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क्या आप चार्ल्स डार्विन और उनके प्राकृतिक चयन के सिद्धांत की ये कहानी जानते हैं?

विशेष रिपोर्ट: 150 साल से भी ज्यादा पुरानी यह कहानी चार्ल्स डार्विन, अल्फ्रेड वालेस और विलियम बेटसन की है. तीनों इंग्लैंड से हैं और 19वीं सदी के हीरो हैं.

फोटो साभार: wakingtimes.com

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इस कहानी के तीन पात्र हैं. तीनों इंग्लैंड से हैं और 19वीं सदी के हीरो हैं. इनमे से एक चार्ल्स डार्विन का नाम, मुझे यकीन है आप सबने सुना होगा. पर बाकी दो इतिहास के पन्नों मे कहीं लुप्त हो कर रह गए. इस कहानी की मदद से मैं 150 साल से भी पुरानी इस कहानी को फिर ताजा करना चाहता हूं.

शुरुआत करते हैं 1840 के दशक से अल्फ्रेड वालेस और विलियम बेटसन नाम के दो दोस्त इंग्लैंड में थे. दोनों में एक धुन सवार थी. एक प्रश्न का उत्तर खोजने की धुन. वह प्रश्न यह था कि प्रकृति में करोड़ों तरीके के जीव-जंतु हैं, ये सब आते कहां से हैं?

तब की दुनिया अब से थोड़ा अलग थी. सामान्य ज्ञान यही था कि जीव-जंतु सब ईश्वर ने बनाये हैं और धरती पर रख दिए हैं. यह जीव-जंतु हमेशा से अपने अभी दिखने वाले रूप मे ही रहे हैं. पर वालेस और बेटसन इस जवाब से संतुष्ट नहीं थे. दोनों ने निर्णय लिया कि जवाब की खोज में वह दक्षिण अमरीका के महाद्वीप जाएंगे और वहां के जंगलों में प्रकृति के करीब रह कर सवाल का जवाब ढूंढेंगे.

19वीं सदी में विज्ञान को जीवन समर्पित कर पाना अमीरों का खेल था. एक सामान्य, मध्यमवर्गीय इंसान इस दिशा मे अपना जीवन नहीं बिता सकता था. पर वालेस ऐसे नहीं थे- उनके पास कोई खास पुश्तैनी जायदाद नहीं थी.

अपनी वैज्ञानिक खोज के दौरान दुर्लभ चीजें ढूंढ, उन्हें संग्रहालयों या अमीरों को बेच वो अपना विज्ञान का शौक पूरा करते थे. लेकिन दक्षिण अमेरिका का भ्रमण कुछ खास नतीजा नहीं लाया.

दोनों दोस्त ने कुछ साल साथ काम किया और उसके बाद शायद आपसी मतभेद के कारण अलग-अलग काम करने को राजी हो गए. बेटसन वहां एक लंबा अरसा रहे, पर वालेस ने निर्णय लिया और 1852 में वापस इंग्लैंड लौटने के लिए उन्होंने जहाज पकड़ा.

अपने हजारों एकत्रित किए नमूनों के साथ वह वापस आ रहे थे जब उनका जहाज महासागर के बीच में एक आग का शिकार हो गया. जान तो बच गई लेकिन साथ लाई एक-एक चीज तहस-नहस हो गई.

वर्षों की मेहनत पर पानी फिर गया और इस कारण जब 10 दिन बाद एक छोटी सी नाव पर रहते वालेस को एक नजदीक से गुजरते जहाज ने बचाया, तो वालेस ने एक निर्णय लिया, ‘वो अब पानी से कभी यात्रा नहीं करेंगे.’ हताश वालेस 1852 में किसी तरह जान बचाकर इंग्लैंड वापस पहुंचे.

पर मनुष्य भी एक अजीब सा जानवर है. जिद्दी है, हठी है और पुरानी बातों को भूलने मे उस्ताद है. अभी लौटे कुछ एक साल भर ही हुआ था कि वालेस को एक प्रस्ताव आया.

