कैंपस

क्या सच में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है?

यूजीसी की एक समिति ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय का दौरा कर अपनी आॅडिट रिपोर्ट में कहा है कि यह विश्वविद्यालय ‘अलाभकारी’ और ‘अप्रभावी’ साबित होने के कगार पर पहुंच चुका है.

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी (फोटो: यूट्यूब)

इलाहाबाद यूनिवर्सिटी (फोटो: यूट्यूब)

इलाहाबाद विश्वविद्यालय अलाभकारी और अप्रभावी साबित होने के कगार पर पहुंच चुका है. तीन दिन के दौर पर आई मानव संसाधन विकास मंत्रालय (एचआरडी) की देखरेख में छह सदस्यीय समिति ने विश्वविद्यालय की मौजूदा हालत का अध्ययन कर यह निष्कर्ष दिया है.

इंडियन एक्सप्रेस की की रिपोर्ट के अनुसार, समिति की ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय पैसों की कमी, अंदरूनी राजनीति और अत्यधिक मुक़दमेबाज़ी के चलते बहुत बुरी स्थिति में पहुंच चुका है.

दरअसल कथित वित्तीय, अकादमिक और प्रशासनिक अनियमितताओं की वजह से इस केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति आरएल हंगलू मानव संसाधन विकास मंत्रालय की जांच के घेरे में हैं. हालांकि रिपोर्ट में उन्हें विश्वविद्यालय की इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार नहीं माना गया है.

रिपोर्ट में विश्वविद्यालय की दयनीय स्थिति का ज़िम्मेदार सेवानिवृत्त प्रोफेसरों के एक समूह को ठहराया गया है, जो कुलपति को काम नहीं करने देता है.

ऑडिट करने वाली टीम में बेंगलुरु के इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ साइंस के गौतम आर. देसीराजु, मणिपुर विश्वविद्यालय के प्रो. सोइबम इबोटोम्बी, कोलकाता में बोस संस्थान के प्रो. पिनाकी चक्रवर्ती, आईआईएम-संबलपुर के प्रो. महादेव जायसवाल, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रो. अमिता सिंह और सेवानिवृत्त नौकरशाह केपी पांडियन शामिल हैं.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय प्रशासन के ख़िलाफ़ तमाम शिकायतें मिलने के बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आदेश पर इस समिति का गठन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने किया है. टीम ने 13 से 15 नवंबर के बीच इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर का दौरा कर यह रिपोर्ट तैयार की है.

समिति ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में निम्नलिखित समस्याओं को रेखांकित किया है:

1. इस केंद्रीय विश्वविद्यालय पर मुक़दमों का बोझ है. वर्तमान में विश्वविद्यालय अदालत में 300 से ज्यादा मुक़दमों को लड़ रहा है, जिसमें विश्वविद्यालय का समय और संसाधन ख़र्च हो रहा है. इन मुक़दमों के पीछे का कारण विश्वविद्यालय के नियमों और अध्यादेशों के घटिया निर्धारण को बताया गया है.

2. विश्वविद्यालय में फंड की कमी से जूझ रहा है. यह विशेष तौर से ग़ैर-योजनागत फंड है जिससे कर्मचारियों की तनख़्वाह और भत्ता दिया जाता है.

3. यूजीसी की आॅडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्वविद्यालय के पास भविष्य की कोई योजना नहीं है.

4. रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार कार्यालय और वित्त कार्यालय के ख़राब प्रबंधन का भी उल्लेख किया गया है.

5. इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर में सभी समस्याओं और मुद्दों को कानून और व्यवस्था की समस्या के रूप में देखा गया. रिपोर्ट में कहा गया है कि समस्याओं को उसी तरह से ही निपटाया जाता है. रिपोर्ट का कहना है कि एक अकादमिक संस्थान में ऐसे दृष्टिकोण के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए.

6. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सेवानिवृत्त प्रोफेसरों के एक समूह द्वारा लगातार जान बूझकर कुलपति के कामों में रोड़ा अटकाया जाता है.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अलावा 10 अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालय- अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, गढ़वाल विश्वविद्यालय, जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय, झारखंड केंद्रीय विश्वविद्यालय, पॉन्डिचेरी विश्वविद्यालय, राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय, त्रिपुरा विश्वविद्यालय, मध्य प्रदेश के डॉ. हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय, वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय और लखनऊ के बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर विश्वविद्यालय में भी शैक्षिक, वित्तीय और प्रशासनिक मामलों का ऑडिट सरकार की ओर से करवाया गया है.