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सीबीएसई की किताब में भाजपा सांप्रदायिक पार्टी, गोधरा कांड के समय मोदी ने नहीं निभाया राजधर्म

शायद मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को सीबीएसई के पाठ्यक्रम की सही जानकारी नहीं है तभी वो आपातकाल के पाठ को पाठ्यक्रम में शामिल करवाने की बात कर रहे हैं. दरअसल, सीबीएसई की 12वीं कक्षा की किताब ‘स्वतंत्र भारत में राजनीति’ में आपातकाल, 1984 के दंगों, बाबरी ध्वंस, गोधरा कांड और हिंदुत्व की विस्तार से व्याख्या की गई है.

Modi NCERT collage

विपक्ष भले ही भाजपा पर शिक्षा के भगवाकरण का आरोप लगाता हो, लेकिन मोदी सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के पास केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) के स्कूलों की पुस्तकों को पढ़ने तक की फुरसत नहीं है. 12वीं कक्षा में पढ़ाई जा रही राजनीति विज्ञान की पुस्तक में भाजपा को असहज करने वाली सामग्री की भरमार है.

‘स्वतंत्र भारत में राजनीति’ नामक इस पुस्तक में भाजपा को न सिर्फ सांप्रदायिक पार्टी बताया गया है, बल्कि गुजरात में 2002 के दंगों के समय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राजधर्म नहीं निभाने का भी जिक्र है. यही नहीं, इसमें अयोध्या में विवादित ढांचे को ध्वस्त करने में पार्टी की भूमिका पर प्रश्नचिह्न खड़े किए गए हैं.

‘द वायर’ की इस सामग्री पर नजर मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के आपातकाल के पाठ को सीबीएसई के पाठ्यक्रम में शामिल करने के ऐलान के बाद पड़ी. जावड़ेकर ने यह घोषणा 26 जून को जयपुर में आपातकाल की 43वीं बरसी पर आयोजित ‘काला दिवस’ कार्यक्रम में कही. गौरतलब है कि भाजपा ने यह कार्यक्रम देशभर में आयोजित किया था.

जावड़ेकर ने जयपुर में कहा, ‘हम चाहते हैं कि विद्यार्थी सही इतिहास के बारे में जानें और इसलिए हम स्कूलों में पाठ्यक्रम बदलने के लिए काम कर रहे हैं. इस पहल के साथ विद्यार्थियों को समझ में आएगा कि आपातकाल को दूसरा स्वतंत्रता संघर्ष क्यों माना जाता है. हमने यह तय किया है कि हम पाठ्यक्रम में बदलाव कर आपातकाल की सत्यता के बारे में विद्यार्थियों को भी बताएंगे, ताकि इतिहास की सही व्याख्या हो सके.’

हैरत की बात यह है कि आपातकाल का पाठ पहले से ही सीबीएसई के पाठ्यक्रम में शामिल है. ऐसे में उनकी घोषणा का कोई औचित्य नहीं है, लेकिन इस बहाने यदि मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर सीबीएसई की 12वीं कक्षा में पढ़ाई जा रही राजनीति विज्ञान की पुस्तक पढ़ लें तो उनकी त्यौरियां चढ़ना तय है.

‘स्वतंत्र भारत में राजनीति’ पुस्तक के 9वें अध्याय में भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी बताया गया है. इसमें लिखा है, ‘भाजपा को 1980 और 1984 के चुनावों में खास सफलता नहीं मिली. 1986 के बाद इस पार्टी ने अपनी विचारधारा में हिंदु राष्ट्रवाद के तत्त्वों पर जोर देना शुरू किया. भाजपा ने हिंदुत्व की राजनीति का रास्ता चुना और हिंदुओं को लामबंद करने की रणनीति अपनायी.’

भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति के मूल की चर्चा करते हुए पुस्तक में लिखा है, ‘हिंदुत्व शब्द को वीडी सावरकर ने गढ़ा था और इसको परिभाषित करते हुए उन्होंने इसे भारतीयता और उनके शब्दों में हिंदू राष्ट्र की बुनियाद बताया. उनके कहने का आशय यह था कि भारत राष्ट्र का नागरिक वही हो सकता है, जो भारतभूमि को न सिर्फ पितृभूमि बल्कि अपनी ‘पुण्यभूमि’ भी स्वीकार करे. हिंदुत्व के समर्थकों का तर्क है कि मजबूत राष्ट्र सिर्फ एकीकृत राष्ट्रीय संस्कृति की बुनियाद पर ही बनाया जा सकता है. वे यह भी मानते हैं कि भारत के संदर्भ में राष्ट्रीयता की बुनियाद केवल हिंदू संस्कृति ही हो सकती है.’

