राजनीति

गैर-कांग्रेसवाद के घाट पर ही होगा कांग्रेस उद्धार

कांग्रेस अब तक अगर विजयी होती रही है तो उसका कारण यही था कि वह अपने विरोधियों की मांगों को अपना लेती थी और उनके गुणों को आत्मसात कर लेती थी. जब तक वह ऐसा करती रही तब तक चलती रही और जब छोड़ दिया तो अवसान की ओर बढ़ने लगी.

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(फोटो साभार: फेसबुक/कांग्रेस)

अपनी तमाम कमजोरियों और बुराइयों के बावजूद कांग्रेस पार्टी इस देश की आवश्यकता है. इसलिए उसे पुनर्जीवित करने के बारे में राय देना इस देश के हर नागरिक का फर्ज है. भले ही कोई उस राय को माने या ना माने.

यहां तक यह फर्ज कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दे रही भाजपा का भी है क्योंकि वह भी इस देश के लिए अपना कुछ दायित्व तो मानती है और इसीलिए अभी तक यह कहने का साहस नहीं कर पाई है कि उसे विपक्षहीन लोकतंत्र चाहिए.

कांग्रेस अब तक अगर विजयी होती रही है तो उसका कारण यही था कि वह अपने विरोधियों की मांगों को अपना लेती थी और उनके गुणों को आत्मसात कर लेती थी. उसने अंतर्विरोध और बहुलता को लंबे समय तक साधा था. जब तक वह उसे साधती रही तब तक चलती रही और जब छोड़ दिया तो अवसान की ओर बढ़ने लगी.

कांग्रेस ने 1920 के दशक से लेकर 1930 और चालीस के दशक में भगत सिंह और आंबेडकर के बहाने उठी चुनौतियों को अपने भीतर आत्मसात करने की कोशिश की और वह न सिर्फ युवाओं को बल्कि दलितों को भी अपने से जोड़ सकी.

आज भले हर जगह यह बहस चले कि महात्मा गांधी ने पटेल के बजाय नेहरू को अपना उत्तराधिकारी बनाकर देश और समाज के साथ अन्याय किया लेकिन गांधी के उसी फैसले के कारण देश में न तो समाजवादियों का आसानी से उभार हो पाया और न ही कम्युनिस्टों का.

गांधी जानते थे कि देश का मिजाज समाजवादी है इसलिए देश को युवा नेतृत्व तो चाहिए ही एक ऐसा नेता भी चाहिए जो समाजवादी भाषा बोलता हो. इसी तरह पटेल की उपस्थिति दक्षिणपंथी चुनौती को भी खामोश करती थी.

देश के राजनीतिक इतिहास का यह यथार्थ है कि ज्यादातर बड़े नेता या पार्टियां कांग्रेस से निकलीं और बाद में भी कांग्रेस ने उसी समावेशी रणनीति पर चलते हुए लंबे समय तक शासन किया. सन 1967 से 1977 बीच कांग्रेस छोड़कर बाहर निकले कई नेता कांग्रेस के भीतर आते जाते रहे.

इसी ढांचे को रजनी कोठारी जैसे राजनीति शास्त्री कांग्रेस प्रणाली का नाम देते थे. इसी प्रणाली का आकर्षण था कि चौधरी चरण सिंह और के कामराज जैसे धरती पुत्र कहे जाने वाले मजबूत नेता लंबे समय तक कांग्रेस में रहे और जगजीवन राम जैसे लोकप्रिय दलित नेता और चंद्रशेखर, वीपी सिंह, चंद्रजीत यादव, बीवी मौर्य, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी, पी चिदंबरम, जीके मूपनार, तारिक अनवर, पी संगमा और शरद पवार जैसे बड़े नेता बार-बार कांग्रेस के भीतर आते जाते रहे.

कांग्रेस ने सत्तर के दशक में देश से अलग होने का नारा देने वाली द्रमुक को भी तोड़कर अन्नाद्रमुक से समझौता किया और अस्सी के दशक में 410 सीटों के प्रचंड बहुमत से जीतकर आए राजीव गांधी ने भी देश में अमन और एकता कायम करने के लिए अकाली दल, असम गण परिषद, मिजो नेशनल फ्रंट और नेशनल कांफ्रेंस जैसे छोटे दलों से समझौता किया.

कांग्रेस को गैर-काग्रेसवाद की जिन तीन धाराओं ने सर्वाधिक नुकसान पहुंचाया उनमें पहली धारा आंबेडकरवाद यानी दलितों की, दूसरी धारा मंडलवाद यानी पिछड़ी जातियों की और तीसरी धारा हिंदुत्व यानी सवर्णों की रही है. लेकिन गैर-कांग्रेसवाद का सबसे प्रभावशाली सैद्धांतीकरण करने वाले डा राम मनोहर लोहिया ही थे.

वे प्रभावशाली विपक्ष की तलाश में तो थे ही उससे भी ज्यादा भारतीय समाज की जड़ता को तोड़कर उसमें बदलाव के हिमायती थे. कांग्रेस आजादी के बाद यथास्थितिवादी पार्टी बनती जा रही थी और वह न तो समाज में समता और समृद्धि ला रही थी और न ही आवश्यक परिवर्तन. उधर डा लोहिया विपक्ष को कोई शक्ल नहीं दे पा रहे थे.

इसी से ऊब कर उन्होंने कहा था कि इस देश में जितनी बुराइयां हैं सबकी जड़ में कांग्रेस पार्टी है. एक बार तो उन्होंने इस पार्टी की तुलना शैतान से करते हुए कहा था कि जिस तरह शैतान का एक पैर आगे की ओर होता है और दूसरा पैर पीछे की ओर उसी तरह इस पार्टी की स्थिति है जो कदमताल तो करती है लेकिन कहीं बढ़ती नहीं.

