समाज

अगर समाज में आलोचना सहन करने की क्षमता कम हो जाएगी तो इसका असर संगीत पर भी पड़ेगा: अनुष्का शंकर

मशहूर सितार वादक पंडित रविशंकर की बेटी अनुष्का शंकर ख़ुद भी एक सफल सितारवादक और संगीतकार हैं. भारतीय मूल की अनुष्का लंदन में पैदा हुईं और तीन अलग-अलग महाद्वीपों में पली-बढ़ीं. अलग-अलग संस्कृतियों में हुई इस परवरिश पर वे कहती हैं, ‘इन मिली-जुली संस्कृतियों के बगैर मैं वो नहीं होती जो मैं हूं- मेरा पासपोर्ट महज़ कागज़ का टुकड़ा है.’

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अनुष्का शंकर (फोटो साभार: अनुष्का शंकर डॉट कॉम/Harper Smith/Deutsche Grammophon)

भारत में हाल के सालों में गद्य, कविता, कला के कई आयामों, यहां तक कि इतिहास भी राजनीतिक धमकियों का शिकार हुए. एक कलाकार के बतौर क्या आपको लगता है कि इससे संगीत के क्षेत्र में आपकी स्वतंत्रता और सृजनशीलता प्रभावित हुई है?

जिस तरह से एक हद तक पूरी आज़ादी से बोलने की हमारी क्षमता कम हुई है, उसका असर अभिव्यक्ति के बाकी माध्यमों पर तो पड़ेगा ही. वाद्य संगीत पर अभी इतनी जल्दी इसका असर देखने को नहीं मिलेगा पर अगर समाज का विपरीत विचारों या आलोचना को सहन करने का सामर्थ्य सीमित हो जाएगा, तब इसका असर संगीत सहित अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर पड़ेगा.

पश्चिम के कलाकार की इस वक़्त चल रहे नस्लवाद और अप्रवासियों के प्रति नफ़रत भरे माहौल पर किस तरह की प्रतिक्रिया है?

उनकी प्रतिक्रिया काफ़ी अच्छी है. मैं ख़ुद को भी उसी गिनती में रखती हूं. मैं सरकार को पत्र लिखती हूं, दोस्तों को कॉल करती हूं, उनसे उनके नाम पिटीशन में जुड़वाती हूं. मैं जुलूसों में हिस्सा लेती हूं. मैं संगीत बनाती हूं, मैं फायदे का हिस्सा भी बनती हूं.

मुझे लगता है कि यह नागरिक होने का स्वाभाविक अधिकार है कि जब ज़रूरत पड़े तब आवाज़ उठाई जाए. चुप रहना ख़तरनाक है. अगर किसी की आवाज़ जनता तक पहुंचती है तो उसे इस्तेमाल करते रहना बहुत ज़रूरी है.

हमारी समृद्ध परंपराओं को बचाए रखने के लिए कलाकार क्या कर सकते हैं?

मेरा अनुभव तो यही कहता है कि अगर आप किसी परंपरा को जिंदा रखना चाहते हैं तो उसे ज़िंदा बनाए रखिए. अगर कोई परंपरा अतीत का हिस्सा बन जाती है तो इसके ख़ुद-ब-ख़ुद ख़त्म होने का ख़तरा बढ़ जाता है. यह आज में जी रहे लोगों के लिए प्रासंगिक नहीं रह जाती, एक अवशेष बन जाती है जिसे किसी म्यूजियम में सहेजा जाएगा.

कला कुछ ऐसी होती है कि जिसे आप बंद दरवाज़ों से निकालकर अपनी ज़िंदगी में प्रयोग करते हैं, उसे प्यार करते हैं- कुछ उस तरह जैसे आपकी कोई पसंदीदा चीज़, जिसे आप डिब्बे में बंद करके रखने की बजाय रोज़ इस्तेमाल करते हैं.

मेरे लिए कला को बचाए रखने का यही तरीका है कि इसे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों के सामने लाइए, जिससे यह उनके लिए अजनबी न रह जाए, वे इससे घबराए नहीं. ज़रूरत है कि कला को किसी जीवित परंपरा की तरह फलने-फूलने, सांस लेने के अवसर दिए जाएं, जिससे यह बढ़ती रहे और आने वाली पीढ़ियों से अपने आप जुड़ती रहे.

पंडित रविशंकर, विलायत खान और अब्दुल हलीम जफ़र खान जैसे आला सितारवादक अब नहीं हैं. ऐसे में सारी उम्मीदों का बोझ आपकी पीढ़ी पर है. क्या लगता है कि इस परंपरा को यह पीढ़ी कैसे आगे बढ़ा रही है?

मैं इसे इस तरह नहीं देखती. ‘उम्मीदों का बोझ’ जैसे शब्द किसी परंपरा के लिए प्रयोग करना दिखाता है कि यह कोई बहुत बड़ी चीज़ है. इस तरह के नकारात्मक नज़रिये से इसे देखेंगे तो परफॉर्म करना ही मुश्किल हो जाएगा. कोई यह कैसे कर पाएगा?

मेरे लिए संगीत प्रेम से उपजता है, जुड़ाव से आता है. खुशी और खुले दिल से अपनाने से बढ़ता है. अगर कोई उनके जैसे सितार बजाना चाहता है तो उसे उस जगह तक पहुंचने के बारे में सोचना होगा, जहां वे लोग थे, न कि उनकी परछाई बनने के बारे में. वहीं अगर श्रोता अच्छा संगीत सुनना चाहते हैं तो उन्हें नए, युवा संगीतकारों को सकारात्मकता से लेना होगा.

हां, हो सकता है कि ये आप पर किसी ‘बोझ’ जैसा नहीं है पर ये परंपरा आपको विरासत में मिली है और आप इसे आगे बढ़ा रही हैं.

