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क्यों झारखंड में आदिवासी ‘पत्थलगड़ी’ आंदोलन कर रहे हैं?

ग्राउंड रिपोर्ट: झारखंड के कई आदिवासी इलाकों में इन दिनों पत्थलगड़ी की मुहिम छिड़ी है. ग्रामसभाओं में आदिवासी गोलबंद हो रहे हैं और पत्थलगड़ी के माध्यम से स्वशासन की मांग कर रहे हैं.

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झारखंड के खूंटी के आदिवासी इलाकों में जगह-जगह पत्थलगड़ी दिखेंगे. यह जिलिंगा ग्रामसभा का फैसला है. (फोटो: नीरज सिन्हा/ द वायर)

झारखंड में बिरसा मुंडा की धरती खूंटी और आसपास के कुछ खास आदिवासी इलाके इन दिनों सुर्खियों में है. कई गांवों में आदिवासी, पत्थलगड़ी कर ‘अपना शासन, अपनी हुकूमत’ की मुनादी कर रहे हैं.

ग्राम सभाएं कई किस्म का फरमान तक जारी करने लगी है. इनके अलावा कई गांवों में पुलिस वालों को घंटों बंधक बना लिए जाने की कई घटनाएं सामने आई हैं.

इन हालात में पुलिस की कार्रवाई भी जारी है. दर्जन भर ग्राम प्रधानों, आदिवासी महासभा के नेताओं और उनके सहयोगियों को अलग- अलग तारीखों में गिरफ्तार कर जेल भेजा गया है.

इन कार्रवाईयों के बीच 25 फरवरी को खूंटी के कोचांग समेत छह गांवों में पत्थलगड़ी कर आदिवासियों ने अपनी कथित हुकूमत की हुंकार भरी. हालांकि मौके की नजाकत भांपते हुए प्रशासन-पुलिस ने इन कार्यक्रमों में प्रत्यक्ष-परोक्ष दखल नहीं डाला.

इसके तीन दिन बाद यानी 28 फरवरी को खूंटी जिला मुख्यालय में आयोजित बीजेपी के कार्यकर्ता सम्मेलन में शिरकत करने पहुंचे मुख्यमंत्री रघुबर दास भी पलटवार करने से नहीं चूके. मुख्यमंत्री ने कहा है कि पत्थलगड़ी की आड़ में देश विरोधी शक्तियां सक्रिय हैं. इन्हें सरकार कुचल कर रख देगी.

मुख्यमंत्री ने यह भी कहाः पत्थलगड़ी झारखंड की परंपरा है, लेकिन विकास के काम रोकने तथा भोलेभाले आदिवासियों को बरगलाने के लिए नहीं. वे कहते हैं कि इन्हीं शक्तियों ने भगवान बिरसा को अंग्रेजों के हाथों पकड़वाया था.

जाहिर है नए परिदृश्य में सरकार के तल्ख तेवर को आदिवासी महासभा और ग्राम सभाओं से जुड़े लोग परखने में जुटे हैं.

पत्थलगड़ीः परंपरा और मौजूदा स्वरूप

आदिवासी समुदाय और गांवों में विधि-विधान/संस्कार के साथ पत्थलगड़ी (बड़ा शिलालेख गाड़ने) की परंपरा पुरानी है. इनमें मौजा, सीमाना, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी रहती है. वंशावली, पुरखे तथा मरनी (मृत व्यक्ति) की याद संजोए रखने के लिए भी पत्थलगड़ी की जाती है. कई जगहों पर अंग्रेजों–दुश्मनों के खिलाफ लड़कर शहीद होने वाले वीर सूपतों के सम्मान में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है.