इस बार एशिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच के द्वीपों पर जा कर वहां से जीवों के नमूने ढूंढ इंग्लैंड भेजने थे. उनके अंदर का वैज्ञानिक इस सुनहरे मौके को टाल न पाया और वो राजी हो गए.

साथ ही, उन्होंने सोचा कि यह एक सुनहरा मौका होगा अपने पुराने प्रश्न पर फिर से काम करने का. पर इस बार जाने से पहले उन्होंने इंग्लैंड के जाने माने प्रकृतिवादी चार्ल्स डार्विन से मिलना उचित समझा.

डार्विन से मिल, उन्होंने अपनी आने वाली यात्रा और वैज्ञानिक दिलचस्पी के बारे में बताया. डार्विन युवक से बहुत प्रभावित हुए और जब वालेस ने उन्हें बताया कि वह जीवों के बनने के बनने के बारे मे अध्ययन करना चाहते हैं और क्या डार्विन, समय-समय पर, उनकी खोजों पर अपनी टिप्पणी देने को राजी होंगे, तो डार्विन तुरंत तैयार हो गए.

वालेस बहुत खुशी से द्वीपों पर गया. वह नहीं जानता था कि जीव-जंतु कहां से आते हैं, इस प्रश्न का जवाब डार्विन लगभग 15 साल पहले ही दे चुके हैं. डार्विन ने यह जवाब तब तक दुनिया के साथ नहीं बांटा था. उस समय तक, वो जवाब उनकी लिखी कॉपियों मे कैद थे.

डार्विन का जन्म 1809 मे हुआ. चर्च का पादरी और डॉक्टर बनने की नाकाम कोशिशों के बाद वो जीवन से उलझ रहे थे, जब 1831 में उनके पास एक मौका आया. इस मौके ने ना केवल उनके बल्कि जीवन विज्ञान के पूरे इतिहास को बदल दिया.

मौका था ‘बीगल’ नाम के एक जहाज पर छह महीने तक रहना और दुनिया का एक चक्कर लगाना. जहाज के कप्तान फिट्जरॉय को एक साथी की जरूरत थी और इधर-उधर पूछने पर उन्हें डार्विन का नाम सुनने मे आया. परिवार से लड़कर डार्विन जहाज पर जाने को राजी हो गए.

छह महीने की ये दूरी पांच साल मे तय हुई और इन पांच सालों मे डार्विन ने दक्षिण अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसी जगहों पर बेशुमार जीवों की बहुत बारीकी से पढ़ाई की.

नतीजा यह हुआ की जब वह वापस इंग्लैंड आये, तो उन्हें लगा जैसे कि उन्होंने जो कुछ देखा वो उन्हें प्रकृति के राज खोलने की वजह दे रहा था.

यात्रा शुरू होने पर जब जहाज महासागर में पहुंचा तो डार्विन ने बेहद खूबसूरत जीव देखे. मगर वह समझ नहीं पाए कि ईश्वर ने इतनी सुंदर रचनाएं बना कर समुद्र के बीच क्यों डाल दीं, जहां उन्हें सराहने वाला कोई नहीं था.

जब वह अपने सफर के पहले पड़ाव पर पहुंचे तो अक्सर मीलों तक घुमते और जगह-जगह के जीवों का अध्ययन करते. जहां भी जाते उन्हें एक चीज हमेशा दिखती, जहां-जहां जैसे रूप के जानवर थे, वहां जब डार्विन ने पत्थरों मे जीवाश्म देखे, तो वह उस जगह के वर्तमान के जानवर जैसे दिखते थे.

चाहे उनका आकार अलग हो, पर शरीर का ढांचा सामान होता. डार्विन को इससे यह अहसास हुआ कि किसी भी जगह मे, आज के रहने वाले जीवों का उसी जगह पर लाखों साल पहले रहने वाले जीवों से जरूर कोई रिश्ता है. डार्विन इस अवलोकन से स्तब्ध थे.

