राजनीति

‘चुनाव हिंदू-मुस्लिम के नाम पर नफ़रत फैला कर लड़े जाते हैं, यह रुकना चाहिए’

2002 गुजरात दंगों में मारे गए कांग्रेस सांसद एहसान जाफ़री की बेटी निशरीन हुसैन का संस्मरण.

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एहसान जाफ़री और ज़किया जाफ़री के साथ निशरीन हुसैन (फोटो साभार: फेसबुक/निशरीन हुसैन)

मेरा नाम निशरीन हुसैन है. मेरा जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के एक छोटे से नगर खंडवा में हुआ था, जो कि मेरे नाना का गृह-नगर था. मेरे नाना पास के रूस्तमपुर गांव में किसान थे.

मेरे दादा बुरहानपुर के डॉक्टर थे, जो अपने परिवार के साथ अहमदाबाद आ गए थे. यही वह नगर है जिसे मेरी मां जकिया जाफरी अपना घर कहती थीं.

किसी भी दूसरे परिवार की ही तरह मेरे पिता का परिवार भी काम और पढ़ाई के दरमियान संघर्ष कर रहा था. वे दो बेडरूम के छोटे से घर में रहते हुए हिंदुओं और कुछ मुस्लिमों के मिले-जुले समुदाय से घिरे होकर खुद को महफूज महसूस करते थे.

मेरे पिता वकालत की पढ़ाई करते हुए अपना खर्च चलाने के लिए हमारे स्थानीय मोटरसाइकिल मरम्मती की दुकान के मालिक कुबेर सेठ और हमारे स्थानीय किराना की दुकान के मालिक रमा सेठ के यहां उनके हिसाब-किताब को देखने का काम करते थे. यह एक सामान्य भारतीय गृहस्थी थी, एक सामान्य भारतीय परिवार था. सिवाय इसके कि हम मुसलमान थे.

1969 के दंगों ने अकल्पनीय तबाही बरपाई. मेरी अम्मी उस रात को याद करते हुए, जिस रात विपदा हम पर टूट पड़ी थी, कहती हैं कि उनके पास शेल्फ पर रखी उनकी शादी की एकमात्र तस्वीर को भी उठाने का वक्त नहीं था. जैसे-जैसे दंगाई भीड़ घरों को जलाते, लूटपाट करते और लोगों की हत्या करते हुए पास आती गई, मेरी अम्मी और अब्बा, मेरे दादा-दादी, चाचा-चाची हमारे और सैकड़ों दूसरे मुसलमानों के साथ अंधेरे और अराजकता के बीच अपने और अपने बच्चों के लिए रास्ता खोजते हुए भागे.

एक पांच साल की बच्ची के तौर पर मुझे दूर से दिखाई देने वाली बस एक रोशनी याद है, जो जलते हुए मुसलमानों से उठ रही आग की लपटों की रोशनी थी, जिनमें मेरा घर भी शामिल था. रेल की पटरियों के साथ-साथ घंटों तक चलने के बाद मेरा परिवार एक कोयले से लदी मालगाड़ी पर चढ़ गया.

हमारे साथ बड़ी संख्या में जान बचाकर भागने वाले और भी लोग थे. उन सबके पास घर के नाम पर नाममात्र के सामानों वाला जो घर था, वह राख हो चुका था. उसके बाद अहमदाबाद में मलेक्षबन स्टेडियम में शरणार्थी तंबुओं में लंबे दिनों और खाने के लिए लंबी कतारों की शुरुआत हुई.

यहां यह याद दिलाया जाना चाहिए कि मेरी पैदाइश के लोकतांत्रिक देश में, मैं किसी कुदरती तबाही के कारण शरणार्थी शिविर में नहीं थी, बल्कि मुसलमानों के खिलाफ बढ़ती नफरत के कारण थी- नफरत की राजनीति, नफरत को भड़काने वाले भाषणों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की वजह से थी.

मेरे अब्बा और उनके पक्ष का परिवार सियासत में काफी सक्रिय था. मेरे दादा और दादीजान (हां मेरी दादीजान भी), मेरे पिता, चाचा और चाचियां- वे सभी अंग्रेजों के खिलाफ भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान जेल गए थे. उन्हें विरोध प्रदर्शनों और रैलियों से गिरफ्तार किया गया था.

1969 के दंगों के बाद मेरे पिता अपने घर में वापस लौटने और उसका पुनर्निर्माण करने के लिए कृतसंकल्प थे और उन्होंने ऐसा किया भी. वे वापस लौटे और उन्होंने अपने परिवार और पड़ोसियों के साथ मिलकर अपने घर का पुनर्निर्माण किया. कुबेर सेठ और रामा सेठ ने मेरे माता-पिता को अपनी दुकान के पीछे एक छोटे से कमरे में जगह दी.