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कोचांग गांव में परंपरागत हथियारों के साथ पत्थलगड़ी कार्यक्रम में शरीक हुए ग्रामीण. (फोटो: नीरज सिन्हा/ द वायर)

दूसरी तरफ ग्रामसभा द्वारा पत्थलगड़ी में जिन दावों का उल्लेख किया जा रहा है, उसे लेकर सवाल उठने लगे हैं. दरअसल पत्थलगड़ी के जरिए दावे किए जा रहे हैं किः

  • आदिवासियों के स्वशासन व नियंत्रण क्षेत्र में गैररूढ़ि प्रथा के व्यक्तियों के मौलिक अधिकार लागू नहीं है. लिहाजा इन इलाकों में उनका स्वंतत्र भ्रमण, रोजगार-कारोबार करना या बस जाना, पूर्णतः प्रतिबंध है.
  • पांचवी अनुसूची क्षेत्रों में संसद या विधानमंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है.
  •  अनुच्छेद 15 (पारा 1-5) के तहत एसे लोगों जिनके गांव में आने से यहां की सुशासन शक्ति भंग होने की संभावना है, तो उनका आना-जाना, घूमना-फिरना वर्जित है.
  • वोटर कार्ड और आधार कार्ड आदिवासी विरोधी दस्तावेज हैं तथा आदिवासी लोग भारत देश के मालिक हैं, आम आदमी या नागरिक नहीं.
  • संविधान के अनुच्छेद 13 (3) क के तहत रूढ़ि और प्रथा ही विधि का बल यानी संविधान की शक्ति है.

आदिवासी महासभा से जुड़े युसूफ पूर्ति कहते हैं कि सरकार पत्थलगड़ी को गलत ठहराने में जुटी है, इससे हमें गुरेज है. दरअसल सरकार, सामान्य कानून को आदिवासी क्षेत्रों में लाकर हमारे हितों की अनदेखी कर रही है. जबकि आदिवासी ग्राम सभा के जरिए स्वशासन चाहते हैं. इसलिए दबाव और रोक के बावजूद पत्थलगड़ी कार्यक्रम आगे बढ़ रहा है.

पूर्ति का जोर इस बात पर भी है कि आदिवासियों की इजाजत के बिना किसी भी कानून में संशोधन नहीं हो सकता और ना ही नया कानून बन सकता.

इस बीच आदिवासी महासभा से जुड़े शंकर महली ने मीडिया से कहा है कि आदिवासी महासभा एक विचारधारा है और पत्थलगड़ी एक रूढ़िवादी व्यवस्था. इसके जरिए गांव के लोगों को स्वशासन के लिए जागरूक किया जा रहा है.

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25 फरवरी को खूंटी जिले के कोचांग गांव में पत्थलगड़ी कार्यक्रम में शामिल ग्रामीण. (फोटो: नीरज सिन्हा/ द वायर)

महली कहते हैं इस मुद्दे पर वे लोग सरकार से बात करने को तैयार हैं लेकिन जेल भेजे गए उनके लोगों को पहले छोड़ना पड़ेगा.

सुलगने की कई वजहें!

झारखंड की राजधानी रांची से करीब बीस किलोमीटर के फासले पर आदिवासी बहुल और नक्सल प्रभावित खूंटी जिले की सीमा शुरू होती है.

जंगल-पहाड़ और आदिवासियों के गांव. मेहनतकश लोग. दूर-दूर तक पेड़ों पर लदे पलाश के टस-टस लाल फूल और कुसुम–साल के खिलते हरे पत्ते. इन इलाकों में जाएं तो जेहन में इसी धरती के बिरसा मुंडा की वीरगाथा भी आएगी जो महज 25 साल की उम्र में शहीद हुए थे.

खूंटी- मुरहू मार्ग पर कुछ आदिवासी युवाओं से पत्थलगड़ी पर चर्चा की तो उनका जवाब लगभग टालने जैसा थाः ‘कई गांवों से पत्थलगड़ी की खबरें तो आती रही है. बाकी उन लोगों से ही पूछना होगा’.

थोड़ा और कुरेदने पर सायनो मुंडा तस्वीर लेने से मना करते हुए कहते हैं कि आप तह में जाएंगे तो जमीन की सुरक्षा और विकास के सवाल भी इस मसले से जुड़े नजर आएंगे. जल, जंगल, जमीन ही हमारी जिंदगी है. लेकिन जमीन की सुरक्षा के लिए आदिवासी आवाज उठाते हैं तो उन पर गोलियां चलाई जाती है. पूरा राज्य जानता है कि साल 2016 में 22 अक्तूबर को सैको गांव का एक आदिवासी रांची की रैली में भाग लेने के लिए निकला तो पुलिस की गोलियों से मारा गया.

