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2017 में ज़्यादातर देशों की जीडीपी बढ़ी, बेरोज़गारी घटी लेकिन भारत में ऐसा नहीं हुआ

2017 को एक ऐसे साल के तौर पर याद किया जाएगा, जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने ही हाथों भारी नुकसान पहुंचाया गया. इससे जीडीपी में तीव्र गिरावट आयी और पहले से ही नए रोज़गार निर्माण की ख़राब स्थिति और बदतर हुई.

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फोटो साभार: Asian Development Bank/Flickr CC BY-NC-ND 2.0

हो सकता है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके वित्त मंत्री अरुण जेटली आनेवाले समय में 2017 में राजनीतिक अर्थव्यवस्था में आए अवरोधों को एक ऐसे दुःस्वप्न के तौर पर देखें, जिससे हमेशा बचा जाना चाहिए. कई मायनों में 2017 को एक ऐसे साल के तौर पर याद किया जाएगा, जिसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने ही हाथों भारी नुकसान पहुंचाया गया, जिससे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में तीव्र गिरावट आयी और पहले से ही नए रोजगार निर्माण के मोर्चे पर जारी खराब स्थिति और बदतर हुई.

साथ ही नोटबंदी के बाद कृषि आय भी और रसातल की ओर पहुंच गई. यहां याद किया जा सकता है कि कैसे 2017 की शुरुआत में रबी के मौसम में किसानों को लगभग सभी पैदावारों के लिए 30 से 40 प्रतिशत कम मूल्य से ही संतोष करना पड़ा, जिसका कारण मंडी में नकदी की कमी थी.

कृषि आय को हुए नुकसान की राजनीतिक-आर्थिक प्रतिक्रिया सौराष्ट्र में भाजपा के 2002 से अब तक के सबसे खराब प्रदर्शन में दिखाई दी, जहां मझोले किसानों ने, जिनमें पाटीदार प्रमुख थे, काफी गुस्से के साथ वोट दिया. चुनाव प्रचार का नेतृत्व करने वाले मोदी ने अपनी पार्टी संसदीय दल के नेताओं के सामने स्वीकार किया कि ‘सिर्फ मैं यह बात जानता हूं कि इस बार गुजरात में जीत हासिल करना कितना मुश्किल था.’

लेकिन, सौराष्ट्र में भाजपा की भारी पराजय का जो कारण मोदी ने बताया, वो खुद को भरमाने के सिवा और कुछ नहीं है. उन्होंने कहा कि उनके जैसे साधारण भाजपा कार्यकर्ताओं ने 30 साल तक जाति की राजनीति को पीछे धकेलने के लिए अथक मेहनत की, लेकिन जैसा कि मोदी ने आगाह करनेवाले लहजे में कहा, गुजरात में एक बार फिर जाति सिर उठा रही है.

जो बात प्रधानमंत्री समझने के लिए तैयार नहीं हैं, भले ऐसा जानबूझकर किया जा रहा हो या किसी अन्य कारण से, वह यह है कि मझोले किसान मध्य, उत्तरी और पश्चिमी भारत के विभिन्न हिस्सों में एक समान रूप से विद्रोह का झंडा बुलंद कर रहे हैं. यह वह इलाका है, जहां 2014 में भाजपा ने लोकसभा की 90 फीसदी सीटों पर जीत दर्ज की थी.

यह बात सच है कि ये किसान मध्यवर्ती जातियों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके आधार पर वे संगठित हो रहे हैं ताकि वे अपनी आर्थिक शिकायतों को लेकर आवाज उठा सकें. महाराष्ट्र में ऐसा मराठों के बीच और पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान में जाटों के बीच भी हो रहा है.

राजस्थान में हाल ही में हुए स्थानीय चुनावों में किसानों और आर्थिक अर्थव्यवस्था के इनके सहयोगी समूहों ने गुस्से में भाजपा के खिलाफ वोट किया. 2014 के लोकसभा चुनावों में जहां भाजपा का वोट प्रतिशत करीब 56 प्रतिशत था, वहीं स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनावों में यह करीब 15 प्रतिशत घट गया. इसका परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस यहां भाजपा से कहीं ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही.