Darwin Wallace Bateson Collage

(बाएं से) विलियम बेटसन, चार्ल्स डार्विन और अल्फ्रेड वालेस

उनकी द्वारा घूमी गई जगहों में सबसे महत्वपूर्ण दक्षिण अमेरिका के पश्चिमी तट से कुछ दूरी पर गालापागोस द्वीप थे. यहां पहुंच डार्विन ने देखा कि हर द्वीप पर चिड़िया लगभग एक जैसी दिखती है, पर उनमें मामूली फर्क भी होते हैं. किसी द्वीप पर उसकी चोंच लंबी होती है, तो किसी पर पतली.

किसी द्वीप पर उसकी छाती पर एक रंग होता है तो किसी पर नहीं. चिड़ियों के साथ-साथ, स्थानीय लोगों ने बताया कि वहां कछुए की पीठ पर बने डिजाइन को देखकर वो ये बता सकते थे कि यह किस द्वीप से आया है. अर्थात, हर द्वीप पर अलग डिजाइन वाला कछुआ था.

ऐसे कई फर्क उन्होंने देखे और ध्यान से पढ़े. पर ऐसे फर्क क्यों हैं, ये बात उनके पल्ले नहीं पड़ी. वापस आकर जब उन्होंने सब कुछ दोबारा सोचा, तो धीरे-धीरे मन मे कुछ ख्याल स्थापित होने लगे.

जिन द्वीपों पर खाने के लिए बीज थे, वहां चिड़िया की चोंच छोटी और मजबूत थी. जहां चिड़िया को खाने के लिए फूल के भीतर जाना पड़ता था, वहां लंबी चोंच वाली चिड़िया थी.

यानी, द्वीपों की चिड़ियों में जरूरत के अनुसार फर्क थे. उन्होंने सोचा कि जरूर कुछ ऐसा हुआ होगा, पहले सभी द्वीप नजदीक होंगे और वहां एक किस्म की चिड़िया रहती होगी. समय के साथ जब द्वीप दूर हुए तो कुछ द्वीपों पर खाने के लिए बीज थे और कुछ पर फूल.

जहां बीज थे, वहां वो चिड़िया जिसकी चोंच औरों के मुकाबले थोड़ी मज़बूत रही होगी, उसे खाने को मिला होगा. और जिस चिड़िया की चोंच कमजोर रह गई होगी, वह भूखी मर गई होगी. इस कारण से मजबूत चोंच वाली चिड़िया ने अगली पीढ़ी मे जब जन्म दिया होगा तो उसके बच्चों की चोंच भी अपनी मां की भांति, मजबूत रही होगी.

ऐसा क्रम जब हजारों सालों तक चलता रहेगा, तो धीरे-धीरे, उस जगह से कमजोर चोंच वाली चिड़िया लुप्त हो जाएगी. इसी कारण से, हर द्वीप पर अपने वातावरण के अनुकूल रहने वाली चिड़िया फूलेगी-फलेगी, और दूसरी लुप्त हो जायेगी.

डार्विन ने इस विचार को ‘थ्योरी ऑफ नेचुरल सलेक्शन’ अर्थात ‘प्राकृतिक चयन का सिद्धांत’ कहा. मूल रूप से विचार उनके दिमाग में 1830 के दशक के अंत तक बैठ चुका था- यह हमें उनकी निजी कॉपियों मे लिखे लेखों से पता चलता है.

पर डार्विन ने 1-2 दोस्तों के अलावा यह विचार किसी के साथ साझा नहीं किए. ऐसा क्यों है, इसके कई कारण माने जाते हैं. पहला कि यह एक खतरनाक विचार था, जो चर्च के उपदेश और सामान्य ज्ञान के खिलाफ कुछ बोल रहा था. इसलिए, ऐसे विचार रखने वाले की पिटाई होने की तगड़ी संभावना थी.

दूसरे, डार्विन इस बारे में एक बड़ी किताब लिख रहे थे. वह यह विचार सभी सबूतों के साथ दुनिया के समक्ष रखना चाहते थे और इसके लिए उन्हें समय चाहिए था.

और तीसरे, डार्विन अपनी पत्नी से बेहद प्यार करते थे और उनकी पत्नी धार्मिक प्रवृति की थीं. डार्विन अपने विचारों से अपनी पत्नी के धार्मिक विचारों को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते थे.