अगर भाजपा के शासन के तीन साल पर यही रूपक चस्पा किया जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. वह कदमताल तो खूब कर रही है लेकिन देश कहीं बढ़ नहीं रहा है. बल्कि उन तमाम सामाजिक परिवर्तनों को पलट रही है जो इस देश ने आजादी के नब्बे साल के संघर्ष में और आजाद भारत के सत्तर वर्षों की लोकतांत्रिक उथल पुथल में हासिल किया था.

यह कहने का अर्थ यह नहीं कि कांग्रेस उन परिवर्तनों की वाहक रही है. अगर कांग्रेस उन परिवर्तनों की प्रेरक शक्ति रहती तो वे कांग्रेस के बाहर गैर-कांग्रेसवाद के झंडे तले क्यों होते. कांग्रेस उन परिवर्तनों से असहमत होते हुए भी उन पर वैसी तीखी प्रतिक्रिया नहीं जताती रही है जैसी प्रतिक्रिया जनसंघ या भाजपा की ओर से हुई.

मंडल आयोग की रपट दबाए बैठी कांग्रेस उसके लागू होने के बाद विचलित हुई और उसने दिल्ली के छात्रों के आरक्षण विरोधी आंदोलन का समर्थन भी किया लेकिन वह सोमनाथ से अयोध्या तक रथयात्रा लेकर नहीं निकली.

कांग्रेस के शीर्ष पर सवर्ण नेतृत्व अवश्य काबिज रहा है लेकिन उसने अपने दायरे में पिछड़ों और दलितों को जगह दी थी. यह बात अलग है उसने कांशीराम के शब्दों में चमचे दलित नेता पैदा किए न कि दमदार. इसीलिए कांशीराम ने पूना समझौते की स्वर्ण जयंती पर उसका तीखा विरोध करके दलितों को कांग्रेस के दायरे से बाहर निकाल दिया. जबकि बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय एक चालाक भूमिका निभाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने अल्पसंख्यकों को कांग्रेस से दूर क्षेत्रीय दलों के सुपुर्द कर दिया था.

कांग्रेस पार्टी भाजपा जैसी हिंदूवादी पार्टी नहीं हो सकती लेकिन उसके भीतर अगर पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे अज्ञेयवादी नेता रहे हैं तो पटेल, राजेंद्र प्रसाद, गोविंद बल्लभपंत और पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे हिंदूवादी छवि के नेता भी रहे हैं.

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(फोटो साभार: फेसबुक/राहुल गांधी)

जिस कांग्रेस को संघ परिवार आज ईसाइयों और मुसलमानों की पार्टी बता रहा है उसे ही कभी जिन्ना ने हिंदुओं की पार्टी बताकर मौलाना आजाद को कोसा था.

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह किस तरह से गैर-कांग्रेसवाद की आलोचनाओं का सम्यक विश्लेषण करते हुए उन तमाम पोषक तत्वों को ग्रहण करे जिसके कारण वह रोगों से लड़ने की क्षमता खो चुकी है और समाज का बड़ा हिस्सा उससे छिटक कर दूर हो गया है.

आने वाले समय में कांग्रेस के इतिहास पर और हमले होने वाले हैं. यह कांग्रेस के लिए चुनौती और संभावना दोनों है. इस हमले का जवाब देने में कांग्रेस अपनी कमजोरियों से मुक्त होने का अभ्यास कर सकती है और असत्य को ललकारने के लिए सत्य, अहिंसा और समर्पण के इतिहास का नया आख्यान रच सकती है.

कांग्रेस के इतिहास के भीतर भारतीय समाज के आधुनिकीकरण और लोकतांत्रीकरण का आख्यान है. आज कांग्रेस का कर्तव्य है कि वह आजादी के आख्यान के ऊपर सामाजिक परिवर्तन के आख्यान को आरोपित करे उन तमाम परिवर्तनों को बचाए जिन्हें इस देश ने तीन चार दशकों में बढ़ी पीड़ा के साथ हासिल किया है.

वह समन्वय ही नहीं अविरोध का आख्यान भी है. अविरोध के उसी आख्यान में भारत का भविष्य है और दुनिया का भी. कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने लड़ाई लड़ी और अपने विरोधियों से प्रतिस्पर्धा भी की लेकिन उसने अपने दुश्मन से भी नफरत करना नहीं सिखाया.

आज भारत के लोकतंत्र और अखंडता की रक्षा के लिए उसी विमर्श की जरूरत है. ताकि देश बदले, आगे बढ़े लेकिन अपनों से और अपने अतीत से बदला लेने पर आमादा ना रहे. वह विमर्श तभी पैदा हो सकता है जब कांग्रेस गैर-कांग्रेसवाद के समस्त प्रासंगिक सवालों का जवाब दे और उसका समाधान करे.

कांग्रेस के तमाम महारथियों ने यक्ष के प्रश्नों का उत्तर दिए बिना लोकतंत्र के तालाब का जल ग्रहण किया है. इसीलिए वे आज अचेत पड़े हैं. उन्हें जीवित करने का तरीका आसान नहीं है लेकिन वह निश्चित तौर पर गैर-कांग्रेसवाद के अनुत्तरित प्रश्नों के हल से गुजरता है.

यही वह तट है जहां पर कांग्रेस का उद्धार है और उससे निकलकर भारतीय लोकतंत्र की यह पौराणिक पार्टी अपना जीवन पाकर नई ऊर्जा से संचरित हो सकती है. तब उसकी आत्मा भले कांग्रेसी हो लेकिन शरीर तो गैर कांग्रेसी होगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफेसर हैं)

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