लद्दाख में सीमाओं का नया ख़ाका: मुस्लिम बहुल ज़िलों का दायरा घटा, वन्यजीवों को लेकर चिंता

केंद्र सरकार ने लद्दाख में ज़िलों की संख्या दो से बढ़ाकर सात करने का फैसला किया है, जिससे प्रतिनिधित्व, सामाजिक संतुलन और पर्यावरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं. नए बंटवारे में मुस्लिम आबादी दो ज़िलों तक सिमट सकती है, जबकि बौद्ध समुदाय पांच में बहुमत में रहेगा. विशेषज्ञों ने इसे विभाजन और केंद्रीकरण बढ़ाने वाला कदम बताया है.

लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना (बीच में) कारगिल में एक बाज़ार के दौरे के दौरान. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: लद्दाख की प्रशासनिक सीमाओं के पुनर्निर्धारण से मुस्लिम बहुल आबादी अब केवल दो जिलों तक सीमित हो जाएगी, जबकि दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले बौद्ध समुदाय शेष पांच जिलों में बहुमत में होंगे.

केंद्रशासित प्रदेश के ज़िलों की संख्या दो से बढ़ाकर सात करने का फ़ैसला, जिसकी घोषणा सबसे पहले 2024 में की गई थी, ने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर ‘जेरीमैंडरिंग’ (gerrymandering – चुनावी फ़ायदे के लिए सीमाओं में हेरफेर) के आरोप को जन्म दिया है. यह सरकार 2019 में लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाने के अपने फ़ैसले से भड़की आग को बुझाने के लिए संघर्ष कर रही है.

इन अटकलों के बीच कि नए जिले काराकोरम वन्यजीव अभयारण्य और चांगथांग वन्यजीव अभयारण्य के कुछ हिस्सों को प्रभावित कर सकते हैं, इस निर्णय ने उन चरवाहा समुदायों की आजीविका को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है, जो सदियों से हिमालयी क्षेत्र में अपने पशु चराते रहे हैं.

मंगलवार (28 अप्रैल) को केंद्र सरकार द्वारा जारी एक राजपत्र अधिसूचना के अनुसार, लद्दाख के मुस्लिम-बहुल ज़िलों कारगिल (80) और द्रास (19) में कुल 99 गांव शामिल होंगे, जबकि बौद्ध-बहुसंख्यक ज़िलों शाम (27), चांगथांग (24), नुब्रा (30), लेह (44) और ज़ांस्कर (26) में कुल 151 गांव शामिल होंगे.

2011 की जनगणना के अनुसार, लद्दाख की कुल आबादी लगभग 2.7 लाख है, जिसमें 46.40% मुसलमान हैं, जबकि 39.65% के साथ बौद्ध दूसरा सबसे बड़ा धार्मिक समूह हैं.

इससे पहले लद्दाख में केवल दो जिले थे – कम आबादी वाला लेह (लगभग 1.3 लाख) और कारगिल (लगभग 1.4 लाख), जैसा कि 2011 की जनगणना में दर्ज है.

नुब्रा, शाम और चांगथांग को लेह ज़िले से अलग करके बनाया गया है, जबकि ज़ांस्कर और द्रास को कारगिल ज़िले से अलग करके बनाया गया है.

एक बयान में लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने इस ‘ऐतिहासिक’ फैसले को केंद्र शासित प्रदेश में समावेशी विकास का नया दौर शुरू करने वाला बताया. उन्होंने कहा कि इससे लोगों के दरवाज़े तक सेवाओं की प्रभावी और कुशल पहुंच सुनिश्चित होगी.

उन्होंने कहा, ‘यह बदलाव भारत सरकार की उस प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो लद्दाख की अपार संभावनाओं को साकार करने और संतुलित, समावेशी तथा सतत विकास सुनिश्चित करने की दिशा में है.’

‘लद्दाखी समाज का विखंडन’

हालांकि, सिद्दीक वहिद, जो लद्दाख के एक जाने-माने शिक्षाविद और कश्मीर में इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के पूर्व कुलपति हैं, ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में केंद्र शासित प्रदेश की पूरी बनावट के बारे में साफ़-साफ़ कुछ नहीं बताया गया है, और उन्होंने इसे ‘एक बड़ी कमी’ बताया.

उन्होंने कहा, ‘इससे लोगों में डर से लेकर संदेह तक की प्रतिक्रियाएं पैदा हुई हैं.’ वहीद के अनुसार, यह फैसला पिछले पांच वर्षों में बनी लद्दाखी समाज की एकता को तोड़ सकता है.

उन्होंने कहा, ‘यह बौद्ध और मुस्लिम समुदायों के बीच की एकता को भी तोड़ सकता है, क्योंकि ज़िलों के नए बंटवारे की बारीकियों से पता चलता है कि लद्दाख के मुस्लिम सात नए ज़िलों में से पांच में अल्पसंख्यक बन गए हैं. इस तरह, लद्दाख की आवाज़ के तौर पर उनका प्रतिनिधित्व दो-तिहाई से भी कम रह जाएगी – यह एक साफ़ तौर पर अलोकतांत्रिक व्यवस्था है, क्योंकि लद्दाख में बौद्धों और मुसलमानों की आबादी लगभग बराबर बंटी हुई है, जिसमें मुसलमानों की आबादी थोड़ी ज़्यादा है.’

स्टाफ़ के बिना ‘बेकार’

चेरिंग दोरजे लक़रुक, जो ‘लेह एपेक्स बॉडी’ के सह-अध्यक्ष हैं – और जो ‘कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस’ (केडीए) के साथ मिलकर सालों से लद्दाख में लोकतंत्र की बहाली के लिए आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं – ने कहा कि केंद्र सरकार ‘पुरानी शराब को नई बोतल में बेचने’ की कोशिश कर रही है.