बहरहाल, नतीजा यह हुआ कि प्राकृतिक चयन के सिद्धांत के बारे में केवल डार्विन और उनके दो दोस्त जानते थे.

उधर, वालेस इस सब से अनजान, काम पर जुटे थे. कमाल की बात यह है कि जो ख्याल डार्विन को गालापागोस द्वीपों पर आये, वालेस को ठीक वही ख्याल एशिया के द्वीपों पर आये. उन्हें लगा जैसे वह अपने सवाल की खोज करते-करते उत्तर के बहुत नजदीक पहुंच चुके हैं.

अपनी खोज के बारे में लेख लिखकर उन्होंने इंग्लैंड भेजा और उत्तेजना से जवाब का इंतजार करने लगे. जवाब तो आया, पर उसमें लिखा था कि उलटे-सीधे ख्याल पालने की बजाय वह अपने काम से काम रखें (जीवों के नमूने इंग्लैंड भेजें). जब किसी ने उन्हें गंभीरतापूर्वक नहीं लिया, तो हार मान उन्होंने डार्विन को एक खत लिखा.

इस खत में उन्होंने अपने दिमाग में आए ख्याल का विवरण किया और डार्विन की राय मांगी. डार्विन खत पढ़ कर चौंक गए, स्तब्ध रह गए. उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि हजारों किमी दूर बैठे वालेस ने ठीक वही निष्कर्ष निकाला जिस पर डार्विन लगभग बीस साल पहले पहुंचे थे.

उन्हें यह डर भी खाया कि कहीं सालों की मेहनत का सारा श्रेय वालेस को न मिल जाए. समझ नहीं आया कि क्या किया जाए, तो मदद मांगने के लिए उन्होंने वालेस का खत अपने उन्हीं दो दोस्तों से बांटा जो प्राकृतिक संघर्ष के सिद्धांत के बारे में जानते थे (इन दोस्तों के नाम चार्ल्स लयेल और जोसफ हुकर थे). दोस्तों ने खत पढ़ने पर माना कि समस्या गंभीर है, लेकिन एक प्रस्ताव रखा.

उन्होंने डार्विन और वालेस से इंग्लैंड के एक मशहूर वैज्ञानिक सम्मेलन में एक ही दिन अपने-अपने नतीजे दुनिया के सामने रखने को कहा. डार्विन और वालेस दोनों राजी हो गए. 1859 में सम्मेलन में दोनों के पर्चे पढ़े गए. बदकिस्मती से दोनों ही वहां नहीं थे.

वालेस हजारों किमी दूर अपना अध्ययन जारी रखे थे और डार्विन अपनी संतान की मौत का शोक मना रहे थे. पर्चे पढ़ने के अगले ही साल डार्विन की किताब ‘ऑन द ओरिजिन ऑफ स्पिशीज’ प्रकाशित हुई. प्रकाशन के 150 से भी अधिक साल हो जाने के बाद, यह किताब आज भी छपती और पढ़ी जाती है.

इसमे डार्विन विस्तार से बताते हैं कि प्राकृतिक चयन का सिद्धांत क्या है. डार्विन एक सरल भाषा में लिखते थे, इसलिए इस किताब को पढ़ना काफी सरल है, और इसे पढ़ने के लिए जीवन विज्ञान मे विशेषज्ञ होना बिलकुल भी जरूरी नहीं है.

डार्विन और वालेस के सिद्धांत के मूल रूप से तीन स्तंभ हैं. पहला, विविधता. एक आबादी मे किसी भी रूप (जैसे आंख, कान, इत्यादि) को लेकर विविधता होगी. यह हम अपने आसपास देख कर ही बता सकते हैं- जैसे कुछ लोग छोटे होते हैं, तो कुछ लंबे.

दूसरा, प्रतियोगिता. हर एक क्षेत्रफल एक सीमित जनसंख्या को संभाल सकता है. यदि जनसंख्या बेहिसाब बढ़ने लगे तो सब वहां नहीं रह पाएंगे. कुछ लोगों को वहां से जाना होगा. इसलिए, जनसंख्या मे प्रतियोगिता होती है- अपने क्षेत्र में रहने की.