पुस्तक में बाबरी विध्वंस में भाजपा और संघ की भूमिका का वर्णन करते हुए लिखा है, ‘जैसे ही बाबरी मस्जिद के अहाते का ताला खुला, वैसे ही दोनों पक्षों में लामबंदी होने लगी. अनेक हिंदू और मुस्लिम संगठन इस मसले पर अपने-अपने समुदाय को लामबंद करने की कोशिश में जुट गए. भाजपा ने इसे अपना बहुत बड़ा चुनावी और राजनीतिक मुद्दा बनाया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद जैसे कुछ संगठनों के साथ भाजपा ने लगातार प्रतीकात्मक और लामबंदी के कार्यक्रम चलाए.’

अयोध्या मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की भूमिका के बारे में पुस्तक में लिखा है, ‘उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने इस बात का हलफनामा दिया था कि विवादित ढांचे की रक्षा की जाएगी. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय में उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का मुकदमा दायर हुआ. भाजपा ने आधिकारिक तौर पर अयोध्या की घटना पर अफसोस जताया.’

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पुस्तक के 9वें अध्याय में बाबरी ध्वंस के दौर की जानकारी.

इसी अध्याय में आगे लिखा है, ‘अधिकतर राजनीतिक दलों ने मस्जिद के विध्वंस की निंदा की और इसे धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के विरूद्ध बताया. ऐसे में धर्मनिरपेक्षता पर गंभीर बहस चल पड़ी और हमारे सामने कुछ-कुछ वैसे ही सवाल आन खड़े हुए जैसे देश केे बंटवारे के तुरंत बाद उभरे थे. बंटवारे के समय देश के सामने सवाल था- क्या भारत एक ऐसा देश बनने जा रहा है, जहां बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय का अल्पसंख्यकों पर दबदबा कायम होगा या व्यक्ति चाहे किसी भी धर्म का हो भारत में उसे समान रूप से कानून की सुरक्षा तथा बराबरी के नागरिक अधिकार दिए जाएंगे?’

बाबरी ध्वंस पर सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वेंकटचेलैया और न्यायमूर्ति जीएन रे की चर्चित टिप्पणी भी पुस्तक में दर्ज है. इसमें लिखा है, ‘यह दुख की बात है कि एक राजनीतिक दल के नेता और मुख्यमंत्री को अदालत की अवमानना के अभियोग का सामना करना पड़ रहा है, लेकिन ऐसा कानून की महिमा को बनाए रखने के लिए किया गया है. हम उसे अदालत की अवमानना का दोषी करार देते हैं. चूंकि इस अवमानना से ऐसे बड़े मुद्दे जुड़े हैं, जिनका असर हमारे राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने की बुनियाद पर पड़ता है, इसलिए हम उसे एक दिन के प्रतीकात्मक कारावास का दंड भी देते हैं.’

पुस्तक में 2002 में हुए गोधरा कांड में उस समय की नरेंद्र मोदी सरकार की आलोचना की गई है. इस विषय पर पुस्तक में लिखा है, ‘यह संदेह करके कि बोगी में आग मुसलमानों ने लगाई होगी. अगले दिन गुजरात के कई भागों में मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा हुई. हिंसा का यह तांडव लगभग एक महीने तक जारी रहा. लगभग 1,100 व्यक्ति, जिनमें ज्यादातर मुसलमान थे, इस हिंसा में मारे गए. राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिंसा को रोकने, भुक्तभोगियों को राहत देने तथा हिंसा करने वालों पर कानूनी कार्रवाई करने में असफल रहने के आरोप लगाते हुए गुजरात सरकार की आलोचना की. भारत के चुनाव आयोग ने गुजरात विधानसभा के चुनावों को रोकने का फैसला किया.’

गोधरा कांड के बाद गुजरात गए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का मीडिया को दिया वह चर्चित बयान पुस्तक में दर्ज है, जो उन्होंने नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में दिया था. इसमें लिखा है, ‘मुख्यमंत्री को मेरा संदेश है कि वे राजधर्म का पालन करें. शासक को अपनी प्रजा के बीच जाति, मत या धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए.’

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किताब में गोधरा कांड के बाद उपजी परिस्थितियों का वर्णन

गोधरा में 2002 में हुई शर्मनाक घटना पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की वार्षिक रिपोर्ट का अंश भी पुस्तक में दर्ज है. इसमें लिखा है, ‘गुजरात की घटनाओं से देश मर्माहत है. इन घटनाओं की शुरुआत गोधरा-कांड से हुई और फिर लगातार दो महीने से भी ज्यादा हिंसा का तांडव मचा, जिससे पूरा राज्य दहल उठा. इसमें कोई शक नहीं है कि आयोग की राय में राज्य सरकार लोगों के जीवन, स्वतंत्रता, समता और गरिमा के हनन को रोकने में बुरी तरह नाकाम रही.’

