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धर्मग्रंथों के ज़रिये क्या मुरली मनोहर जोशी मोदी को ‘राजधर्म’ याद दिलाना चाहते हैं?

वरिष्ठ भाजपा नेता और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी के धार्मिक संदर्भों पर लिखे गए एक लेख को संघ और भाजपा खेमे द्वारा मोदी सरकार के काम-काज के तरीके पर उनकी टिप्पणी के बतौर पढ़ा जा रहा है.

Murli Manohar Joshi-Modi

‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राज्य से संबंधित महत्वपूर्ण मसलों पर होने वाली बेबाक चर्चा में जनता की भागीदारी किसी राजा की न्यायसंगत शासन व्यवस्था का मूल मानी जाती थी.’

यह उक्ति सुशासन के कई नियमों में से एक है जिसकी चर्चा भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने अपने एक विस्तृत आठ-पेज के आलेख में की है. इस आलेख ने भाजपा और आरएसएस की शीर्ष नेताओं के बीच बड़े पैमाने पर चर्चा छेड़ दी है.

वे इसे नरेंद्र मोदी सरकार की वर्तमान दिशा को लेकर मुरली मनोहर जोशी के असंतोष के तौर पर देख रहे हैं. इस लेख का शीर्षक है. ‘राजधर्म- शासकों को कैसे आचरण करना चाहिए: प्राचीन भारत से सबक. यह लेख एक पत्रिका ‘पावर पॉलिटिक्स’ में प्रकाशित हुआ है.

कानपुर से लोकसभा सांसद और भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य मुरली मनोहर जोशी ने कभी भी सार्वजनिक तौर पर मोदी सरकार के कामकाज पर कोई टिप्पणी नहीं की है,  इसलिए वाल्मीकि की रामायण, वेदव्यास के महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र से शासन चलाने का सबक सीखने की बात करने वाले इस लेख को मोदी शासन के बारे में भाजपा के संस्थापकों की राय की तरह देखा जा रहा है.

मुरली मनोहर जोशी ने अपने लेख में जिन बातों पर जोर दिया है, वे हैं- सलाह-मशविरे और मतभेद को महत्व देना, भूख और डर से लोगों की सुरक्षा करना और महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा. उनके द्वारा उठाए गए ये मुद्दे उस सरकार के बारे में है, जिसे इसके आलोचकों द्वारा हर मोर्चे पर विफल बताया जाता है.

लेख के इस हिस्से पर इस पर गौर करें, ‘वाल्मीकि के अनुसार राजा निरंकुश नहीं हो सकता है. हम रामायण में देखते हैं कि राजा अपने मंत्रियों, विद्वत जनों और सेना के प्रमुख अधिकारियों से परामर्श करके राज्य की नीति का निर्धारण करता है.’

संघ के दफ्तर में इस उद्धरण को नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की आलोचना के रूप में देखा जा रहा है कि कैसे भाजपा, जो कभी अपने अनुशासन, कैडर-आधारित पार्टी और आंतरिक लोकतंत्र पर गर्व करने वाली पार्टी हुआ करती थी, अब सिर्फ दो आदमियों की पार्टी बन कर रह गई है.

पुरानी सलाह की पुनरावृति

देश भर में हर ओर फैले लिंचिंग के मौजूदा माहौल के दौरान ऐसा लगता है कि मुरली मनोहर जोशी, मोदी को वैसे ही ‘राजधर्म’ की याद दिला रहे हैं जैसे अटल बिहारी वाजपेयी ने 2002 में गुजरात दंगों के बाद याद दिलाया था.

मुरली मनोहर जोशी ने लिखा है, ‘राजा को अपनी जनता को खुद के डर से, एक-दूसरे के डर से और उन चीजों के डर से बचाकर रखना चाहिए अमानवीय है.’

जोशी के अनुसार यही राजधर्म का सार है:

‘जैसा कि पहले बताया गया है कि सरकार का मकसद जनता को भय से सुरक्षा सुनिश्चित करना है. भय में जीने से बुरा मानव जीवन के लिए कुछ भी नहीं है. महाभारत में दमन और हिंसा की स्थिति उत्पन्न होने पर शासन के उपयोग की सीमा और इसके विरोध के न्यायसंगत होने की बात कही गई है.’

इस पैराग्राफ में कही गई बात को गोरक्षकों और लिंचिंग करने वाली भीड़ के भय के संदर्भ में देखा जा सकता है. यह पैराग्राफ भाजपा के व्हाट्सऐप समूहों में बड़े उत्साह के साथ साझा किया जा रहा है.

जोशी इतने पर ही नहीं रुकते हैं और आगे लिखते हैं, ‘महाभारत के मुताबिक राज्य का मुख्य उद्देश्य भय से मुक्ति का वातावरण तैयार करना है जिसमें हिंसा का भय भी शामिल है. दूसरे शब्दों में कहे तो उसका उद्देश्य छोटी मछली को बड़ी मछली से बचाना है और इस बात का ख्याल रखना है कि इस प्रक्रिया में वो खुद बड़ी मछली न बन जाए. नहीं तो इससे उत्पन्न होने वाला दमन और आतंक सत्ता द्वारा किया गया अधर्म होगा.’

