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उत्तर प्रदेश में आकार लेता ‘मोदी वोट बैंक’!

अगर भाजपा जातियों के अंतर्विरोधों और संसाधनों में हिस्सेदारी की मार-काट को काबू में रख सकी तो जब तक मोदी का नाम चलेगा, ये वोट बैंक भी चलेगा.

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(फाइल फोटो: पीटीआई)

उत्तर प्रदेश चुनाव के रुझान सामने हैं. 403 सदस्यों की विधानसभा में भाजपा और सहयोगी दल 324 सीटों पर आगे चल रहे हैं. कांग्रेस-सपा गठबंधन 57 सीटों पर आगे है जबकि बसपा की बढ़त मात्र 19 सीटों तक सिमट गई है.

आख़िरी बार 1980 के चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में 300 सीटों का आंकड़ा पार किया था, इस बार 37 साल बाद भाजपा ने ये करिश्मा किया है. इससे पहले सिर्फ 1991 की राम लहर में ही पार्टी 200 सीटें पार करके पूर्ण बहुमत तक पहुंच सकी थी.

अगर वोट प्रतिशत की बात की जाए तो भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ लगभग-लगभग 41 प्रतिशत मतों पर खड़ी है, जबकि सपा-कांग्रेस गठबंधन लगभग 28 प्रतिशत और बसपा लगभग 22 प्रतिशत मतों पर टिकी है.

यानी लगभग आधे में भाजपा और आधे में बाकि मुख्य विपक्ष. इलाहाबाद के एक सांध्य अख़बार की हेडिंग है, ‘राम लहर से बड़ी मोदी लहर’. इस चुनाव के लिए इससे ज़्यादा मौजूं शीर्षक और कौन सा हो सकता है.

भाजपा की बढ़त का विस्तार

अगर जाति-समुदाय और क्षेत्र के संदर्भ में इस जीत को समझने की कोशिश करें तो भाजपा गठबंधन ने एक मुस्लिम समुदाय को छोड़ हर जाति और हर क्षेत्र में जीत दर्ज की है.

दलित समुदाय की बात करें तो अवध-पूर्वांचल की पासी बहुल सीटों जैसे बाराबंकी की जैदपुर और हैदरगढ़, सीतापुर की मिश्रिख, हरदोई की बालामऊ और गोपामऊ सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों को मिली जीत इशारा करती है कि पासी बिरादरी में भाजपा ने अपनी पैठ बना ली है.

यही नहीं, बसपा के सबके बड़े पासी नेता इंद्रजीत सरोज का कौशाम्बी की मंझनपुर सीट से और सपा के अवधेश प्रसाद का फैजाबाद की मिल्कीपुर सीट से, भाजपा प्रत्याशियों से चुनाव हार जाना इस धारणा को और पुख़्ता करता है.

वहीं सवर्ण मतदाताओं में पार्टी की पकड़ और मजबूत हुई है. कुशीनगर जिले की कुशीनगर, इलाहाबाद की मेजा, देवरिया की बरहज, गोंडा की मेहनौन और सुल्तानपुर की लम्भुआ जैसी ब्राह्मण बहुल सीटों पर तो भाजपा के प्रत्याशी जीते ही हैं, पर पार्टी उन ब्राह्मण बहुल सीटों पर भी जीती है जहां उसने गैर ब्राह्मण प्रत्याशी दिए थे.

जालौन की माधोगढ़, प्रतापगढ़ की विश्वनाथगंज, देवरिया और इटावा जैसी सीटों पर भाजपा गठबंधन के गैर ब्राह्मण प्रत्याशियों का जीतना इसी ओर इशारा करता है. इसी तरह ठाकुर बहुल सीटों पर भी भाजपा गठबंधन का जलवा बरकरार रहा.

New Delhi: BJP supporters and workers celebrate the party’s victory in the assembly elections with colours, at party headquarters in New Delhi on Saturday. PTI Photo by Kamal Kishore (PTI3_11_2017_000052B)

दिल्ली में शनिवार का पार्टी कार्यकर्ताओं ने मनाया भाजपा की जीत का जश्न. (फोटो: पीटीआई/कमल किशोर)

महराजगंज की सिसवा, जालौन की कालपी, चंदौली की सैय्यद रज़ा, गोंडा की तरबगंज और लखनऊ की सरोजिनीनगर सीट पर भाजपा गठबंधन की जीत इस ओर इशारा करती है कि ठाकुर मतदाता पार्टी के साथ बने रहे.