पुस्तक में बाबरी ध्वंस और गोधरा का वर्णन तो है ही, उस समय अखबारों में छपी खबरों की कतरने भी चस्पा हैं. यह पूरी सामग्री भाजपा को असहज करने वाली है, क्योंकि पार्टी हमेशा से यह कहती रही है कि विपक्ष उन्हें बदनाम करने के लिए गोधरा और बाबरी घ्वंस का मुद्दा उठाकर बेवजह सांप्रदायिकता का ठप्पा लगाता है.

हैरत की बात यह है कि भाजपा के सत्ता में आए हुए चार से ज्यादा का समय होने के बाद भी सरकार की इस सामग्री पर नजर नहीं पड़ी. मानव संसाधन विकास मंत्री रहते हुए पहले स्मृति ईरानी और अब प्रकाश जावड़ेकर यह जरूर कहते रहे हैं कि कांग्रेस सरकारों ने इतिहास को तोड़-मरोड़कर सिलेबस का हिस्सा बनाया, लेकिन ये दोनों सीबीएसई स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली नए सिरे से लिखवाना तो दूर अब तक पढ़ भी नहीं पाए हैं.

12वीं कक्षा की जिस पुस्तक में भाजपा को असहज करने वाली सामग्री लिखी हुई है उसका पहला संस्करण 2007 में प्रकाशित हुआ था. तब से यह पुस्तक जस की तस पढ़ाई जा रही है. केंद्र मेें मोदी सरकार बनने के बाद से इसका चार बार पुनर्मुद्रण हो चुका है.

पुस्तक में उस समय की पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति में शामिल सदस्यों के नाम भी छप रहे हैं. इस समिति के मुख्य सलाहकार रहे योगेंद्र यादव ने ही प्रकाश जावड़ेकर को ट्विटर पर याद दिलाया था कि आपातकाल पहले से ही सीबीएसई के पाठ्यक्रम में शामिल है.

योगेंद्र यादव कहते हैं, ‘किताब में जिस दौर की चर्चा की गई है उससे जुड़े कई अहम मुद्दों पर गहरे राजनीतिक मतभेद रहे हैं और अब भी बने हुए हैं. इसलिए इसमें किसी विवादास्पद मुद्दे पर लिखते हुए एक से ज्यादा दृष्टिकोण दिए गए हैं. साथ ही प्रामाणिक स्रोतों मसलन विभिन्न आयोगों की रिपोर्ट या अदालत के फैसलों का का इस्तेमाल किया गया और इनके आधार पर महत्त्वपूर्ण ब्यौरों का खाका खींचा गया है.’

वे आगे कहते हैं, ‘पुस्तक में स्वतंत्र भारत की लगभग बड़ी घटनाओं का जिक्र है. इसे किसी को सहज या असहज करने के लिए नहीं लिखा गया. इसमें आपातकाल, 1984 के दंगों, बाबरी ध्वंस और गोधरा कांड का तथ्यों के साथ विवरण है. कुछ भी मनगढंत नहीं लिखा हुआ है.’

पुस्तक पढ़ने से यह प्रतीत भी होता है कि इसकी सामग्री को तैयार करने में पूरी ईमानदारी बरती गई. इसके छठे अध्याय में आपातकाल की चर्चा करते हुए लिखा है, ‘देश के अंदरूनी मामलों की देख-रेख का जिम्मा गृह मंत्रालय का होता है. गृह मंत्रालय ने भी कानून व्यवस्था की बाबत कोई चिंता नहीं जतायी थी. अगर कुछ आंदोलन अपनी हद से बाहर जा रहे थे, तो सरकार के पास अपनी रोजमर्रा की अमल में आने वाली इतनी शक्तियां थीं कि वह ऐसे आंदोलनों को हद में ला सकती थी.’

इसी अध्याय में आगे लिखा है, ‘लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को ठप्प करके आपातकाल लागू करने जैसे अतिचारी कदम उठाने की जरूरत कतई न थी. दरअसल खतरा देश की एकता और अखंडता को नहीं, बल्कि शासक दल और स्वयं प्रधानमंत्राी को था.’ पुस्तक में 1984 में हुए सिख दंगों में उस समय की सरकार की नाकामी की भी विस्तार से चर्चा है.

इतिहासकार डॉ. एसएल नागौरी इस पुस्तक को इतिहास लेखन की बेहतरीन विधा से लिखा हुआ मानते हैं. वे कहते हैं, ‘समकालीन घटनाओं को दलीय चश्मे से देखा जाएगा तो सभी पक्ष सामने नहीं आएंगे. एनसीईआरटी की 12वीं की पुस्तक में सभी दृष्टिकोणों को समाहित कर तैयार किया गया है.’

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और जयपुर में रहते हैं.) 

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