इसे ऐसे भी समझा जा सकता है. मान लीजिए एक जंगल मे केवल 100 शेर रह सकते हैं, पर वहां रहती मादाओं ने 200 जन्म दिए हैं. अब जाहिर है कि सभी 200 नहीं बच पाएंगे. इनके बीच एक संघर्ष होगा, उस जगह में बने रहने का.

तीसरा, चुनाव. प्रतियोगिता के कारण 200 में से वही 100 शेर बचेंगे जो वहां रहने के लिए सबसे अधिक अनुकूलित होंगे.

जब ऐसा हजारों सालों तक, अलग-अलग जगहों पर चलता है- तो नए जीव-जंतु ईजाद होते हैं.

डार्विन को अपने ख्यालात और किताब के लिए बहुत आलोचना का सामना करना पड़ा. यहां पर हमारे तीसरे किरदार की फिर वापसी करते हैं.

आपको याद है बेटसन, जो वालेस के साथ दक्षिण अमेरिका गए थे. वो अभी भी वहां थे और डार्विन के ख्यालों से बहुत प्रभावित हुए. उन्होंने अपने अध्ययन से डार्विन के सिद्धांत के पक्ष मे कई सबूत भेजे.

उनमें से एक उल्लेखनीय है. बेटसन ने देखा कि दक्षिण अमेरिका में जंगलों मे कई प्रकार की तितलियां होती हैं- इनमें से कुछ जहर भरी होती हैं और कुछ नहीं. परिणामस्वरूप, जहरीली तितलियों को कोई जानवर या कीड़ा कुछ नहीं कहता और बिना जहर वाली तितलियां दूसरों द्वारा खाई जाती हैं.

मगर, इस बीच कुछ मज़ेदार होने लगा. जो तितलियां जहरीली नहीं थीं, वो जब नई तितलियों को जन्म देती तो उनके रंग एक-दूसरे से थोड़े अलग रहते (पहले सिद्धांत, विविधता के अनुकूल). ऐसे में जिन नवजात तितलियों का रंग जहरीली तितलियों जैसा होता, उन्हें कोई नहीं खाता.

इस तरह से, जहरीली तितलियों- जैसी बिना जहर वाली तितलियां बच जाती और दूसरी मारी जाती. धीरे-धीरे, सभी तितलियां एक जैसी दिखने लगीं और तितलियां खाने वाली कीड़े बेचारे बता नहीं पाते थे कि किसे खाना है और किसे नहीं.

जब बेटसन ने यह किस्सा लिख कर डार्विन को भेजा, तो डार्विन ने कहा, ‘प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का इससे बेहतर उदाहरण मैंने नहीं देखा.’

बेटसन दक्षिण अमेरिका में बहुत साल रहे. वापस आने से पहले तक वह करीब दस हजार जीवों का विवरण दे चुके थे-उनमें से अनेक, मानव जाति ने पहले कभी नहीं देखे थे.

उधर वालेस ने भी हमेशा ये स्वीकार किया कि भले ही डार्विन और उनका पर्चा एक ही दिन दुनिया के सामने रखा गया हो, डार्विन उस निष्कर्ष पर वालेस से कहीं पहले पहुंच चुके थे.

वैज्ञानिक जीवन में मैंने ऐसा होते बहुत कम देखा है जब एक वैज्ञानिक दूसरे को खुले दिल से श्रेय देता है. वालेस ने अपने जीवन मे केवल एक ही किताब लिखी, जिसका नाम ‘डर्विनिस्म’ था.

डार्विन ऐसे सम्मान को पाकर निश्चित रूप के बहुत खुश होते लेकिन अफसोस कि किताब छपने के कुछ साल पहले ही उनका निधन हो गया. हालांकि डार्विन ये जानते थे कि ऐसा कुछ जरूर होगा जिससे मां-बाप जैसे लक्षण बच्चों मे आते हैं, पर वो ऐसा होने की बारीकियों से अनजान थे.