इसी तरह से हाल ही में उत्तर प्रदेश के नगर पंचायत के चुनावों में जो ग्रामीण और शहरी इलाकों के बीच की जमीन है, भाजपा को 13 प्रतिशत से कम वोट मिले. जाट किसानों के दबदबे वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आदित्यनाथ द्वारा चुने गए उम्मीदवारों को निर्दलीय और दूसरे विपक्षी उम्मीदवारों ने अच्छी शिकस्त दी.

याद कीजिए कि 2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनावों में जाट पूरी तरह भाजपा के पीछे लामबंद थे. तो क्या प्रधानमंत्री अब भी यह दलील देंगे कि गुजरात की ही तरह कई भाजपा शासित राज्यों में जाति अपना सिर उठा रही है? अगर ऐसा है, तो प्रधानमंत्री को निश्चित ही चिंता करनी चाहिए और और इस हालात की व्याख्या करने के लिए दूसरे कारणों की खोज करनी चाहिए.

तथ्य यह है कि 2017 में कृषि अर्थव्यवस्था में गिरावट देखी गई, जिसका कारण काफी हद तक नोटबंदी के कारण पड़नेवाले प्रभावों को कहा जा सकता है. दुख की बात है कि जब नवंबर, 2016 में नोटबंदी का ऐलान किया गया था तब दो लगातार सूखे के वर्ष के बाद कृषि क्षेत्र ने सुधार की तरफ छोटे-छोटे कदम बढ़ाना शुरू ही किया था.

कृषि आय में गिरावट के तौर पर इसका पूरा असर वास्तव में 2017 की पहली छमाही में दिखाई दिया. कुल मिलाकर कृषि आय में वृद्धि शून्य से कुछ ही ऊपर दिखाई दे रही है.

इसका एक कारण यह भी है कि भाजपा शासन में न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि मुद्रास्फीति से भी कम है. यह दूसरी बात है कि किसानों का एक बड़ा समूह और कई कृषि उत्पाद न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे से बाहर हैं, जिसने हालात को बदतर बना दिया है.

इसने पूरी अर्थव्यवस्था पर प्रभाव डाला और जीडीपी विकास दर घटरकर अप्रैल-जून की तिमाही में 5.7 प्रतिशत रह गई. ग्रामीण मांग में सेहतमंद सुधार की संभावना काफी कम है क्योंकि जुलाई-सितंबर की तिमाही के थोड़े से सुधरे हुए आंकड़ों में भी कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन खराब रहा.

भारत के प्रमुख सांख्यिकीविद (चीफ स्टैटिशियन) का कहना है कि जीडीपी वृद्धि में बदलाव हो सकता है, क्योंकि इसमें असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों और लाखों गैर-सूचीबद्ध छोटी कंपनियों के आंकड़े बाद में जोड़े जाएंगे.

सेंट्रल स्टैटिस्टिकल ऑर्गनाइजेशन (सीएसओ) ने यह चेतावनी दी है कि विनिर्माण क्षेत्र में 7 प्रतिशत की वृद्धि (जुलाई-सितंबर) स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध और सेबी में रजिस्टर्ड बड़ी कंपनियों के आसानी से उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित है.

Worker in a steel factory Reuters

देश के चीफ स्टैटिशियन का कहना है कि जीडीपी वृद्धि में बदलाव हो सकता है, क्योंकि इसमें असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों और लाखों गैर-सूचीबद्ध छोटी कंपनियों के आंकड़े बाद में जोड़े जाएंगे. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

मगर साथ ही इसका यह भी कहना है कि विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि की दर का आंकड़ा निकालते हुए लाखों की संख्या में मौजूद छोटी गैर-सूचीबद्ध कंपनियों को 20 प्रतिशत भार दिया जाता है, जिनका वास्तविक आंकड़ा बाद में आएगा. रिजर्व बैंक द्वारा इस क्षेत्र के लिए एक सैंपल के अध्ययन ने इसमें 50 प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दिखाई है.

यह गिरावट 2017 की पहली तिमाही में छोटी इकाइयों की बिक्री और उत्पादन में है. यह जीएसटी के लागू होने से पहले का आंकड़ा है, जिसने छोटे उद्यमों को और चोट पहुंचाने का काम किया है. यह याद रखा जाना चाहिए कि ये छोटे उद्यम भारत के निर्यात सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इसलिए यह मानना अतार्किक नहीं होगा कि जब विनिर्माण क्षेत्र के लिए अंतिम आंकड़े आएंगे, तो विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि के वर्तमान अनुमानों को कम करना पड़ सकता है.