लेकिन इस जीत का सबसे बड़ा श्रेय दिया जा रहा है गैर यादव पिछड़े मतदाताओं को, जिन्होंने भाजपा को अभूतपूर्व बढ़त दी. अगर लोध, कुर्मी, शाक्य-सैनी, राजभर और निषाद बहुल सीटों पर नज़र डालें, तो परिणाम इसकी पुष्टि करते हैं.

बुलंदशहर की डिबाई, मैनपुरी की भोगांव, पीलीभीत की बरखेड़ा, अलीगढ़ की अतरौली और कन्नौज की तिर्वा जैसी लोध बहुल सीटों पर भाजपा के लोध प्रत्याशियों की बढ़त साफ़ दिखाती है कि लोध मतदाता झूमकर भाजपा के साथ चुनाव में उतरे.

यहां तक की फर्रुखाबाद की लोध बहुल भोजपुर सीट पर भाजपा के गैर लोध प्रत्याशी का जीतना और बसपा के लोध प्रत्याशी का तीसरे स्थान पर चला जाना साफ़ इशारा करता है की लोध मतों में न्यूनतम विभाजन हुआ.

बसपा का वोट बेस माने जाने वाले शाक्य-सैनी-कुशवाहा-मौर्य मतदाताओं का बसपा से टूटकर भाजपा में शामिल होने का जो सिलसिला स्वामी प्रसाद मौर्य के भाजपा में आने और केशव प्रसाद मौर्य के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद शुरू हुआ था वो अपने अंजाम तक पहुंचा.

बुंदेलखंड की ललितपुर सीट हो या पूर्वांचल में कुशीनगर की पडरौना, पश्चिमी यूपी में बिजनौर की चांदपुर हो या दोआब में फर्रुखाबाद का अमृतपुर, इन तमाम मौर्य-शाक्य-कुशवाहा-सैनी बहुल सीटों पर भाजपा प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की.

यही हाल कुर्मी बहुल इलाकों का भी रहा, फिर चाहे वो तराई में बरेली की नवाबगंज सीट हो या वाराणसी की रोहनिया, नेपाल से सटे बहराइच की नानपारा सीट हो या मध्य प्रदेश से नज़दीक पड़ते मिर्ज़ापुर की चुनार सीट.

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बनारस में मोदी की रैली का एक दृश्य. (फाइल फोटो: रॉयटर्स)

यूं कुर्मी समुदाय अन्य पार्टियों में भी बंटा रहा और उस आक्रामकता के साथ भाजपा के साथ नहीं गया जिस तरह शाक्य या लोध मतदाता गए, पर उसके एक तबके का भाजपा गठबंधन के साथ आना भी बड़ा असर छोड़ गया, हालांकि इसमें अनुप्रिया पटेल के अपना दल की भूमिका माहौल बनाने से ज्यादा नहीं रही.

नदियों से आजीविका कमाने वाले निषाद-बिंद-मल्लाह समुदाय में भी भाजपा ने ज़बरदस्त सेंधमारी की, जिसका असर परिणामों में दिखता है. पश्चिमी यूपी में आगरा की फतेहाबाद और फिरोज़ाबाद की शिकोहाबाद सीट हो, अवध में उन्नाव की सदर सीट हो, या पूर्वांचल में गोरखपुर की पिपराइच, इन तमाम निषाद बहुल सीटों पर भाजपा गठबंधन ने जीत दर्ज की.

यही नहीं, गोरखपुर ग्रामीण जैसी सीट पर, जहां निषादों का वोट 80 हज़ार के करीब माना जाता है और जहां निषाद पार्टी के अध्यक्ष संजय निषाद मुकाबले में थे, वहां भी भाजपा की जीत साफ़ इशारा करती है कि निषाद समुदाय भाजपा के करीब आया है.

गाज़ीपुर-मऊ-बलिया के इलाके में अच्छी संख्या रखने वाले राजभर समुदाय में भी भाजपा ने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर अपनी पहुंच बनाई.

यहां तक की यादव बहुल इलाकों में भी भाजपा का विजय रथ नहीं रुका. बुंदेलखंड की बबेरू, बबीना और गरौंठा हों या पश्चिमी यूपी में बदायूं की गुन्नौर, पूर्वांचल में आज़मगढ़ की फूलपुर पवाई सीट हो या सपाई गढ़ एटा की अलीगंज सीट, यादवों का मत भाजपा को भी मिलता दिखा है, वरना अरुण कुमार यादव और अजित उर्फ़ राजू यादव जैसे भाजपा उम्मीदवारों को बढ़त नहीं मिलती.