बहुत दशक बाद पता चला कि जिस तत्व की खोज डार्विन को थी, उसे ‘डीएनए’ कहते हैं. मगर ऐसा कुछ है, इसके संकेत डार्विन के समय मे ही आने लगे थे.

ऑस्ट्रिया मे एक चर्च के कर्मचारी ग्रेगर मेंडेल ने मटर के पौधों के साथ 1860 के दशक में बहुत से परीक्षण करे. नतीजा ये निकला कि मां-बाप के लक्षण बच्चों तक कैसे पहुंचते हैं, वे इसका गणित समझ गए थे.

अचूक तरीके से वह भी नहीं कह सकते थे कि क्या तत्व है जिससे ऐसा होता है, पर उनके काम से डार्विन को बहुत मदद मिलती. उन्हें अपने प्राकृतिक चयन के सिद्धांत को एक ठोस सहारा मिलता और यकीनन वो इस सहारे को अपनी ओर आती आलोचना से जूझने मे मदद लेते.

बहरहाल, अफसोस यह रहा कि डार्विन अपने जीवन काल मे मेंडेल का काम पढ़ नहीं पाए. दरअसल, मेंडेल क्योंकि वह अंग्रेजी में नहीं लिखते थे और उनके काम मे बहुत-सा गणित था, का काम छपने के बाद, लुप्त-सा हो गया.

अंततः बीसवीं सदी के शुरुआत में 1900 में तीन वैज्ञानिकों ने मेंडेल के पर्चे अकस्मात ही ढूंढ निकाले और पूरा वैज्ञानिक जगत उनकी महत्ता से हैरान रह गया कि दशकों पहले किसी ने इतना महत्वपूर्ण काम कर रखा था.

दुर्भाग्य से, मेंडेल तब तक जीवित नहीं थे. बहुत समय तक ये माना जाता था कि प्राकृतिक चयन बहुत धीमी प्रक्रिया है- इसमें हजारों साल लगते हैं. पर असल में इसके कई उदाहरण हमारे आसपास ही हैं.

इनमें सबसे मशहूर है जीवाणुओं का एंटीबायोटिक के प्रति प्रतिरोध. जब बीसवीं सदी के शुरुआत मे एंटीबायोटिक्स का आविष्कार हुआ, तो सबने सोचा कि अब जीवाणुओं द्वारा दी जा रही बीमारियों का अंत हो जाएगा. मगर कुछ ही सालों में देखा गया कि जीवाणुओं ने एंटीबायोटिक से लड़ना और उसे नष्ट करना सीख लिया है. अब हाल ये है कि किसी भी एंटीबायोटिक के आते ही कुछ एक साल मे जीवाणु उससे लड़ने में सक्षम हो जाते हैं. ऐसा डार्विन और वालेस के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत के कारण ही है.

इसे समझने के लिए ऐसे सोचिए कि शुरुआत में सब जीवाणु एंटीबायोटिक से मारे जा रहे थे, पर प्रजनन के दौरान पैदा हुआ नया जीवाणु अपनी मादा से थोड़ा अलग दिख सकता है, ठीक वैसे ही जैसे बच्चे अपने मां-बाप से थोड़ा अलग दिखते हैं.

ऐसे ही अलग जीवाणु में यदि एंटीबायोटिक से लड़ने की शक्ति आ जाए, तो वो फटाफट एंटीबायोटिक से लड़ने की क्षमता वाले जीवाणु पैदा कर देगा. और हर कोई जो एंटीबायोटिक से लड़ नहीं पायेगा, मृत हो जाएगा. यह उदाहरण प्राकृतिक चयन के सिद्धांत का है, और हमारे ठीक सामने खेला जा रहा है.

डार्विन और वालेस के बाद लगभग 150 सालों मे जीवन विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है, और आज हमें ऐसी-ऐसी बारीकियां पता हैं, जिन्हें अगर डार्विन और वालेस को हम बताते, तो जरूर उनकी आंखें फटी रह जाती. पर वो कहानी मैं किसी और दिन सुनाऊंगा.

(लेखक आईआईटी बॉम्बे में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)

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