सायनो बताने लगे कि यहां के आदिवासियों को इसकी आशंका है कि सरकार अंग्रेज जमाने में बनी छोटानागपुर काश्तकारी कानून में संशोधन कर उनकी जमीन छीनने की कोशिश में जुटी है. तभी तो बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू के लोग भी कई मौके पर सरकार और बीजेपी के रुख पर नाराजगी जताते रहे हैं.

लेकिन उस कानून में संशोधन को लेकर फिलहाल सरकार पीछे हटी है, यह बताने पर सायनो का जवाब थाः सरकार की नीयत और नीतियों पर लोगों का भरोसा नहीं टिक रहा.

गौरतलब है कि साल 2016 में सरकार छोटानागपुर काश्तकारी कानून में संशोधन करने में लगी थी. पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर विरोध हुआ था.

हालांकि जिला का दर्जा हासिल होने के बाद खूंटी ने तरक्की भी की है. खुद सरकार के ग्रामीण विकास मंत्री इसी जिले से आते हैं. बड़े पैमाने पर सरकारी योजनाएं चल रही हैं. दर्जनों भवन- पुल बने हैं.

इन बातों पर युवा रीगा मुंडा कहते हैं कि शहर से दूर जाइए, हकीकत सामने होगी. ये पलाश के फूल, कुसुम, साल, बेर- इमली के पेड़ों के बीच से बेबसी, गरीबी, भूख, रोजगार, दिहाड़ी की पीड़ा कहीं ज्यादा झांकती नजर आएगी. योजनाओं के नाम पर अफसर-इंजीनियर, ठेकेदार-बिचौलिए के कथित साठगांठ ने आदिवासी इलाके को लूटने का काम किया है.

इसी सिलसिले में अड़की, खूंटी, बंदगांव के कई गांवों को करीब से देखने-सुनने पर एक बात साफ तौर पर रेखांकित होती रही कि विकास के तमाम दावे और योजनाओं की लंबी फेहरिश्त के बाद भी बड़ी आबादी रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, सिंचाई, बिजली की मुकम्मल सुविधा से वंचित है.

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कोचांग गांव के पत्थलगड़ी कार्यक्रम के दौरान स्वागत के लिए तीर धनुष के साथ खड़ी महिलाएं.(फोटो: नीरज सिन्हा/ द वायर)

लोग नदी-चुंआ का पानी पीने को विवश हैं. दिहाड़ी खटकर बमुश्किल पेट भर सके, तो एक अदद घर के लिए वे तरसते हैं. हताशा-निराशा के स्वर सुनाई पड़ते हैं.

बिंदा इलाके के पास एक बुजुर्ग एतवा मुंडा स्थानीय लहजे में कहते हैं कि कथित अफसरशाही और भ्रष्टाचार लोगों को परेशान करता है. सरकारें, गांवों में कम से कम पीने और खेती के लिए तो पानी पहुंचाती. इसलिए अब आदिवासी ग्राम सभा के माध्यम से अपना शासन चाहते हैं.

एतवा के सवाल भी है कि क्या यही दिन देखने के लिए अलग राज्य की लड़ाई लड़ी गई थी.

साके गांव के रंजीत सोय गांवों की दशा देख बेहद खफा हैं. इस गांव में एक भी शौचालय नहीं है. लोगों की तकलीफ है कि इंदिरा आवास के लिए सरकारी बाबुओं को पूर्व में दिए गए सभी दरख्वास्त ना जाने कहा गुम हो गए. सिर्फ तीन लोगों को आवास योजना का लाभ मिला है. कच्चे मकान में आंगनबाडी केंद्र, स्कूल चलता है.

