प्रासंगिक

सत्यभक्त: हिंदी नवजागरण के अलबेले सेनानी

जन्मदिन विशेष: डाॅ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि अगर भारत में किसी एक व्यक्ति को कम्युनिस्ट पार्टी का संस्थापक होने का श्रेय दिया जा सकता है तो वे सत्यभक्त ही हैं.

(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)

(फोटो साभार: विकिमीडिया कॉमन्स)

वर्ष 1897 में दो अप्रैल को यानी आज के ही दिन राजस्थान के भरतपुर जिले में जन्मे सत्यभक्त हिंदी नवजागरण के ऐसे इकलौते अलबेले सेनानी थे, जिन्होंने कतई कोई यशाकांक्षा नहीं पाली.

स्वाभाविक ही, उसकी तृप्ति की ऐसी जुगतों में उनकी दिलचस्पी का सवाल ही पैदा नहीं होता था, जिससे खासी लंबी उम्र पाने वाली उनकी रात-दिन की रचनात्मक सक्रियता व्यक्तिगत आभाओं के आकाश में ‘ऊंचा आसन’ बना सके.

दूसरे शब्दों में कहें तो अपने व्यक्तिगत अवदानों को लेकर अलग से जाने-पहचाने जाने को लेकर वे कतई उत्सुक नहीं रहे और हर स्तर पर आत्मविज्ञापनों से परे रहकर खुद को सामान्य देशसेवक ही समझते रहे.

इसीलिए आज कम ही लोग जानते हैं कि एक सितंबर, 1924 को भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की सर्वप्रथम स्थापना और दिसंबर, 1925 में कानपुर में उसका पहला सम्मेलन उन्होंने ही किया. वो भी एक सामान्य लेखक/पत्रकार के रूप में.

डाॅ. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि अगर भारत में किसी एक व्यक्ति को कम्युनिस्ट पार्टी का संस्थापक होने का श्रेय दिया जा सकता है तो वे सत्यभक्त ही हैं. यह और बात है कि अंग्रेजी में उपलब्ध तथ्यों व तर्कों को ही प्रामाणिक मानने वालों को एमएन राय व जेडए अहमद के दावों के बरक्स डाॅ. शर्मा के इस कथन को स्वीकारने में बहुत दिक्कत पेश आती है.

यों, उनकी इस दिक्कत में भी इस सिलसिले से जुड़ी दो मूल चिंतनधाराओं का द्वंद्व देखा जा सकता है. सत्यभक्त चाहते थे कि पार्टी का नाम ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ हो, भारतीय परिस्थितियों के मुताबिक उसका अलग स्वरूप हो और वह किसी सुदूर स्थित देश से संचालित पार्टी की शाखा भर न हो.

इसके विपरीत एमएन राय ‘भारत की कम्युनिस्ट पार्टी’ के पक्ष में थे. राधामोहन गोकुल, रमाशंकर अवस्थी व गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे व्यक्तित्वों के साथ अपने विचारों, भावों व कार्यों से भारतीय परंपराओं की आधुनिक, प्रगतिशील व तार्किक व्याख्या, जड़ परम्पराओं को तोड़कर नई की रचना व भारतीय परिवेश में साम्यवाद के अपेक्षित स्वरूप की तलाश में लगे सत्यभक्त इस निश्चित मत के थे कि भारत के समय व समाज को बदलने में सबसे कारगर साम्यवाद ही है.

वैचारिक दृष्टि से चंद्रशेखर आजाद व सरदार भगत सिंह के बहुत निकट रहे सत्यभक्त का जन्म 02 अप्रैल, 1897 को राजस्थान के भरतपुर में हुआ. उनके पिता कुन्दनलाल वहां की रियासत द्वारा संचालित मिडिल स्कूल में प्रधानाध्यापक थे और कलकत्ता (अब कोलकाता) से प्रकाशित ‘भारत मित्र’ साप्ताहिक मंगाते थे.