बार-बार पूरे लेख में किसानों का उदाहरण देकर अधर्म की बात करना मोदी सरकार की किसी वास्तविक परीक्षा की तरह है. ऐसा लगता है कि मौजूदा सरकार को झिड़कते हुए जोशी लिखते हैं, ‘जब राजा गरीबों, बेघरों और बुजुर्गों के आंसू पोंछकर खुशहाली लाता है तब यह आचरण राजा का धर्म कहलाता है.’

एक जगह पर जोशी इस बात पर जोर देते हैं, ‘राजा को खुद को अनुशासित रखना चाहिए औरउसके बाद अपनी प्रजा और अपने अधीनस्थों को अनुशासित रखने का प्रयास करना चाहिए. अगर वो बिना अपनी कमियां माने ऐसा करता है तो उपहास का पात्र बनता है और उसे हमेशा यह याद रखना चाहिए.’

भाजपा के एक नेता इस बारे में कहते हैं, ‘इसका अभिप्राय मोदी के नाम वाले सूट से है.’

भारत को कौटिल्य चाहिए, मैकियावेली नहीं

जोशी ने इस बात पर जोर दिया है कि ‘राजधर्म’ से उनका मतलब बिल्कुल भी धार्मिक नहीं है बल्कि ‘सुशासन’ के वास्तविक सिद्धांतों से हैं. वे लिखते हैं, ‘लोक कल्याण और राजा के व्यक्तिगत आचरण पर पूरे भारतीय इतिहास के दौरान जोर दिया गया है.’

और यह लिखते हुए वे कौटिल्य को याद करते हैं. ‘चाणक्य नीति’- जिसे लेकर भाजपा अध्यक्ष के समर्थक उनकी तारीफ करते हैं- की अवधारणा का खंडन करते हुए जोशी लिखते हैं, ‘हमें कौटिल्य को भारत का मैकियावेली कहना बंद करना चाहिए जबकि तथ्य इसके उलट हैं.’

जोशी के मुताबिक कौटिल्य चेतावनी देते हैं, ‘राज्य की शक्तियों का अत्यधिक इस्तेमाल असंतोष, अशांति और विद्रोह पैदा करता है. निवारण के उपायों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए और अगर निवारण के उपायों के बावजूद भी विद्रोह उत्पन्न होता है तो इसके लिए लोगों को सामूहिक तौर पर नहीं दंडित करना चाहिए. इसकी बजाए उनके साथ नरमी से पेश आना चाहिए.’

महिलाओं की गरिमा की रक्षा

जोशी ने अपने लेख के एक भाग में बताया है कि महाकाव्यों में शासन और महिलाओं के बारे में क्या लिखा.

‘महिलाओं की जान और गरिमा की रक्षा करना सरकार का प्रमुख उद्देश्य है और महाभारत में साफ तौर पर इसके बारे में लिखा है, ‘जिस राजा के राज्य में रोती-बिलखती स्त्रियों को उनके पति और बेटों को सामने ज़बरदस्ती उठाकर ले जाया जाता है, उनकी एक न सुनी जाए तो ऐसा महसूस होता है कि उस राज्य में कोई शासन व्यवस्था मौजूद नहीं है और भीष्म कहते है कि जो राज्य अपनी प्रजा से उनकी सुरक्षा का वादा करे और उनकी सुरक्षा न कर पाए ऐसे राज्य का अस्तित्व न होना ही अच्छा है.’

हालांकि यह लेख कठुआ और उन्नाव की घटनाओं के सामने आने से पहले आया था फिर भी इसे इस मोर्चे पर मोदी सरकार की असफलता से जोड़ देखा जा रहा है.

मजबूत नेता

जोशी लिखते हैं, ‘जिस तरह से एक पहिये से रथ नहीं चल सकता है वैसे ही एक आदमी पूरे राज्य का संचालन नहीं कर सकता है.’

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता, जो मोदी से नाराज होने के बावजूद उनकी कैबिनेट का हिस्सा हैं, का कहना है, ‘यह उस शख्स के लिए एक फटकार है, जिसे खुद के ‘मजबूत नेता’ होने का भ्रम है.’

जोशी का यह लेख फरवरी में प्रकाशित हुआ था लेकिन हाल ही में इसने सबका ध्यान तब खींचा जब आरएसएस के व्हाट्सऐप ग्रुप में इसे फैलाना शुरू किया गया और इसके बाद से संघ के खेमे में यह वायरल हो चुका है.

स्रोतों का कहना है कि जोशी, जिन्हें संघ का करीबी माना जाता है, ने अब तक मोदी सरकार के काम-काज के तरीके के बारे में कोई परामर्श नहीं दिया था, वे अब अपने विचार ज़ाहिर कर रहे हैं. हालांकि उनकी सलाह को शर्मिंदा करने वाला माना जा रहा है लेकिन मौजूदा ‘राष्ट्रवादी’ सरकार कम से कम महाकाव्यों की सीख से तो मुंह नहीं मोड़ सकती.

स्वाति चतुर्वेदी स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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