पहले से थी तैयारियां

पता चला कि कोचांग के अलावा जिन पांच गांवों- सिंजुड़ी, बहंबा, साके, तुसूंगा और कोकेकोरा में 25 फरवरी की पत्थलगड़ी की गई थी, उसकी तैयारियां पहले से और रणनीति के साथ चल रही थी.

तभी तो चाईबासा, पूर्वी सिंहभूम, सरायकेला और दूसरे राज्यों से भी लोग यहां पहुंचे थे. अभी कुछ और गांवों में भी पत्थलगड़ी की तैयारियां चल रही है.

अलबत्ता इन दिनों कई गांवों में ‘अबुआ धरती, अबुआ राज ( अपनी धरती, अपना राज) अब चलेगा ग्राम सभा का राज’ जैसे नारे गूंजते हैं. हालांकि इन गांवों में किसी के आने-जाने पर सीधी रोक तो नहीं पर अनजान व्यक्ति को टोका जरूर जाता है. तीर-कमान से लैस युवक, हर गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं.

वैसे पत्थलगड़ी को लेकर कई ग्राम प्रधान मुंह नहीं खोलना चाहते जबकि दर्जनों ग्राम प्रधानों को पत्थलगड़ी का यह स्वरूप उचित नहीं लग रहा. उनका पक्ष है कि सरकारी योजना-कार्यक्रम का लाभ नहीं लेंगे तो विकास की बात बेमानी होगी. पंचायतों को भी जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी.

बारूबेड़ा इलाके के एक बुजुर्ग सुखराम मुंडा को इसकी नाराजगी है कि दूसरी जगहों से आकर लोग यहां के आदिवासियों को भरमाने में लगे हैं. जबकि कम पढ़े-लिखे लोग हक अधिकार की बात पर गलत-सही का फर्क नहीं कर पाते.

रांची में पढ़ रहे खूंटी के एक युवा मनोहर मुंडा का कहना है कि सिस्टम में सुधार के लिए दबाव बनाना चाहिए ना कि सिस्टम को सिरे से खारिज करने का.

वे कहते हैं कि राज्य की ट्राइबल एडवाइजरी काउंसिल को इस मसले पर हस्तक्षेप करने की जरूरत है. क्योंकि टकराव बढ़ने से परिस्थितियां बिगड़ती चली जाएगी.

पुलिस से टकराव

गौरतलब है कि साल 2016 में 25 अगस्त को खूंटी के कांकी में ग्रामीणों ने पुलिस के कई आला अफसरों और जवानों को तेरह घंटे तक बंधक बना लिया था. तब रांची रेंज के डीआइजी और खूंटी के उपायुक्त हस्तक्षेप करने पहुंचे थे. दरअसल इस गांव के लोगों ने एक बैरियर लगाया था, जिसे पुलिस ने तोड़ दिया था.

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2016 के अगस्त महीने में खूंटी के कांकी गांव में ग्रामीणों ने तेरह घंटे पुलिस को बंधक बना लिया था तब डीआइजी, डीसी उन्हें समझाने पहुंचे थे.(फोटो: नीरज सिन्हा/ द वायर)

ताजा घटना इस साल 21 फरवरी की है, जब अड़की के कुरूंगा गांव में पारंपरिक हथियारों से लैस ग्रामीणों ने कई घंटे तक पुलिस के जवानों को रोके रखा. जिले के उपायुक्त और पुलिस अधीक्षक मौके पर जाकर समझाना पड़ा.

इधर 28 फरवरी को अड़की के कुरंगा में ग्रामीणों ने नक्सलियों के खिलाफ सर्च अभियान करने निकले सीआरपीएफ के जवानों को रोकने की कोशिशें की.
लिहाजा पूर्व में दर्ज मुकदमों को लेकर 20 फरवरी को खूंटी पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेजा है.

इनमें चामड़ी गांव के प्रधान मंगल मुंडा और और कोनवा गांव के निवासी विल्सेंट सोय मुरूम शामिल हैं. जबकि 11 फरवरी को आदिवासी महासभा के महासचिव कृष्णा हांसदा को गिरफ्तार किया गया था.