होश संभालते ही सत्यभक्त भी उसे पढ़ने लगे और उसकी सामग्री व संस्कारों से प्रभावित होने लगे. खुदीराम बोस, वारीन्द्र घोष और अरविंद घोष जैसे क्रांतिकारियों के कारनामों से उन्हें इस साप्ताहिक ने ही परिचित कराया. आगे चलकर राधामोहन गोकुल के साप्ताहिक ‘सत्य सनातन धर्म’ के क्रांतिकारी विचारों ने भी उन्हें दिशा दिखाई.

गणेश शंकर विद्यार्थी के ‘प्रताप’ के तो वे पहले अंक से ही पाठक थे. क्रांतिकारी विचारों के आवेग में 1912-13 में निहायत अनाड़ीपन से एक विस्फोट का परीक्षण करते हुए सत्यभक्त अपनी एक उंगली का काफी बड़ा हिस्सा उड़ा बैठे थे. ब्रजभाषा के कविरत्न सत्यनारायण ने उन्हें सृजन की ओर प्रवृत्त किया तो बनारसीदास चतुर्वेदी से परिचय भी कराया.

सत्यभक्त की खुद की बात मानें तो सखाराम गणेश देउस्कर की ‘देशेर कथा’, बंकिमचंद्र के ‘आनंदमठ’ और एक अन्य पुस्तक ‘जापान का उदय’ आदि के अध्ययन ने उनकी चेतना का सबसे ज्यादा विस्तार किया.

1916 में हरिद्वार कुंभ में भारत सेवक समिति के स्वयंसेवक बनकर गये तो उन्हें महात्मा गांधी से मिलने और जुड़ने का अवसर मिला. तब साबरमती आश्रम नहीं बना था और उसे अहमदाबाद के एलिस पुल से एक मील दूर स्थित एक गांव के पास किराये के मकान से संचालित किया जाता था.

सत्यभक्त ने वहां जाकर पानी भरने से लेकर चक्की पीसने तक के काम किए, श्रम व सादगी के संस्कार लिए और बंगला व गुजराती भाषाएं सीखीं.

वहीं उन्होंने गांधी जी की ‘सर्वोदय’ व ‘जेल के अनुभव’ का हिंदी अनुवाद किया और काका कालेलकर, आचार्य विनोबा भावे व महादेव देसाई आदि गांधीवादियों के संपर्क में आये. गांधी जी चाहते थे कि सत्यभक्त स्थायी रूप से आश्रम में रहें, लेकिन सत्यभक्त के उनके अहिंसा के सिद्धांत से पूरी तरह सहमत न होने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका. इसके बावजूद उन्होंने माता कस्तूरबा का स्नेह पाया, 1918 से 1920 तक कुछ महीने वहां रहे और कांग्रेस के बंबई अधिवेशन में भी गये.

1916 से उन्होंने लिखना शुरू किया और पहला लेख धोंडो केशव कर्वे के जीवन पर लिखा. बाद में अनेक महापुरुषों व स्त्रियों के जीवन चरित्रों पर काम किया.

‘स्त्रीदर्पण’, ‘सरस्वती’, ‘मर्यादा’, ‘हितकारिणी’, ‘ललिता’ और ‘प्रतिभा’ जैसी अपने समय की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने उनके लेखों को सिर आंखों पर लिया. पंडित सुंदरलाल के ‘भविष्य’ से जुड़े तो पंडित जवाहरलाल नेहरू, पुरुषोत्तमदास और विजयलक्ष्मी पंडित से भी उनका रब्त-जब्त हुआ.

1921 में कृष्णकांत मालवीय की ‘मर्यादा’ के बाद राष्ट्रीय ग्रंथमाला निकाल रहे थे तो असहयोग आंदोलन की घोषणा हुई और सब कुछ छोड़कर उसमें कूद पड़े. लेकिन जल्दी ही कांग्रेसी राजनीति से उनका मन खिन्न हो गया और वे राजस्थान सेवा संघ में चले गये.

यों, स्थिरता व निश्चित व्यवस्था तो उनके जीवन में कभी नहीं रही. नागपुर प्रवास के दौरान उन्होंने आठ महीनों तक ‘प्रणवीर’ का संपादन किया और उसका बहुचर्चित पूर्ण स्वाधीनता अंक निकाला.