जीडीपी आकलन के वर्तमान तरीके में एक बड़ी गलती जीएसटी से जुड़े अवरोध की वजह से पैदा हुई है. सीएसओ ने राज्यों द्वारा पेट्रोलियम पर वसूले गए वैट के एक हिस्से का इस्तेमाल सेवा क्षेत्र, जैसे-छोटे व्यापार, रेस्त्राओं और होटलों आदि की वृद्धि के सूचक के तौर पर किया है.

ऐसा इसलिए है क्योंकि छोटे व्यापारों, रेस्त्राओं और होटलों के लिए जीएसटी संग्रहण का आंकड़ा वर्तमान समय में काफी कच्चा है. इसलिए सीएसओ ने पेट्रोल/डीजल पर वैट के संग्रहण के आंकड़े के एक हिस्से का इस्तेमाल इन उद्यमों में वृद्धि का अनुमान लगाने के लिए किया है.

भारत के पूर्व चीफ स्टैटिशियन  प्रोणब सेन का कहना है कि यह पूरी तरह से गलत है क्योंकि पेट्रोलियम रिटेल टैक्स तेल कंपनियों पर लगाया जाता है, जो मूल रूप में विनिर्माण कंपनियां हैं. उनके वैट को छोटी व्यापार सेवाओं के उत्पादन का अनुमान लगाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है, जो इस वित्तीय वर्ष में नोटबंदी की मार से जूझती रही.  इसलिए किसी को यह वास्तव में नहीं पता है कि 2017-18 के लिए जीडीपी के असली आंकड़े क्या होंगे.

जीएसटी के क्रियान्वयन से पैदा हुए आर्थिक झटकों और बदइंतजामी ने उभरते हुए एशियाई और लैटिन अमेरिकी बाजारों के साथियों के बीच भारत के निर्यात को उसकी संभावना के हिसाब से प्रदर्शन करने से रोक दिया. 2017 में चीन, बांग्लादेश, वियतनाम, ताइवान और दक्षिण कोरिया ने विश्व व्यापार और उत्पादन में आए सुधार का फायदा उठाया है, लेकिन भारत इस मामले में पीछे छूट गया.

टाइम्स ऑफ इंडिया में हाल ही में प्रकाशित एक आलेख में मॉर्गन स्टैनले के इमर्जिंग मार्केट इंवेस्टमेंट के प्रमुख रुचिर शर्मा ने बताया है कि इस साल दुनिया की तीन चौथाई अर्थव्यवस्थाओं की जीडीपी में अच्छी वृद्धि देखी गई और बेरोजगारी में कमी आई. लेकिन भारत बाकी के एक चौथाई देशों में है, जिन्होंने इन दोनों क्षेत्रों में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है.

शर्मा का कहना है कि कई विकसित देशों में बेरोजगारी कई दशकों में सबसे निचले स्तर पर है. यहां तक कि चीन, ब्राजील और रूस जैसे विकासशील देश भी इस मोर्चे पर सुधार कर रहे हैं. उनका कहना है कि निर्यात के मोर्चे पर भारत के उम्मीद से कमतर प्रदर्शन का दोष मजबूत होते रुपये को नहीं दिया जा सकता है, क्योकि उभरते हुए बाजारों की दूसरी मुद्राएं भी डॉलर के मुकाबले मजबूत हुई हैं.

अंत में उत्पादन और रोजगार के क्षेत्र में दुनिया भर में हुई वृद्धि से भारत के अछूते रह जाने का एकमात्र संभव कारण नोटबंदी के झटके और जीएसटी के खराब क्रियान्वयन को माना जा सकता है. यहां यह याद किया जा सकता है कि किस तरह से मोदी और जेटली ने 2014 में यह घोषणा की थी कि भारत को छोड़कर दूसरे सभी ब्रिक्स देशों की हालत पतली है. वे हर चीज का आरोप यूपीए पर लगाया करते थे. लेकिन, इस बार लगता है पूरी कहानी बदल गई है.

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