व्याख्या पर छिड़ी है बहस

पत्थलगड़ी को लेकर झारखंड की सियासत गरमाने के साथ आदिवासी समुदाय में बहस भी छिड़ चुकी है.

आदिवासी बुद्धिजीवी मंच के अध्यक्ष तथा आदिवासी विषयों के खासे जानकार प्रेमचंद मुर्मू कहते हैं कि वाकई पत्थलगड़ी झारखंडी परंपरा है लेकिन जिस तरह से संवैधानिक धारा-उपधारा की व्याख्या की जा रही है, वह गलत है. जाहिर है आदिवासी महासभा, भोलेभाले लोगों को बरगलाने का काम कर रही है.

मुर्मू का कहना है कि पत्थलगड़ी कार्यक्रमों में ब्रिटिश काल के जीओआइ एक्ट 1935 (गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट) की वकालत की जा रही है जिसे आजादी के बाद देश के संविधान में निरस्त किया गया है.

मुर्मू कहते हैं कि सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल जरूर खड़े किए जाने चाहिए लेकिन बाहर के लोगों का गांव में प्रवेश वर्जित बताना, पुलिस वालों को जब-तब बंधक बनाना ठीक नहीं है. जबकि संविधान की धारा 19 (डी) देश के किसी भी हिस्से में किसी नागरिक को घूमने की स्वतंत्रता देता है.

वे बताते हैं कि अनूसूचित क्षेत्रों में माझी-परगना, मानकी-मुंडा, डोकलो सोहोर, पड़हा जैसी रूढ़िवादी व्यवस्था तो अब भी कायम हैं.

मुर्मू दो टूक कहते हैः अगर पांचवी अनुसूची के तहत पेसा कानून (पंचायत राज एक्सटेंशन टू शिड्यूल एरिया एक्ट, 1996) को लागू करने में सरकार की मंशा ठीक होती तो शायद ये परिस्थितियां नहीं बनती और नक्सली समस्याओं से भी नहीं जूझना पड़ता. पेसा कानून में ग्रामसभाओं को कई शक्तियां दी गई है. जिसकी अनदेखी की गई.

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खूंटी के पोसया गांव में ग्राम सभा के लोग बच्चों को स्कूल भेजने के बजाय खुद पढ़ाते हुए. (फोटो साभार: विनोद शर्मा)

आदिवासी सरना धर्म समाज के संयोजक लक्ष्मी नारायण मुंडा कहते हैं कि ग्रामसभा सशक्त हों, यह बेहद जरूरी है लेकिन पत्थलगड़ी में कई बिंदुओं की चर्चा प्रासंगिक नहीं लगती. बाहर के लोगों का गांव में प्रवेश वर्जित बताने, शासन-प्रशासन से टकराव बढ़ाने के बजाय हक अधिकार लेने के लिए एकजुट होकर आवाज बुलंद करने की जरूरत है. क्योंकि भाषा, संस्कृति के साथ हमारी जमीन खतरे में है. सरकारी खजाने के करोड़ों-अरबों खर्च होने के बाद भी दूरदराज इलाकों में आदिवासियों की मुश्किलें कायम हैं.

जारी हो रहे ग्राम सभादेश

इधर पत्थलगड़ी के साथ कई ग्रामप्रधान मुहर लगा पत्र सरकारी दफ्तरों में भेजकर यह सूचित कर रहे हैं कि जाति, आवासीय, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र अब उनके द्वारा जारी किए जा रहे हैं. इनके अलावा ट्राइबल सब प्लान के फंड ग्रामसभा को देने तथा कथित जनविरोधी नीतियों को तत्काल खत्म करने पर जोर दिया जा रहा है.

खूंटी जिले की एक महिला डिप्टी कलक्टर नाम नहीं जाहिर करने के साथ बताती हैं कि ग्राम सभाओं के द्वारा इस तरह के पत्र भेजे जाने से ग्रामीणों के बीच संशय की स्थिति पैदा होने लगी है. सरकारी कर्मचारी गांव जाने से भय खाने लगे हैं. क्योंकि कई ग्राम सभा सरकारी योजना में शामिल नहीं होने तथा बच्चों को सरकारी स्कूल नहीं भेजे जाने का आह्वान करने लगी है.