कम्युनिज्म यानी साम्यवाद के प्रचार-प्रसार के क्रम में उन्होंने 1924 में ‘बोल्शेविज्म क्या है’ शीर्षक पुस्तक लिखी और कहा कि देश में साम्यवादी पार्टी की स्थापना के प्रयत्नों में विदेश के अंधानुकरण अथवा लकीर की फकीरी से काम नहीं चलने वाला.

एक जनवरी, 1926 को उन्होंने कानपुर से ‘साम्यवादी’ का प्रकाशन शुरू किया तो गोरी सरकार ने उसके दोनों शुरुआती अंक जब्त कर लिए. जब्ती की इस कार्रवाई में सत्यभक्त से खफा कुछ कांग्रेसियों ने भी भूमिका निभाई. फिर तो उनकी ‘अगले सात साल’ पुस्तक भी जब्त होने से नहीं बची.

1928 में सतीदास मूंधड़ा से मिलकर उन्होंने मुम्बई से ‘प्रणवीर’ निकाला, लेकिन आठ-दस महीने बाद ही दयनीय आर्थिक हालत में पहुंच जाने के कारण उसे भी बंद करना पड़ा. 1929 में वे इलाहाबाद आकर रामरिख सहगल के संचालन में निकल रहे ‘चांद’ में काम करने लगे और उसके संपादक भी बने.

‘सतयुग’ के प्रकाशन में लगे थे कि उनके जीवन में वह क्षण आ खड़ा हुआ, जब नितांत विपरीत परिस्थितियों के बीच किये जा रहे संघर्षों के पारिवारिक व सामाजिक उपेक्षा के रूप में मिल रहे सिले ने उन्हें लगभग तोड़कर रख दिया.

1941 में वे मथुरा स्थित गायत्री तपोभूमि के ‘अखंड ज्योति’ आश्रम पहुंचे, पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य से मिले और 1955 में ‘हारे को हरिनाम’ की तर्ज पर वहीं धूनी रमा ली. वहां जीवन निर्वाह के लिए वे संस्थान के विभिन्न प्रकाशनों का संपादकीय दायित्व तो निभाते ही थे, श्रीराम शर्मा के लिए प्रेतलेखन करने को भी अभिशप्त थे.

ऐसी दारुण परिस्थितियों में भी वे नब्बे साल की उम्र तक सक्रिय रहे. आश्रम में रहते हुए उन्होंने 32 पन्नों व 40 पैसे मूल्य वाली कोई एक सौ जीवनियां लिखीं. इनके लेखन के लिए उनकी चुनी विभूतियों में राणा प्रताप, लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी, तिलक, कस्तूरबा, अवंतिकाबाई, राधामोहन गोकुल, राजा महेंद्र प्रताप, शहीद-ए-आजम भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, नारायण प्रसाद अरोड़ा और गोल्डा मायर आदि शामिल थीं.

उन्होंने राधामोहन गोकुल को केंद्र में रखकर 1857 से 1947 तक का स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास भी लिखा.

अपने बेहद दुःखदायी आखिरी दिनों में भी सत्यभक्त की वैचारिक दृढ़ता अकम्प थी. ऐसी कि अखंड ज्योति आश्रम में रहते हुए भी उन्होंने उसके अनिवार्य प्रार्थना व आरती उपक्रम में कभी हिस्सा नहीं लिया और साम्यवाद में अपनी आस्था को किंचित भी विचलित नहीं होने दिया.

यह और बात है कि उनकी इस आस्था के कई अंतर्विरोध भी थे, जो उनकी भारतीयता को आध्यात्मिकता तक ले जाते थे. उनके साठ साल पूरे होने पर कुछ लोगों ने एक समारोह का आयोजन करना चाहा तो उन्होंने यह कहकर उन्हें निराश कर दिया था कि वे ऐसे समारोह के लिए उपयुक्त नहीं हैं. उन्होंने खुद को सामान्य देशसेवक से ज्यादा कुछ नहीं माना.

वहीं अखंड ज्योति आश्रम में ही तीन दिसंबर, 1985 को उनका देहांत हो गया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और फ़ैज़ाबाद में रहते हैं.)

Comments