मेरे पिता की कोशिश से हम एक बार फिर बस गए और 1969 के बाद हमने एक बार फिर एक नई जिंदगी की शुरुआत की. हम जैसे-जैसे बड़े होते गए हमने उस इलाके में अपने पड़ोसियों के साथ दोस्तियां कीं, हम साथ-साथ स्कूल जाते थे और सामाजिक आयोजनों में साथ-साथ शिरकत करते थे. 1983 में मेरी शादी के बाद मैं अमेरिका में बस गई. मेरे बच्चे हर गर्मी मेरे माता-पिता के साथ अहमदाबाद में बिताते थे.

अम्मी हमेशा यह कहा करती थीं कि हमारे अब्बा के संकल्प और दान में मिले जर्मन के बर्तन (अल्यूमिनियम के बर्तन) के अलावा हमें और किस चीज की जरूरत थी? दान में मिले इन बर्तनों को काफी करीने से मुश्किल दिनों की याद में 19, गुलबर्ग सोसाइटी की नई रसोई में रखा गया था, जब तक कि वे मेरे पिता के साथ 2002 में राख में नहीं बदल गए. जी हां, मैं भारत के बारे में, मेरे देश; अहमदाबाद शहर, मेरे घर के बारे में बात कर रही हूं.

मेरा दिमाग बार-बार उस दिन की ओर चला जाता है और मैं उस क्षण के बारे में सोचने से खुद को दूर रखना चाहती हूं, जब आरएसएस/विश्व हिंदू परिषद से जुड़ी हुई या उससे प्रेरित हिंसक भीड़ ने मेरे 74 वर्षीय पिता, पूर्व सांसद अहसान हुसैन जाफरी को घर से खींच लिया था. यह 28 फरवरी 2002 की घटना है.

उन्होंने मेरे पिता को घसीट कर बाहर निकाला और पुलिस कुछ फीट की दूरी पर परिसर के बाहर एक वैन में मूकदर्शक बन कर बैठी रही, गोया कि वे उनकी मौत की पुष्टि का इंतजार कर रही थी. उन्होंने उनके जिंदा रहते हुए उनके हाथ और पांव काट दिए. और जैसा कि चश्मदीद गवाहों का कहना है उन्होंने आखिरी चोट उनके सिर पर की. उन्होंने उनके सिर को एक त्रिशूल पर टांग दिया और इसे अकल्पनीय तरीके से ‘जय श्री राम, जय श्री कृष्ण’ के नारों के साथ चारों तरफ घुमाया.

जिस समय तक उन्होंने उनके शरीर के हिस्सों को जलाया, बाकी के गुंडों ने बच्चों, औरतों और आदमियों को साथ लूटपाट, बलात्कार और हत्याओं का शिकार बनाया. जलते हुए शरीरों के साथ, छोटे बच्चे पानी के खुले टैंक में कूद पड़े. जवानों और बूढ़ों के एक पूरे समुदाय के शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके उन्हें जलाकर राख कर दिया गया.

यह वास्तव में उसी दिन समाप्त नहीं हो गया. पूरा गुजरात जलता रहा और सत्ता में बैठे लोग दंगाई गिरोहों को उकसाने के लिए भाषण देते रहे, अखबारों ने सत्ताधारी भाजपा की शह पर राज्यभर में फर्जी खबरें फैलाईं.

अहमदाबाद की गुलबर्ग सोसाइटी और नरोदा पाटिया से लेकर गुजरातभर के गांवों तक ट्रकों में भर-भर कर लाशों को गहरे कुओं में दफन कर दिया गया ताकि सबूतों को मिटाया जा सके. ऊपर और नीचे के सभी भगवानों, घरों और दिलों ने चुप्पी ओढ़ ली.

जिस समय पूरा गुजरात राज्य जल रहा था और औरतें और बच्चे मदद की गुहार लगाते हुए सड़कों पर भाग रहे थे, उस समय पुलिस के आला अधिकारियों ने कहा, ‘हमारे पास आपको बचाने का हुक्म नहीं है.’ भाजपा शासित राज्य में 2002 में दिनदहाड़े जो हुआ उसकी पुष्टि ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी रिपोर्ट में की.

यह अकल्पनीय है. लेकिन ऐसा भारतभर में होता है. राजनीति और सत्ता के लिए हम इतने नीचे गिर गए. इतने नीचे कि हमने अपने समाज के एक हिस्से के साथ जो किया, उसके लिए हमारे अपने बच्चे हमें पहचानने से इनकार कर देंगे.

मेरे पिता एक वकील एक सियासतदां और एक कवि थे. अपनी किताब कंदील में उन्होंने भारत के बारे में लिखा :

हर दिल में मोहब्बत की उख्खुवत की लगन है
ये मेरा वतन मेरा वतन मेरा वतन है

सियासत नफरत का खेल है. चुनाव हिंदू-मुस्लिम के नाम पर नफरत फैला कर लड़े जाते हैं. यह रुकना चाहिए. भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. हमारे संस्थापकों ने एक खूबसूरत संविधान का निर्माण किया. उसे हमें जीवन में उतारना चाहिए.

(निशरीन हुसैन ज़किया जाफ़री और एहसान जाफ़री की बेटी हैं.)

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