साथ ही साथ सहारनपुर की गंगोह, गौतमबुधनगर की दादरी, और हापुड़ की गढ़ मुक्तेश्वर जैसी गुर्जर बहुल सीटों पर भी पार्टी का प्रदर्शन साफ़ करता है कि गुर्जरों ने भी भाजपा का साथ दिया है.

इसके अलावा, जिस जाट मत के रालोद में जाने की बात की जा रही थी उसका बड़ा हिस्सा भाजपा में ही गया है, जिसका सुबूत मथुरा में छाता, आगरा में फतेहपुर सिकरी के अलावा बिजनौर, बुलंदशहर और मुज़फ्फरनगर जिलों के जाट बहुल इलाकों में भाजपा प्रत्याशियों को मिली भारी बढ़त में दिखता है.

यही नहीं, जाटों की मूल पार्टी होने का दावा करने वाली रालोद सिर्फ़ एक सीट तक सिमट गई, जिससे जाहिर होता है कि जाटों का बंटवारा रोकने के लिए अमित शाह द्वारा किए गए प्रयास कारगर साबित हुए.

सभी जातियों-क्षेत्रों में फैले भाजपा गठबंधन के इस व्यापक जनाधार का कारण क्या है? मात्र मैनेजमेंट से इस गोलबंदी को खड़ा नहीं किया जा सकता. फिर क्या ये हिंदू मतों का ध्रुवीकरण है? या विकास के लिए तड़पते और जाति-परिवार की राजनीति से ऊबे सामान्य जनमानस का परिवर्तन के लिए आह्वान?

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(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

देखा जाए तो ऊपर बताए दोनों ही कारणों ने इस गोलबंदी को आकार लेने में मदद की है. लेकिन इन तमाम समुदायों को एक वोटबैंक के रूप में जोड़ने का काम निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्रांड और उनके नाम से उपजी उम्मीद ने किया है, जिसमें अभी भी सामान्य जनमानस की आस्था है.

शायद इसीलिए उन्होंने नोटबंदी के दौर में हुई तकलीफों को हंसते-हंसते सहा, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि आने वाले दिनों में उन्हें इसका सिला मिलेगा या इससे एक बेहतर भारत बनेगा, जैसा कि प्रधानमंत्री ने दावा किया.

शायद इसीलिए उन्होंने भाजपा के बाहरी, कमज़ोर और ‘डमी’ उम्मीदवारों को भी जिताया, क्योंकि उनकी नज़र प्रदेश नेतृत्व पर नहीं, बल्कि केंद्र के शीर्ष नेतृत्व पर थी. परंपरागत वफ़ादारियों के दायरों को तोड़कर खड़ा होता ये नया वोट बैंक, ‘मोदी वोट बैंक’ है, जिसने 2014 में आकार लिया और अब इसे और ज्यादा मज़बूती मिली है.

अगर भाजपा जातियों के अंतर्विरोधों और संसाधनों में हिस्सेदारी की मार-काट को काबू में रख सकी तो जब तक मोदी का नाम चलेगा, ये वोट बैंक भी चलेगा.

ऐसे में, ये कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश के मौजूदा जनादेश के मूल में परिवर्तन की एक प्रचंड चाह जरूर है. ये परिवर्तन किस दिशा में जाएगा, कहना मश्किल है. एक भी मुस्लिम उम्मीदवार न लड़ाकर तीन चौथाई बहुमत पाने वाली पार्टी अगर इसे हिंदुत्व के पक्ष में आया जनादेश मानेगी, तो प्रदेश में आने वाले दिनों में सांप्रदायिक विद्वेष और बढ़ेगा.

पिछले पांच वर्षों में रिकॉर्ड दंगों को झेलने वाला उत्तर प्रदेश आने वाले दिनों में भी सांप्रदायिक हिंसा की आग में जलेगा. लेकिन यदि भाजपा नेतृत्व इसे जनोन्मुखी विकास के लिए मिला जनमत मानेगी, तो शायद प्रदेश की तस्वीर को कुछ और खूबसूरत बनाने का काम हो और समस्याओं से कराहते प्रदेश की जनता को कुछ सुकून मिले.