आप सही हैं कि यह विरासत में मिली परंपरा है और हम इसे आगे बढ़ा रहे हैं. हां, हम इसे कैसे आगे बढ़ा रहे हैं, यह एक ज़रूरी सवाल है. हम में से कोई भी इस पूरी पीढ़ी का प्रतिनिधि नहीं है. हम अलग-अलग लोग हैं जो अलग-अलग संगीत वर्गों और घरानों से आते हैं. हम सभी के अपने-अपने तरीके हैं- हमारी जगह कोई दूसरा होगा तो वो शायद इसे बिल्कुल दूसरी तरह से करेगा.

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पिता पंडित रविशंकर के साथ अनुष्का (फाइल फोटो) (साभार : अनुष्का शंकर डॉट कॉम)

क्या इन परंपराओं को आगे ले जाने के लिए पर्याप्त युवा संगीतकार आगे आ रहे हैं?

ये संगीतकारों की संख्या के बारे में नहीं होता, शास्त्रीय संगीत को किस तरह का समर्थन मिलता है, कितना आगे बढ़ने का मौका मिलता है, कैसी शिक्षा है, कैसी फंडिंग हो रही है ये सब बातें भी मायने रखती हैं.

हम पर लगातार अपने संगीत को बाज़ार के लिए तैयार करने का दबाव रहता है, इसी ‘न्यू वेव’ के चलते संगीतकार सिर्फ अपने लिए दूसरे संगीतकारों के साथ साझेदारी करते हैं या फ्यूज़न बनाते हैं. ऐसा नहीं है कि फ्यूज़न या इस तरह साझेदारी ग़लत है. मुझे ऐसा फ्यूज़न और मिला-जुला संगीत बहुत पसंद है.

मैं ख़ुद भी ऐसा करती हूं. लेकिन अब ऐसी मांग की जाती है कि शास्त्रीय संगीतकार ऐसा करें, जिससे उन्हें मंच पर आने के ज़्यादा मौके मिलें, एक्सपोज़र मिले, नई साझेदारी की ब्रांडिंग का मौका मिले. पर इससे शुद्ध शास्त्रीय संगीत को उसकी अपनी पहचान बनाए रखने का अवसर नहीं मिलता. यही मेरी चिंता है.

ऐसे बड़े शो में यूं ही किन्हीं दो लोगों को चुनकर उनसे साथ में परफॉर्म करवाया जाता है, भले ही दोनों कितने ही प्रतिभाशाली हों पर उनमें से किसी को अपना एक अलग स्पेस नहीं मिलता. इस तरह बाज़ार का संगीत पर हावी होना हिंदुस्तान में किसी बीमारी की तरह फ़ैल रहा है. इससे संगीत को मिलने वाला समर्थन कम होता है.

क्या इससे आपके संगीत के एक्सपेरिमेंट खासकर फ्यूज़न पर कोई असर पड़ा है?

मुझे इस तरह संगीत के क्रॉस-ओवर (विभिन्न तरह के संगीत के मेल) पर काम करते हुए 12 साल हो चुके हैं. यह तब उतना प्रचलित नहीं था जितना अब है. उस वक़्त शास्त्रीय संगीतकार इस तरह का काम नहीं करते थे पर मैंने अपना पूरा करिअर इसी बात को समझाने में लगा दिया कि आप अपनी जड़ों से जुड़े रहकर भी नई चीज़ों के साथ प्रयोग कर सकते हैं, इससे उनकी विशिष्टता पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

मेरे पिता इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं. शुरुआत से ही वे इसके अगुआ थे. उस समय नई चीज़ों का प्रयोग करने के लिए उनकी आलोचना भी हुई. कलाकारों को ऐसे जोखिम उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए, इसी तरह तो कला विकसित होती है, ज़िंदा रहती है. मैं ख़ुद इसे ‘फ्यूज़न’ का नाम नहीं देती. मैं प्रोजेक्ट विशेष के आधार पर इसे नाम देती हूं.

मेरी लेटेस्ट एलबम ‘लैंड ऑफ गोल्ड’ (2016) इसी तरह की एक एक्सपेरिमेंटल एलबम है, जिसमें भारतीय शास्त्रीय संगीत और वेस्टर्न क्लासिकल म्यूज़िक का जुगलबंदी है. इसमें एक तरह का सिनेमाई अप्रोच है, जिस तरह मेरी ज़िंदगी कई संस्कृतियों की मिली-जुली है, उसी तरह इसमें कई तरह के वाद्यों को साथ में प्रयोग किया गया है. वैसे मैं सरहदों के परे जाने में विश्वास रखती हूं.

घर, बच्चों और करिअर के बीच तालमेल बिठाना मुश्किल होता होगा?

मुश्किल तो होता है. मैं ख़ुशनसीब हूं कि मेरे पास इतना सपोर्टिंग परिवार है. मेरी सास और मां बच्चों की देखभाल में मेरी मदद करती हैं. पहले के मुकाबले मैं अब कम टूर पर जाती हूं. घर पर बने स्टूडियो की वजह से मैं बिना घर छोड़े अपना काम कर सकती हूं.

अपनी ये नई एलबम ‘होम’ मैंने अपने घर में ही रिकॉर्ड की हैं. मेरे पति (मशहूर हॉलीवुड निर्देशक जो राइट) भी अपनी फिल्में यहीं एडिट करते हैं. उन्होंने मेरे पिछले एलबम प्रोड्यूस किए थे, मैंने उनकी फिल्म ‘अन्ना कैरेनीना’ में उनकी मदद की. इस तरह घर का ये रचनात्मक माहौल हमारे साथ-साथ बच्चों के लिए भी अच्छा है.

 

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