खूंटी के चामड़ी, बरबंदा, भंडरा, कुदाटोली, सिलादोन पंचायत के कई स्कूलों में इसका असर भी देखा जा सकता है. सरकारी स्कूल भवनों की जर्जर हालत, शिक्षकों की कमी पर गुस्सा है. लिहाजा ग्रामसभा के सदस्य बच्चों को खुद पढ़ाने में जुटे हैं.

उपायुक्त सूरज कुमार ने हाल ही में खूंटी जिले की जिम्मेदारी संभाली है. इन हालात पर उनकी नजर बनी है.

उनका कहना है कि विकास योजनाओं तथा कल्याण कार्यक्रमों को वे अंतिम पायदान तक ले जाने की कोशिश करेंगे. इसके साथ सामाजिक स्तर पर जागरूकता बेहद जरूरी है, क्योंकि संविधान और कानूनों की गलत व्याख्या से भ्रम की स्थिति बनती है. इसलिए बहुत जल्दी ही वे एक कार्यक्रम करने जा रहे हैं, ताकि पत्थलगड़ी के जरिए जो बातें सामने लाई जा रही है, उसकी हकीकतों पर स्पष्ट किया जा सके. इस कार्यक्रम में वे ग्रामप्रधानों को भी आने का न्योता देंगे.

इधर, झारखंड विकास मोरचा के केंद्रीय महासचिव और पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने पत्थलगड़ी के खिलाफ होने वाली कार्रवाईयों का विरोध करते हुए पंद्रह मार्च को राजभवन मार्च का ऐलान किया है.

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खूंटी के कोचांग गांव का पत्थर, जिस पर अपना शासन होने का कानून-कायदा दर्ज है. .(फोटो: नीरज सिन्हा/ द वायर)

उनका जोर है कि पांचवी अनुसूची वाले क्षेत्रों में स्थानीय भाषा, संस्कृति को जानने वाले अफसरों-कर्मचारियों को तैनात करना चाहिए.

जबकि नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन का कहना है कि तल्खी दिखाने के बजाय इस मुद्दे को सरकार गंभीरता से सुलझाए क्योंकि पत्थलगड़ी आदिवासियों की परंपरा है. शासन- प्रशासन इसे दूसरे रूप में पेश नहीं करे.

वहीं, पूर्व आइपीएस अधिकारी और कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव अरुण उरांव कहते हैं कि राज्य के कई जिलों में हो रही पत्थलगड़ी के पीछे लोगों की भावना समझनी होगी. इसके लिए सरकार को आगे आना होगा.

अरुण उरांव का कहना है कि सरकार ये दावा करती रही है कि ग्रामीणों की सहमति से योजना तय होती है लेकिन विरोध की जो तस्वीरें सामने है उसके संकेत यही हैं कि गांवों में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और इससे नाराज लोग गोलबंद होने लगे हैं.

उनका कहना है कि पत्थरों पर जानकारी लिखे जाने का इतिहास है. 1996 में खूंटी के कर्रा में बीडी शर्मा और बंदी उरांव समेत स्थानीय नेताओं ने पत्थलगड़ी की थी और इसके माध्यम से पेसा कानून के बारे में लिखा गया था.

जबकि इसी महीने खूंटी और अड़की में दो सरकारी कार्यक्रमों में शामिल खूंटी के विधायक और राज्य के ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा ने कहा था कि ग्राम प्रधानों को अपने अधिकार और ताकत को पहचानना होगा, क्योंकि तीन सालों में हर मुखिया के खाते में विकास योजना के 50-50 लाख डाले गए हैं. ग्राम सभा और ग्राम प्रधान को अधिकार है कि वे मुखिया से पैसे और काम का हिसाब लें. साथ ही विकास योजनाओं पर ग्रामीण नजर रखें तथा उसे पूरा करने में सहयोग करें.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और झारखंड में रहते हैं.)

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