलते हैं कि आप हर फिल्म में नज़र आते हैं. अब ऐसा हो गया कि मैंने फिल्में की और वो एक साथ रिलीज़ हो गईं तो लगता है कि हर फिल्म में मैं ही हूं.

मगर ऐसा बिल्कुल नहीं है. मैं साल में तीन-चार फिल्में ही करता हूं. इससे ज़्यादा नहीं.

फिल्मों में आपने अलग-अलग तरह के किरदार बहुत ही प्रभावशाली तरीके से निभाए हैं. ऐसे में किसी फिल्म का चयन कैसे करते हैं?

देखिए, ऐसा कुछ नहीं है. हम लोग कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं. हम हीरो या फिर हीराइन नहीं हैं. फिल्म की जो स्क्रिप्ट होती है वो हमें चुनती है हम स्क्रिप्ट नहीं चुनते. जब फिल्म के किरदार लिखे जाते हैं तब ही तय हो जाता है कि ये किरदार फला अभिनेता कर सकता है.

उसके बाद हम जैसे कलाकारों से संपर्क किया जाता है. सौभाग्य से मेरे साथ ऐसा हुआ कि सबसे अच्छी स्क्रिप्ट के साथ मुझे काम करने का मौका मिला. मैं उन सब लोगों का आभारी हूं, चाहे वो दिबाकर बैनर्जी हों या राजकुमार गुप्ता.

इन लोगों की फिल्मों ने मुझे चुना. स्क्रिप्ट की डिमांड थी कि इस किरदार के लिए राजेश शर्मा को चुना जाए. तो इस तरह से फिल्में मुझे मिलीं और मैंने कोशिश की कि अपने किरदारों को अच्छी तरह से निभा सकूं.

फिल्म पद्मावती से जुड़े विवाद पर आप क्या कहना चाहेंगे? जो हो रहा है क्या सही हो रहा है?

पद्मावती फिल्म को लेकर मैं सिर्फ इतनी ही राय रखता हूं कि जो भी इसका विरोध कर रहे हैं यही लोग सबसे पहले फिल्म देखने जाएंगे.

थियेटर और सिनेमा के अलावा आपने टीवीएफ की वेब सीरीज़ में भी काम किया हुआ है. आजकल वेब सीरीज़ का ज़माना है और इसे दर्शक पसंद भी कर रहे हैं. क्या आपको लगता है मनोरंजन के आॅनलाइन माध्यम टीवी के लिए ख़तरा हैं?

जी नहीं. मुझे नहीं लगता कि वेब सीरीज़ से टीवी को कोई ख़तरा है. वेब सीरीज़ युवाओं के लिए हैं जो कि मोबाइल ऐप पर उपलब्ध हैं और टेलीविज़न के दर्शक अलग तरह के होते हैं.

टेलीविज़न हमेशा रहेगा. मुझे लगता है कि एक माध्यम के विकसित होने से दूसरे माध्यम को नुकसान नहीं होता. दोनों माध्यम रहेंगे. वेब सीरीज़ से टीवी को कोई नुकसान होगा, ऐसा हमें नहीं लगता.

वेब सीरीज़ में काम करने का अनुभव कैसा रहा?

वेब सीरीज़ में अनुभव अच्छा रहा. हम लोग तो काम करते हैं. काम करते हुए ये नहीं देखते कि ये वेब सीरीज़ है, ये टीवी है या ये फिल्म है. एक एक्टर अपने कैरक्टर को संजीदगी और अच्छे से निभा सके, यही हमारी कोशिश होती है.

मैं ये नहीं देखता कि ये टेलीविज़न है तो इसमें कम काम करो, फिल्म है तो इसमें ज़्यादा मेहनत से काम करो. हमारी मेहनत तो हर माध्यम में उतनी ही होती है. थियेटर में भी ऐसा ही है. तो कोई भी माध्यम हो हम कलाकार लोग उसी समर्पण से काम करते हैं.

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