उन्होंने कहा, ‘यह एक राजनीतिक चाल है जिसका मकसद लद्दाख के लोगों के एक तबके को खुश करना है, ताकि राज्य का दर्जा और ‘छठी अनुसूची’ जैसी हमारी मुख्य मांगों को कमज़ोर किया जा सके. यह लद्दाख के लोगों की व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक चिंताओं को दूर नहीं करता है.’

राजपत्र अधिसूचना जारी होने के बाद पांच नए डिप्टी कमिश्नरों और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षकों को नए ज़िलों में नागरिक और पुलिस प्रशासन की कमान संभालने का आदेश दिया गया. इनमें से ज़्यादातर नए नियुक्त अधिकारियों को ये नई पोस्टिंग ‘अतिरिक्त प्रभार’ (एडिशनल चार्ज) के तौर पर मिली हैं.

लक़रुक, जो लद्दाख बौद्ध संघ के अध्यक्ष भी हैं, ने कहा कि कि ये नियुक्तियां तब तक ‘बेकार’ हैं, जब तक प्रशासन द्वारा नए ज़िलों में दूसरे सरकारी विभागों के प्रमुखों की भी नियुक्ति नहीं कर दी जाती. उन्होंने कहा, ‘जब तक इन ज़िलों में और स्टाफ़ तैनात नहीं किया जाता – जिससे प्रशासन की अपनी गणना के अनुसार 850 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा – तब तक यह एक बेकार की कवायद है.’

वन्यजीव

नए ज़िलों की घोषणा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लद्दाख दौरे से दो दिन पहले और काराकोरम तथा चांगथांग वन्यजीव अभयारण्यों की सीमाओं को ‘तर्कसंगत’ (rationalise) बनाने के लिए शुरू की गई एक डी-नोटिफ़िकेशन प्रक्रिया के चार साल बाद की गई है.

करीब 9,000 वर्ग किलोमीटर में फैले ये अभयारण्य दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों का घर हैं.

2022 में केंद्र सरकार ने भारतीय वन्यजीव संस्थान को इन अभयारण्यों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण के लिए ‘उच्च संरक्षण मूल्य’ वाले क्षेत्रों की पहचान करने को कहा था, जो कथित तौर पर 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद की आंतरिक सिफारिश पर आधारित था.

पर्यावरणविदों को चिंता है कि नए ज़िलों के बनने से आम लोगों और सेना की मौजूदगी बढ़ेगी, अनियंत्रित पर्यटन गतिविधियां बढ़ेंगी, और लद्दाख के नाज़ुक इकोसिस्टम को खतरा पैदा होगा. लद्दाख ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के मोर्चे पर सबसे आगे है.

हालांकि, एक अधिकारी ने द वायर से कहा कि नए जिलों से प्रशासन को बिजली, पानी और फोन जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी, ताकि लोग वास्तविक नियंत्रण रेखा के दूसरी ओर चीन की गतिविधियों का मुकाबला कर सकें.

किसकी बात सुनी जाएगी?

वहीद का कहना है कि यह अभी स्पष्ट नहीं है कि नए ज़िले बनने से लोगों तक प्रशासनिक सेवाएं कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचा पाएंगे.

उन्होंने कहा, ‘यह एक सही निष्कर्ष लग सकता है. हालांकि, यह नए ज़िलों को बनाने की पूरी प्रक्रिया के ढांचे पर निर्भर करेगा. यहां मुख्य बात यह होगी कि लद्दाख के लोगों को उन कानूनों को बनाने में किस हद तक अपनी बात रखने का मौका मिलेगा, जिनके तहत उन पर शासन किया जाएगा – खासकर ज़मीन के अधिकार, स्थानीय रोज़गार, संसाधनों के प्रबंधन और सांस्कृतिक स्वायत्तता से जुड़े मामलों में.’

केडीए के कार्यकारी सदस्य साजिद हुसैन ने कहा कि नए ज़िलों के बनने से लद्दाख पर ‘अफ़सरशाही का एक और शिकंजा कस जाएगा.’ उन्होंने कहा कि यह छठी अनुसूची तथा राज्य के दर्जे की मांग को कमजोर करने का प्रयास है.

लक़रुक ने कहा कि क्षेत्रीय आकांक्षाएं वास्तविक हैं और भौगोलिक कठिनाइयों के कारण लोग लंबे समय से परेशान हैं. उन्होंने जांस्कर का उदाहरण दिया, जिसका मुख्यालय पदुम कारगिल से लगभग 240 किमी दूर है और सर्दियों के मौसम में यह पूरी तरह से कट जाता है.

वहिद ने कहा कि नए ज़िलों को बनाने की इस प्रक्रिया का मकसद यह माना गया है कि इससे सीमित संसाधनों, पैसों और राजनीतिक ताक़त का विकेंद्रीकरण होगा. लेकिन, एक ‘केंद्र शासित प्रदेश’ के ढांचे में संसाधनों और पैसों पर केंद्र सरकार का ही नियंत्रण होता है. इससे असली राजनीतिक ताक़त नई दिल्ली में ही सिमटकर रह जाती है. इस तरह, यह प्रक्रिया विकेंद्रीकरण के ठीक उलट काम करती है.

लक़रुक ने कहा, ‘लद्दाख के लोग लंबे समय से सुरक्षा उपायों की मांग कर रहे हैं, लेकिन इस घोषणा में ऐसा कुछ नहीं है. सरकार को चाहिए कि वह लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची का दर्जा देने पर फैसला करे, बजाय इसके कि पुराने ढांचे को नए रूप में पेश करे.’

(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)